देहसुख में डूबता देश

Updated at : 26 Jun 2015 10:59 AM (IST)
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देहसुख में डूबता देश

-हरिवंश- बहुत पहले कहा गया कि कवि या साहित्यकार देश-दुनिया के भविष्य का आकार खींचते हैं. रूप देते हैं. इतिहास के गर्भ में बननेवाले देश, समाज की छवि को भविष्यद्रष्टा की तरह पहले देखते हैं. वे ही भावी समाज की रूपरेखा, नाक-नक्श या नक्शा भी खींचते हैं. हालांकि निजी मान्यता है कि आज की दुनिया […]

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-हरिवंश-
बहुत पहले कहा गया कि कवि या साहित्यकार देश-दुनिया के भविष्य का आकार खींचते हैं. रूप देते हैं. इतिहास के गर्भ में बननेवाले देश, समाज की छवि को भविष्यद्रष्टा की तरह पहले देखते हैं. वे ही भावी समाज की रूपरेखा, नाक-नक्श या नक्शा भी खींचते हैं. हालांकि निजी मान्यता है कि आज की दुनिया का भविष्य राजनीति ही तय कर रही है और बदलाव का मूल सूत्र, एकमात्र राजनीति ही हो सकती है.
पर इस भारतीय राजनीति में जब अपने समय के बड़े सवाल नहीं उठें, समाज-परिवार-देश के नैतिक सवालों या असल चिंता-चुनौतियों पर गांव-गांव, गली-गली या सार्वजनिक चौराहों पर चर्चा न हो, अगर राजनीति अपने समय के बुनियादी सवालों को उठाये ही नहीं, तब क्या होगा? तब ऐसी राजनीति, देश के चौतरफा पतन का रास्ता आसान बनाती है, जो भारत में दिख रहा है.
आज की भारतीय राजनीति, सिर्फ और सिर्फ गद्दी पाने की चौहद्दी में सिमट गयी है. गद्दी भी किसलिए? धन-कमाने, रसूखदार बनने और अपनी भावी पीढ़ियों का भविष्य गढ़ने के लिए. पहले समाज के नैतिक और अहम सवाल, राजनीति में बहस के मुख्य एजेंडा होते थे.
मसलन जाति तोड़ो, जनेऊ तोड़ो, सतीप्रथा मिटाओ, औरत-पुरुष की बराबरी का मुद्दा या देह व्यापार खत्म करने के लिए सख्त व्यवस्था जैसी बातें. यानी राजनीति होती इसलिए थी कि वह समाज को लगातार आदर्श और श्रेष्ठ होने की ओर ले जाये. पर आज सामाजिक बुराइयां, समाज या राजनीतिक मुख्यधारा के सवाल नहीं बनते? चीन की नयी व्यवस्था के तत्काल बाद, माओ ने देह व्यापार (प्रास्टिट्यूशन)और रखैलों की पुरानी परंपरा पर सख्त पाबंदी लगा दी. भारत की राजनीति में भी ऐसे नैतिक -सामाजिक प्रश्न या राजनीतिक मुद्दा ही सत्ता, राजनीति के मूल में होते थे. वे सवाल ही राजनीति का भविष्य या दशा-दिशा तय करते थे. पर आज भारत की राजनीति ऐसे सवालों पर चुप है.
ऐसा ही एक गंभीर पर अचर्चित सवाल है, आज के भारतीय समाज का. 1991 के आर्थिक उदारीकरण ने देश को लाइसेंस, कोटा और परमिट राज से निकाल कर आर्थिक समृद्धि तो दी, पर नैतिक रूप से भारतीय देश-समाज की पुरानी आभा-तेज को निस्तेज भी किया है. भ्रष्टाचार और भोगवाद तो अनियंत्रित है ही. पर कालगर्ल रैकेट या देह व्यापार जिस तरह बढ़ा है, वह अविश्वसनीय है. यह रैकेट क्यों बढ़ा? समृद्धि के साथ भोग की भूख क्यों बढ़ी?
एक प्रमुख कारण तो उदारीकरण के बाद बढ़ता भोगवाद है. छक कर भोगो-मस्ती में जियो, नया दर्शन है. बिना श्रम किये, दुनिया की सारी दौलत, सुख, ऐशो-आराम कदम चूमे, यह ख्वाहिश है. यह बाजारवाद है. विनोबा जी ने कहा था, ऐसे हालात में मनुष्य इंद्रियजीवी बनता है.
उसे इंद्रियसुख में ही स्वर्ग या मुक्ति दिखाई देती है. बाजारवादी व्यवस्था, भी इस देह व्यापार के पीछे एक बड़ा कारण है. महत्वपूर्ण फैसलों को खरीदने या प्रभावित करने के लिए देहव्यापार या कालगर्ल रैकेट का विस्तार हुआ है.
ब्लैकमेल से भी सरकारी फैसलों को खरीदने- प्रभावित करने की प्रवृत्ति से देह व्यापार का धंधा बढ़ा है. उधर, भोगवाद में यह भी लक्षण है कि जब बेशुमार दौलत आ जाये, तो इंद्रियसुख ही जीवन का चरम लक्ष्य बन जाये. इन सभी कारणों से भारत के समृद्ध और शासक तबके में यह देह व्यापार बड़ा धंधा बन गया है.
भारत का शासकवर्ग भी इस चक्र में फंसा है. छोटे शहरों, मध्यवर्ग या मामूली लोगों के बीच कालगर्ल रैकेट पकड़ा जाना या देह व्यापार के मामले तो रोज मीडिया में छाये रहते हैं. बड़े शहरों से छोटे शहरों तक यह सामाजिक रोग पसर गया है. किसी भी समाज के लिए यह सबसे चुनौतीपूर्ण और चिंताजनक, नैतिक सवाल है.
पर भारत के शासकवर्ग (इलीट या रूलिंग क्लास) के बीच यह सब जो हो रहा है, वह सवाल देश में क्यों नहीं उठ रहा? न राजनीति में इसकी चर्चा होती है, न विधायिका में सवाल उठते हैं. नौ अप्रैल को देश के मशहूर अखबार दक्कन हेराल्ड में छह कालम की एक बड़ी खबर छपी थी. एक फिल्म नायिका की गिरफ्तारी से आंध्र प्रदेश के बड़े आला अफसरों-शासक-राजनेताओं और उद्योगपतियों के रंगीन किस्से उछले. हाल में, हैदराबाद में तारा चौधरी नाम की एक एक्ट्रेस (नायिका) की गिरफ्तारी हुई. उसके घर से पुलिस को भारी मात्रा में वीडियो भंडार मिला.
फोटोग्राफ मिले. आडियो क्लिप्स मिले, जिनमें आंध्र के अनेक महत्वपूर्ण लोग हैं. इस पूर्व अभिनेत्री को पुलिस ने ‘प्रिवेंशन आफ इम्मारल ट्रैफिकिंग एक्ट’ के तहत गिरफ्तार किया है. गिरफ्तार होते ही तारा चौधरी ने धमकी दी कि वह अनेक राजनेताओं, बड़े पुलिस अफसरों, आइएएस अफसरों और उद्योगपतियों का सच जाहिर कर देंगी. उन्होंने पिछले तीन महीनों में, आठ सौ से अधिक महत्वपूर्ण लोगों को फोन किये हैं.
सिर्फ बड़े और ताकतवर लोगों को. इन सबसे उनकी मीठी और आत्मीय बातों का विवरण भी मिला है. गिरफ्तारी होते ही, हैदराबाद के सबसे पाश इलाके बंजारा हिल के अपने घर में, तारा चौधरी ने पुलिस इंस्पेक्टर के सामने ही मुख्यमंत्री किरण रेड्डी की सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री से अत्यंत आत्मीय और अंतरंग बातें कीं. अपनी ताकत और पहुंच बताने के लिए. वह इंस्पेक्टर सन्न रह गया. कई फिल्मों में काम कर चुकीं तारा चौधरी, फिल्म में काम करने के लिए आनेवाली लड़कियों या एक्सट्राज को देह व्यापार के लिए विवश करती थीं. विशाखापत्तनम से आयी एक लड़की ने विवश होकर इसका भंडाफोड़ किया.
पुलिस के अनुसार तारा चौधरी का ताल्लुक मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और बेंगलुरु में लगे देह व्यापार के लोगों या गिरोहों से है. कार्यकारी संबंध भी हैं. पुलिस के अनुसार तारा चौधरी का संपर्क अनेक सांसदों, अनेक विधायकों, अनेक मंत्रियों, अनेक आइपीएस और आइएएस अफसरों से है. सिर्फ आंध्र के ताकतवर लोगों से ही नहीं, देश के कई अन्य हिस्सों के महत्वपूर्ण लोगों से भी. पुलिस के अनुसार उत्तर-पूर्व राज्य के एक मुख्य सचिव का उल्लेख तारा चौधरी की डायरी में ‘स्वीट कस्टमर’ के रूप में है. एक अवकाश प्राप्त एडीजी (पुलिस) का भी नाम है.
इसी तरह अप्रैल 2012 के अपने अंक में, मशहूर पत्रिका द कारवां (ए जरनल ऑफ पालिटिक्स एंड कल्चर) की आमुख कथा है, रूम सर्विस (इंसाइड द बूमिंग फाइव स्टार सेक्स ट्रेड). इस आमुख कथा का भावार्थ है, पांच सितारा होटलों में बढ़ता व फलता-फूलता सेक्स धंधा. महबूब जिलानी का यह एक गंभीर अध्ययन रिपोर्टताज है.
सप्लाई एंड डिमांड (मांग और आपूर्ति) शीर्षक के तहत. इसमें बताया गया है कि दिल्ली के उच्चतर तबके में सेक्स के वाणिज्यिक या बाजारू धंधे के अंदर का जीवन क्या है? बड़े अखबारों में खुलेआम विज्ञापन आते हैं, गर्लफ्रेंड एक्सपीरियंस (महिला मित्र का अनुभव). ‘विद ए वूमन, हू इज एन एबसोल्यूट डीलाइट (उस महिला का साथ, जो संपूर्ण आनंद है). अप्रैल 2011 में दिल्ली पुलिस ने मशहूर सोनू पंजाबन को पकड़ा, जो अत्यंत आक्रामक महिला के रूप में यह धंधा चलाती थी. 2005 में दिल्ली पुलिस ने कंवलजीत सिंह नाम के एक व्यक्ति को पकड़ा, जो लगभग दो दशकों से इस धंधे में रहा. अत्यंत मामूली शुरुआत कर. तब सिर्फ दिल्ली में बड़े लोगों का यह सेक्स रैकेट पांच सौ करोड़ के धंधे में बदल चुका था.
वह सुंदर अभिनेत्रियों को लाता था, मॉडल्स को लाता था, बार डांसर को लाता था. हांगकांग, थाइलैंड और सिंगापुर तक उसके ग्राहक फैले थे. पुलिस के उपायुक्त अशोक चांद के अनुसार वह बॉलीवुड की अभिनेत्रियों से लेकर टॉप मॉडल्स या सुंदर से सुंदर औरतों को अपने रैकेट से जोड़ चुका था. इसी तरह 2010 में इच्छाबाबा को पुलिस ने पकड़ा, जो दिन में धर्म का धंधा करता था, रात में सेक्स रैकेट का धंधेबाज था. कंवलजीत सिंह के जाल में 300 महिलाएं थीं. उसकी गिरफ्तारी के बाद ये महिलाएं दिल्ली के दूसरे गैंग इच्छाबाबा (शिवमूरत द्विवेदी) और सोनू पंजाबन के खेमे में चली गयीं. दिल्ली के एक बड़े अखबार में एक पुलिस अफसर के हवाले से आयी रिपोर्ट के अनुसार, सिर्फ रूस और पूर्व सोवियत संघ के देशों से आकर 3500 से अधिक लड़कियां-महिलाएं दिल्ली में इस धंधे में हैं.
द कारवां की इस रिपोर्ट कथा में इस धंधे में लगे अनेक लोगों के उभरने-फैलने और बड़ा बनने का ब्योरा है. यह एक अत्यंत गंभीर पत्रिका है. समाज के गंभीर सवालों पर गहराई से विवेचन-विश्‍लेषण करनेवाली. इसमें विश्व प्रसिद्ध लोग लिखते हैं. उस पत्रिका में इस प्रसंग की चीजें, गहराई से तहकीकात के बाद छपना समाज की सेहत का संकेत का संकेत है.
दरअसल, इस देह व्यापार की दुनिया की बारीकियों को बताना यहां मकसद नहीं है, बल्कि सावधान करना है कि देह व्यापार के इस जाल में देश का शासक वर्ग डूब-उतरा और तैर रहा है.
जिस मुल्क का शासकवर्ग इंद्रियजीवी हो जाये, उस मुल्क का क्या भविष्य होगा? आजादी की लड़ाई के बड़े नेताओं की मूल ताकत क्या थी? इसके अनेक पहलू हैं, पर एक प्रमुख कारण रहा, उनका चरित्र. प्रेम और देह व्यापार अलग-अलग हैं. प्रेम या आत्मीय लगाव, सहज मानवीय घटना है. पर इंद्रियसुख का गुलाम बनना पतन का संकेत है. दुनिया में जासूसी के अनेक प्रकरण हैं, जहां सौंदर्य के बल मुल्कों की संवेदनशील सूचनाएं निकाल ली गयीं.
इसलिए आज भी अमेरिका या ब्रिटेन या पश्चिम के अन्य देशों में खुला माहौल है, सेक्स संबंधों में पूरब के देशों की तरह स्थिति नहीं है, फिर भी जब शासकवर्ग में किसी व्यक्ति के संबंध, शादी के दायरे से बाहर के उजागर होते हैं, तो तूफान खड़ा हो जाता है. बहुत पहले ब्रिटेन में एक ताकतवर मंत्री को एक महिला से विवाहेत्तर संबंध होने के कारण पद छोड़ना पड़ा.
क्लिंटन का प्रसंग लोग अभी भूले नहीं होंगे. जब शासकवर्ग नैतिक रूप से कमजोर होने लगे, तो मुल्क की जड़ें या नींव कमजोर होने लगती है. कोई भी देश या समाज अपने शासकवर्ग के चरित्र की आभा से ही मजबूत होता है. जो देह के लिए बिकते हैं, वे देश क्या चला पायेंगे?
दिनांक 22.04.2012
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