Food Tips: हांडी के पकवानों के जायके

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हांडी कहिए या हंडिया, इसका एक गुण यह भी है कि वह तरी का कुछ अंश सोख ही लेती है. शोरबा गाढ़ा करने के लिए देर तक पकाने की जरूरत नहीं होती. हांडी में पकायी गयी दाल या सालन का मजा निराला होता है.

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पुष्पेश पंत

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भारतीय खानपान में हांडी का खास स्थान है. मुहावरे याद दिलाते हैं कि ‘काठ की हांडी दोबारा चूल्हे पर नहीं चढ़ायी जा सकती’, तो अवध की ‘बावली हांडी’ की नबाबी नजाकत और नफासत वाली अदा निराली है. यह कभी कभी दीवानी हांडी भी कहलाती है. हकीकत यह है कि इसका कोई रिश्ता दीवानेपन या बावलेपन से नहीं. मिट्टी के इस पात्र में जो व्यंजन धीमी आंच पर बनाया जाता था, वह कई मौसमी सब्जियों का जायकेदार मिश्रण होता था. जब इसमें मांस पकाया जाता, तो गर्मियों में व्यंजन को हल्का बनाने के लिए उसमें गाजर, आलू, तोरी आदि शामिल किये जाते थे. इतिहासकारों की राय है कि पानी की बावली के पास में छायादार स्थान पर चैन से बैठकर पिकनिक की तरह जिस भोजन का आनंद लिया जाता था, उसी के आधार पर इसका नामकरण हुआ है.

मिट्टी की हांडी में जो कुछ भी पकाया जाता है, उसमें माटी की हल्की सी सोंधी सुगंध अनायास रच बस जाती है. जो गर्मियों में राहत देने वाले ‘गिल’ नामक इत्र की याद दिलाती है. हांडी कहिए या हंडिया, इसका एक गुण यह भी है कि वह तरी का कुछ अंश सोख ही लेती है. शोरबा गाढ़ा करने के लिए देर तक पकाने की जरूरत नहीं होती. हांडी में पकायी गयी दाल या सालन का मजा निराला होता है. आजकल लोकप्रियता हासिल करता चंपारन गोश्त इसका एक उदाहरण है, तो पाकिस्तान का चिप्पा गोश्त दूसरा.

गुजरात में हांडवो/ऊंधिया नामक जो जायकेदार शुद्ध शाकाहार पेश किया जाता है, उसकी जान हांडी में पकना ही है. यह एक सूखा व्यंजन है, जो जमीन में दबाकर पकाया जाता है. यह जरूरी नहीं कि हांडी में पके व्यंजन का सुख लेने के लिए यह जरूरी नहीं कि बर्तन मिट्टी का ही हो. इस आकार के धातु के बर्तन में भी यह रस निष्पत्ति संभव है. जो बिरयानी आज पांच-सात तारा छाप होटलों में बिकती है, उसे चीनी मिट्टी के ग्लेज्ड पौटरी में ही दम दिया जाता है. विदेश में ‘कैसरोल कुकिंग’ का प्रचलन है, जिसे हांडी शैली का ही एक रूप कह सकते हैं. दाल गलाने के लिए खौलते पानी की मात्रा काफी रखनी होती है, अन्यथा इस पद्धति में बहुत कम पानी की दरकार है. जो चीजें पकायी जाती हैं, वह जो आर्द्रता छोड़ती है, उनकी तरावट की भाप ही यथेष्ठ होती है और कुदरती जायका बरकरार रहता है.

हांडी में पकाये जाने वाले अन्य प्रादेशिक व्यंजनों में ओडिशा का हल्दी पानी नामक पल्ला गोश्त हमें बहुत पसंद है. पूर्वोत्तर के राज्यों के जनजातीय समुदायों में अधिकांश सामग्री बिना मसालों और तेल के हांडी में ही पकायी जाती है. शहरीकरण-आधुनिकीकरण-पश्चिमीकरण ने हमारा नाता हांडी से तोड़ दिया है. मिट्टी की हांडी के दर्शन दरिद्र तबके के चूल्हे-चौके में होते हैं. यह जायका हम भूलते जा रहे हैं. हां, एक दो अपवाद हैं- हांडी में बिकने वाले ठंडे रसगुल्ले या संडीला के बूंदी के लड्डू. पर ये भी लुप्त होने लगे हैं. गर्मी के कष्ट को दूर करने वाले मिट्टी के अन्य पात्र भी कम दिखलायी देते हैं- मटके, सुराहियां आदि. पानी से तर लाल कपड़े से ढंके मटके वाले जलजीरे का मुक़ाबला बोतलबंद मिनरल जल से तैयार चटपटा पानी कतई नहीं कर सकता, पर सेहत की फिक्र करने वालों की प्रदूषण विषयक आशंकाओं ने इसे संकटग्रस्त कर दिया है.

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