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World Blood Donor Day 2020: हर तीन में से एक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार पड़ती है रक्त की जरूर, महिलाएं भी रक्तदान में नहीं हैं पीछे

Updated at : 14 Jun 2020 8:42 AM (IST)
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World Blood Donor Day 2020: हर तीन में से एक व्यक्ति को अपने जीवन में एक बार पड़ती है रक्त की जरूर, महिलाएं भी रक्तदान में नहीं हैं पीछे

Blood Donation Day 2020: एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर तीन सेकेंड पर किसी-न-किसी को रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है और हर तीन में से एक व्यक्ति को अपने पूरे जीवन में एक-न-एक बार रक्त की जरूरत होती है. केंद्रीय ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन की वर्ष 2018 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 13.5 करोड़ यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है, जबकि मात्र 11 करोड़ यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है. वैश्विक स्तर पर देखा जाये, तो भारत में रक्त की यह कमी दुनिया भर में सबसे ज्यादा है. इसकी दो प्रमुख वजहें हैं. एक तो भारत में रक्तजनित बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की अधिक संख्या और दूसरे रक्तदान को लेकर लोगों के मन में भ्रांतियां. हालांकि साल-दर-साल रक्तदाताओं की संख्या बढ़ रही है, जिनमें कई महिलाएं भी शामिल है. आज 'वर्ल्ड ब्लड डोनर डे' के अवसर पर जानें ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में.

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Blood Donation Day 2020: एक अनुमान के मुताबिक भारत में हर तीन सेकेंड पर किसी-न-किसी को रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती है और हर तीन में से एक व्यक्ति को अपने पूरे जीवन में एक-न-एक बार रक्त की जरूरत होती है. केंद्रीय ड्रग स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन की वर्ष 2018 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रतिवर्ष 13.5 करोड़ यूनिट ब्लड की जरूरत पड़ती है, जबकि मात्र 11 करोड़ यूनिट रक्त ही उपलब्ध हो पाता है. वैश्विक स्तर पर देखा जाये, तो भारत में रक्त की यह कमी दुनिया भर में सबसे ज्यादा है. इसकी दो प्रमुख वजहें हैं. एक तो भारत में रक्तजनित बीमारियों से ग्रस्त मरीजों की अधिक संख्या और दूसरे रक्तदान को लेकर लोगों के मन में भ्रांतियां. हालांकि साल-दर-साल रक्तदाताओं की संख्या बढ़ रही है, जिनमें कई महिलाएं भी शामिल है. आज ‘वर्ल्ड ब्लड डोनर डे’ के अवसर पर जानें ऐसी ही कुछ महिलाओं के बारे में.

हमारे देश में रक्तदान से जुड़ी कई तरह की भ्रांतियां प्रचलित हैं, मसलन- रक्तदान करने से पुरुषों का पौरुष कम हो जाता है, महिलाओं को गर्भधारण में परेशानी होती है या फिर शरीर में रक्त की कमी हो जाती है. ये सारी बातें पूरी तरह से गलत हैं. जो लोग नियमित रूप से रक्तदान करते हैं, वे बताते हैं कि ऐसा कुछ भी नहीं हैं. उल्टे रक्तदान करने से वे खुद को ज्यादा चुस्त-स्फूर्त महसूस करते हैं. साथ ही उन्हें असीम आत्मिक संतुष्टि मिलती है कि उनके रक्तदान करने की वजह से किसी अन्य को जीवनदान मिल सका.

45 किलोमीटर की दूरी तय करके आती हैं रक्तदान करने : प्रियम सिंह

बिहार के सिवान जिला निवासी प्रियम सिंह अपने देश और समाज की बेहतरी के लिए कुछ करने का जज्बा जन्म से ही विरासत में मिला था. शायद इसी वजह से जब उन्हें कोई और तरीका समझ में नहीं आया, तो वर्ष 2017 में 18 वर्ष उम्र की दहलीज पर कदम रखते ही एक दिन वह अकेले ही अपनी बाइक पर सवार हो पहुंच गयी सिवान जिले के सिटी हॉस्पिटल ब्लड बैंक में रक्तदान करने. 12 कक्षा की प्रियम की नाजुक उम्र, मासूम चेहरा और दुबली-पतली काया देख कर अस्पताल वाले भी दंग रह गये.

हालांकि जब उन्होंने प्रियम का हीमोग्लोबिन और वजन चेक किया, तो वह रक्तदाता होने की कसौटी पर खरा निकला और इस तरह हो गयी प्रियम के रक्तदान की शुरुआत. तबसे लेकर अब तक प्रियम नियमित रूप से रक्तदान कर रही हैं. आपको बता दें कि प्रियम सिवान शहर से 45 किलोमीटर दूर बालाकोठी कस्बे में रहती हैं और प्रत्येक चौथे महीने में वहां से रक्तदान करने आती हैं. वह बताती हैं कि ”मेरे दादाजी श्री सकलदेव सिंह भारतीय सैना में थे. उन्होंने देश की सीमा पर ड्यूटी करके अपना फर्ज निभाया और आज एक स्टूडेंट होने के नाते मैं एक रेगुलर डोनर के तौर पर अपना फर्ज निभा रही हूं.

आज मेरे इस निर्णय पर मेरी परिवार को कोई आपत्ति नहीं हैं, उल्टा वे मुझे हमेशा इसके लिए प्रोत्साहित करते हैं और मुझ पर गर्व करते हैं. ब्लड डोनेट करने से मुझे बेहद खुशी मिलती है. मुझसे छोटा एक भाई भी नियमित रूप से रक्तदान करता है.” प्रियम आगे कहती हैं- ”हम दुनिया की सारी बीमारियों के लिए दवाएं और टीके तो लैब में बना सकते हैं, लेकिन दुनिया में ऐसी कोई लैब नहीं, जहां ब्लड बनाया जा सकें. इसकी कमी हम रक्तदान के जरिये ही पूरा कर सकते हैं, इसलिए हर किसी सक्षम व्यक्ति को रक्तदान करना चाहिए.”

किसी की जिंदगी से बढ़ कर नहीं है कोई धर्म : वंदना जायसवाल

”दुनिया के लगभग सभी धर्मों में दान और जरूरतमंदों की सहायता को महत्वपूर्ण माना गया है. खास तौर से हमारे हिंदू धर्म में तो दान-पुण्य का विशेष महत्व है और मेरा मानना है कि रक्तदान से बढ़ कर न कोई दान है और न इससे ज्यादा पुण्य किसी अन्य काम को करने से आपको मिल सकता है.”

– यह कहना है यूपी के चंदौली जिले की रहनेवाली वंदना जायसवाल का. वंदना के दस वर्षीय बेटे को ए-प्लास्टिक एनेमिया है. शुरुआत में जब उसकी बीमारी के बारे में पता चला, तब उसे 15-20 दिनों में रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ती थी, लेकिन पिछले तीन-चार हफ्तों से उसे हर सप्ताह रक्त की जरूरत पड़ने लगी है. एक साधारण घरेलू महिला होने के नाते वंदना को उस वक्त तक न तो ऐसी किसी बीमारी के बारे में कुछ पता था और न ही उन्होंने कभी रक्तदान किया था या करने के विषय से सोचा था, लेकिन जब उनके जिगर के टुकड़े को रक्त की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने रक्तदान करने का निर्णय लिया.

अब तक वह अपने बेटे के लिए चार बार रक्तदान कर चुकी हैं. तीन बार उनके पति ने भी बेटे के लिए रक्तदान किया है. वंदना की मानें, तो बेटे के इलाज के दौरान उन्हें रक्तजनित बीमारियों से पीड़ित कई अन्य बच्चों की तकलीफों को करीब से देखने, जानने और समझने का मौका मिला. इससे प्रेरित होकर वंदना ने निर्णय लिया अब चाहे उनके बेटे को जरूरत पड़े या न पड़े, वह नियमित रूप से हर चौथे महीने में रक्तदान करेंगी. यही नहीं, अब वंदना अन्य लोगों को भी रक्तदान करने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं और यथासंभव अपने संपर्क का उपयोग करके जरूरतमंदों को रक्त उपलब्ध कराने में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं.

हमेशा से थी रक्तदान करने की ख्वाहिश : सुमन अग्रवाल

मूल रूप से राजस्थान की रहनेवाली सुमन अग्रवाल और उनका परिवार पिछले कई वर्षों से पटना में ही रह रहा है. सुमन 23 वर्ष की उम्र से ही, जब वह कॉलेज में पढ़ती थीं, लगातार जरूरत पड़ने पर ब्लड डोनेट करती रही हैं. अब तक वह करीब 10 बार ब्लड डोनेट कर चुकी हैं. उनके परिवार ने भी हमेशा उनके इस काम को भरपूर समर्थन दिया. वर्तमान में सुमन दो बच्चों की मां हैं. बावजूद इसके आज भी रक्तदान का उनका जज्बा पूर्ववत बरकरार है. सुमन रोटरी क्लब की सदस्य हैं और क्लब द्वारा आयोजित रक्तदान शिविरों में बेहद सक्रिय रहती हैं. सुमन से प्रेरित होकर उनके पति भी अब तक कई बार रक्तदान कर चुके हैं. अब वह अपने बड़े बेटे को भी रक्तदान के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं, जो कि इस वर्ष जुलाई में 18 वर्ष का हो जायेगा.

कोरोना आपदा के मद्देनजर कई महिलाओं ने फिलहाल अपनी मेड को काम से छुट्टी दे रखी है. उन्हें लगता है कि ‘ये निम्न तबके के लोग जिन छोटी और संकुचित बस्तियों में आते हैं, उससे संक्रमण फैलने का खतरा है’. ऐसी स्थिति में भी गत अप्रैल माह में जब लॉकडाउन के दौरान सुमन के घर में काम करनेवाली मेड का भतीजा एक रोड एक्सीडेंट में गंभीर रूप से घायल हो गया और उसे तत्काल ओ-पॉजिटिव ब्लड की जरूरत पड़ी, तो सुमन बिना एक पल गंवाये झट से उसे ब्लड डोनेट करने पहुंच गयीं. सुमन कहती हैं- ”मेड के भतीजे के बारे में पता चलने पर एक बार भी मेरे दिमाग में यह ख्याल नहीं आया कि मैं भी संक्रमित हो सकती हूं. उस वक्त मुझे उसकी जान बचाना ज्यादा जरूरी लगा. वैसे भी क्या होता अगर मैं संक्रमित हो भी जाती तो. कोरोना का संक्रमण ठीक हो सकता है, लेकिन अगर खून की कमी के चलते किसी की जान चली जाये, तो वह इंसान दुबारा लौट कर नहीं आ सकता.”

वर्दी के साथ-साथ निभा रही हैं इंसानियत का भी फर्ज : मधुबाला

दिल्ली पुलिस की हेड कॉन्सटेबल मधुबाला पिछले 10 वर्षों से नियमित रक्तदान कर रही हैं. उन्होंने सबसे पहला रक्तदान अपने कॉलेज में आयोजित होनेवाले रक्तदान शिविर में किया था. उसके बाद से उन्हें जब भी दिल्ली में किसी तरह के रक्त की जरूरत के बारे में जानकारी मिलती है, वह वहां रक्तदान करने पहुंच जाती है. मधुबाला को रक्तदान करने की प्रेरणा कहां से मिली, इस बारे में पूछने पर वह कहती हैं- ”जब मैं कॉलेज में थी, तो एक बार किसी अखबार में मैंने पढ़ा था कि समय पर रक्त न मिलने के कारण एक मरीज की जान चली गयी.

उस खबर को पढ़ते ही मुझे यह विचार आया कि हमारे पास अगर वो चीज है, जिसके जरिये हम किसी की जान बचा सकते हैं, तो फिर हम क्यूं न ऐसा करें.” मधुबाला न केवल स्वयं रक्तदान करती हैं, बल्कि अपने संपर्क में आनेवाले अन्य लोगों को भी निरंतर ऐसा करने के लिए प्रोत्साहित करती हैं. पिछले महीने लॉकडाउन के दौरान मधुबाला को दिल्ली एम्स में भर्ती एक ऐसे मरीज के बारे में पता चला, जिसकी हालत काफी गंभीर थी. हालांकि उसे एक यूनिट ब्लड की ही जरूरत थी.

लेकिन दूसरे शहर का होने की वजह उन्हें समुचित मदद नहीं मिल पा रही थी. मुझे अपने एक फ्रेंड से जब यह पता चला, तो मैं उन्हें रक्तदान करने पहुंचीं. वहां जाने पर पता चला उनकी जरूरत पूरी हो गयी है. तब उन्होंने अपने फ्रेंड को कॉल करके कहा- ”यहां तो जरूरत पूरी हो गयी है, लेकिन मैं फिलहाल अस्पताल में ही हूं. अगर किसी और को ब्लड की जरूरत हो, तो बताओ, ताकि उसकी मदद हो जाये. पता चला कि अपोलो अस्पताल, सरिता विहार में एक मरीज को दो-तीनों से ब्लड की जरूरत है, पर उसे डोनर नहीं मिल रहा. तब मैंने तुरंत वहां पहुंच कर उसे ब्लड डोनेट किया.” बता दें कि उस वक्त मधुबाला लोदी रोड में ड्यूटी कर रही थीं, जहां से सरिता विहार की दूरी करीब 10 किलोमीटर है. बावजूद इसके मधुबाला अपने सीनियर से अनुमति लेकर वहां रक्तदान करने गयीं. उनके इस कदम की आज पूरे विभाग में सराहना हो रही है.

रोजा तोड़ कर किया रक्तदान : आलीखा खान

गत अप्रैल माह में लॉकडाउन के दौरान उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की निवासी 29 वर्षीया आलीशा खान ने सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल भी पेश करते हुए एक हिंदू युवक विजय कुमार रस्तोगी के लिए रक्तदान किया.

लीवर की गंभीर बीमारी से जूझ रहे विजय को ओ निगेटिव ब्लड की जरूरत थी. बता दें भारत में मात्र सात फीसदी लोगों का ब्लड ग्रुप ही ओ निगेटिव है. इस वजह से विजय के परिजन कई दिन से रक्त की व्यवस्था के लिए भटक रहे थे, लेकिन एक तो रेयर ग्रुप और दूसरे लॉकडाउन. इस वजह से उनलोगों को कहीं से खून नहीं मिल पा रहा था. तब उन्होंने एक सामाजिक संस्था से संपर्क किया. संस्था के अध्यक्ष ने जब इस बारे में आलीशा को बताया, तो वह तुरंत इसके लिए तैयार हो गयीं. उल्लेखनीय है कि आलीशा उस वक्त रोजे में थीं और शाम होते ही रोजा खोल कर उन्होंने विजय के लिए रक्तदान किया. आलीशा की मानें, तो किसी की जान बचाने से बड़ा कोई धर्म नहीं है.

Posted By: Sumit Kumar Verma

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दिल्ली ब्यूरो is a contributor at Prabhat Khabar.

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