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Constitution Day: संविधान सभा में शामिल थे झारखंड के बोनीफास लकड़ा, जयपाल सिंह मुंडा की भी थी अहम भूमिका

संविधान सभा के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों की पहचान और अस्मिता को संविधान निर्माताओं के समक्ष वृहद रूप से रखा.

By Prabhat Khabar Print Desk
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संविधान सभा के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा भी थे
संविधान सभा के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा भी थे
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लंबे संघर्ष और हजारों शहादत के बाद आजादी मिली. आजाद भारत में हमें संविधान ने ताकत दी. संविधान देश की आत्मा है. जन-जन की आकांक्षाओं, आशाओं और न्याय का प्रतिबिंब है. संविधान वह पवित्र ग्रंथ है, जिसका हर एक शब्द देशवासियों को आजादी व उनके अधिकारों का अहसास कराता है. कर्तव्यों की याद दिलाता है. संविधान दिवस पर विशेष प्रस्तुति.

संविधान के तहत ही सरकार का भी गठन होता है हमारे देश में

सिविल और क्रिमिनल मामलों के वरिष्ठ अधिवक्ता विश्वजीत मुखर्जी ने कहा कि संविधान देश का मूल दस्तावेज है. हमारे देश के संविधान को देश के सभी कानून की जननी माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट या हाइकोर्ट सभी का निर्माण संविधान द्वारा हुआ है और वहां भी संविधान के निहित कानून को ही माना जाता है. देश का सारा कानून संविधान से संचालित होता है. हमारे देश का संविधान लिखित है, जबकि इंग्लैंड का संविधान मौखिक है. इंग्लैंड में पूर्व में दिये गये निर्णय के आधार पर कानून काम करता है. हमारे देश में सरकार भी संविधान के तहत ही निर्मित होती है. संविधान के बाहर हम कुछ नहीं कर सकते. वह गैरकानूनी माना जायेगा. कोई भी कानून संविधान के अनुरूप ही बनाया जाता है. जो कानून संविधान के अनुरूप नहीं बना है, वह मान्य नहीं होता है. संविधान के तहत ही टैक्स लगाया जाता है. निजी तरीके से कोई टैक्स भी नहीं लगाया जा सकता.

हमारा देश प्रजातांत्रिक देश है. यहां का चुनाव आयोग भी संविधान के तहत चलता है और चुनाव कराता है. देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्य के मुख्यमंत्री सभी संविधान के तहत ही बनाये जाते हैं और वे सभी संविधान का पालन करते हैं. संविधान के अंदर अलग-अलग आर्टिकल हैं, जिसके आधार पर हमारे देश में कानून बनाया जाता है. संविधान के किसी भी आर्टिकल में संशोधन के लिए सरकार को दो तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है. उसके बाद ही संविधान में संशोधन संभव है. मौलिक अधिकारों को संविधान ही संरक्षित करता है. महिलाएं मौलिक अधिकार व कानून द्वारा आज अपनी रक्षा कर रही है. उनके शोषण व अन्य तरह के अपराध को रोकने के लिए बना कानून संविधान में लिखित है, उसे ही अपने देश में माना जाता है. धर्म की रक्षा का अधिकार संविधान द्वारा ही देता है.

जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका

संविधान सभा के सदस्य के रूप में जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासियों की पहचान और अस्मिता को संविधान निर्माताओं के समक्ष वृहद रूप से रखा. उन्होंने ही सबसे पहले अलग झारखंड राज्य की परिकल्पना की थी. आदिवासियों के हक की बात की. संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा का भाषण हमेशा याद किया जायेगा. जब उन्होंने कहा था कि पिछले छह हजार साल से अगर इस देश में किसी का शोषण हुआ है, तो वे आदिवासी ही हैं. अब भारत अपने इतिहास में एक नया अध्याय शुरू कर रहा है, तो हमें अवसरों की समानता मिलनी चाहिए. 1939 जनवरी में उन्होंने आदिवासी महासभा की अध्यक्षता ग्रहण कर बिहार से अलग एक अलग झारखंड राज्य की स्थापना की मांग की थी. इसके बाद जयपाल सिंह देश में आदिवासियों के अधिकारों की आवाज बने. उन्होंने संविधान सभा में देश की आदिवासियों के बारे में सकारात्मक ढंग से अपनी बात रखी थी. इन्हीं के नेतृत्व में 1928 में ओलिंपिक में भारत ने हॉकी का गोल्ड मेडल जीता था.

संविधान सभा में शामिल थे लोहरदगा के बोनीफास लकड़ा

भारतीय लोकतंत्र के लिए संविधान निर्माण में झारखंड (तब अविभाजित बिहार) का भी अविस्मरणीय योगदान रहा है. 13 दिसंबर 1946 को संविधान निर्माण के लिए डॉ भीमराव आंबेडकर की अध्यक्षता में जिस संविधान सभा का गठन हुआ, उसमें देश भर से चयनित 299 सदस्य थे. इनमें लोहरदगा के बोनीफास लकड़ा भी शामिल थे. उनका जन्म चार मार्च 1898 को लोहरदगा के दोबा गांव में हुआ था. जबकि, उनका देहावसान आठ दिसंबर 1976 में हुआ था. स्व बोनीफास लकड़ा ने छोटानागपुर और संताल परगना (वर्तमान झारखंड) के आदिवासियों के लिए सुरक्षा प्रावधानों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी. एग्रीकल्चर में स्नातक, उसके बाद एमए और फिर वकालत करने के बाद उन्होंने शोषित आदिवासियों को न्याय दिलाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी.

वर्ष 1928 में एलएलबी की डिग्री लेकर उन्होंने वकालत का सफर शुरू किया. उन्होंने संविधान सभा में छोटानागपुर प्रमंडल व संथाल परगना को मिला कर स्वायत्त क्षेत्र बनाने, इसे केंद्र शासित राज्य का दर्जा देने, सिर्फ आदिवासी कल्याण मंत्री की नियुक्ति, जनजातीय परामर्शदातृ परिषद (टीएसी) के गठन की समय सीमा तय करने, पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में सभी सरकारी नियुक्तियों पर टीएसी की सलाह व उसके अनुमोदन, विशेष कोष से अनुसूचित क्षेत्रों के समग्र विकास की योजनाएं लागू करने और झारखंडी संस्कृति की रक्षा की वकालत की थी. वर्ष 1937 में रांची सामान्य सीट से कैथोलिक सभा के प्रत्याशी के रूप में वे विधायक (बिहार प्रोविंसियल असेंबली के सदस्य) चुने गये.

दयामनी बारला, समाज सेविका: बुनियादी उद्देश्य को पूरा करनेवाले कानून भी अब तक नहीं लागू हो सके

राज्य को बने 21 वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन कानून-व्यवस्था को मजबूत बनाने पर ध्यान नहीं दिया जा रहा. वर्ष 2001 में झारखंड औद्योगिक कानून-2001 और झारखंड पंचायती राज कानून-2001 को पारित किया गया. इन 21 वर्षों में दर्जनों का कानून बनाये गये. हालांकि राज्य के लोगों की बुनियादी सुविधा की पूर्ति के लिए इनका उपयोग नहीं किया गया. आंदोलनकारियों ने जल, जंगल और जमीन के लिए लड़ाई लड़ी और राज्य को अलग कराया. बावजूद इसके राज्य में तैयार कानून का लाभ लोगों को ही नहीं मिल रहा. उदाहरण के तौर पर राज्य सरकार ने सीएनटी-एसपीटी कानून में शामिल कई धारा में बदलाव किया, जिसपर लोगों को आपत्ति हुई़ आंदोलन करने पर विवश हो गये. पेशा कानून बने हुए 25 वर्ष हो गये, लेकिन इसके तहत ग्रामसभा को जो अधिकार मिलना था, उसे लागू नहीं किया गया. राज्य सरकार अब तक इसकी नियमावली तैयार नहीं कर सकी है. इसके अलावा रोजगार सृजन में भी राज्य की कानून प्रक्रिया फेल है.

बलराम, समाजसेवी : आम जरूरतों के लिए बने हैं कानून

लोगों की आम जरूरतों को पूरा करने के लिए कानून बनाये गये हैं़ हालांकि वैसे लोग जो संविधान के जानकार हैं, वे इस दिशा में काम नहीं करते. जन समूह के नेता अक्सर लोगों से कहते हैं कि पार्टी विशेष ने उन्हें हक दिलाया. भूल जाते है कि संविधान में चिह्नित कानून लोगों के लिए ही हैं. संविधान समाज को समानांतर बनाये रखने की सीख देता है, लेकिन समाज में इसके विपरीत काम होता है. सरकारी योजनाएं या आम सुविधा के बंटवारे में भी लोगों को आर्थिक और सामाजिक असमानता का सामना करना पड़ता है. नेचुरल जस्टिस की प्रक्रिया सरल होनी चाहिए, पर प्रशासनिक व्यवस्था से यह कठिन हो जाता है. समाज को संविधान के कानून का जानकार बनना होगा.

भारत की आत्मा है संविधान

भारतीय संविधान लिखित रूप में सबसे बड़ा संविधान है. यह देश की आत्मा है. हर साल 26 नवंबर को मनाया जानेवाला ‘संविधान दिवस’ हमें अपने अधिकारों व कर्तव्यों को याद करने का दिन होता है. संविधान प्रदत्त अधिकारों की जानकारी कम लोगों को होती है. लोग अपने अधिकार के प्रति सजग रहते हैं, लेकिन कर्तव्य भूल जाते हैं. इसलिए संविधान में दिये गये कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य बनाया जाना चाहिए. यह प्रत्येक भारतीय का कर्तव्य बनता है कि वह अपने देश के प्रति प्रेम रखे. भारत की एकता व अखंडता को बनाये रखने में अपना सहयोग करें. संविधान के प्रावधानों के आलोक में भारत में कानून बनाये और लागू किये जाते हैं. संविधान के दायरे में सभी भारतीय एक समान हैं.

आरएस मजूमदार, झारखंड हाइकोर्ट के पूर्व महाधिवक्ता

भारत का संविधान विश्व में सबसे अच्छा

भारत का संविधान विश्व का सबसे अच्छा संविधान है. इसका अनुसरण विश्व के अन्य देश भी करते हैं. हमारा संविधान लिखित है, हर क्षेत्र का वर्णन किया गया है. हमारे संविधान में हर जाति, धर्म को सुरक्षा दी गयी है. दबे-कुचले, अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए भी संविधान में कई कानून बनाये गये हैं. भारत के लिखित संविधान के कानूनी पहलुओं को इनकी बारीकी के कारण विश्व में सम्मान मिलता है. माैलिक अधिकार के संबंध में संविधान में उल्लेख है, जिसमें राष्ट्र के प्रति दायित्व के संबंध में बताया गया है. भारत के नागरिकों को ये मौलिक अधिकार दिये गये हैं कि वे देश में कहीं भी भ्रमण कर सकते है, व्यापार कर सकते हैं, इतना ही नहीं किसी भी प्रदेश के नागरिक भारत में कहीं भी रह सकते हैं.

संजय विद्रोही, अधिवक्ता

संविधान दिवस भारतीयों की प्रतिज्ञा का दिन है

26 नवंबर संविधान दिवस हम भारतीयों की प्रतिज्ञा का दिन है. संविधान प्रतिज्ञा के साथ लिखा गया था. प्रतिज्ञा है कि भारत के लोग देश की एकता व अखंडता बना कर रखेंगे. प्रतिज्ञाअों को याद कर उसे अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है. डॉ भीमराव आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा के विदाई समारोह में कहा था कि संविधान बना कर विभिन्न राज्यों को एक राष्ट्र में बांधा गया है. हजारों जातियां हैं और कई धर्म के मतावलंबी हैं. जात-पात से ऊपर उठ कर लोगों को भारतीय बनना होगा. भारत को एक राष्ट्र बना कर रखना है, तो हमलोगों को पहले भारतीय बनना होगा. जन-जन में चाहे वह पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ हो, उसमें भारतीयता की भावना लानी होगी.

राजीव शर्मा , हाइकोर्ट के वरीय अधिवक्ता

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