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विनिर्माण क्षेत्र में मंदी से कुछ राहत, लेकिन क्षेत्रीय लॉकडाउन से बाधित हुई मांग: रिपोर्ट

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विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में जून में कुछ स्थायित्व आया, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर लॉकडाउन बढ़ाने के कारण कारोबार की स्थिति बिगड़ी रही.
विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में जून में कुछ स्थायित्व आया, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर लॉकडाउन बढ़ाने के कारण कारोबार की स्थिति बिगड़ी रही.
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एक मासिक सर्वेक्षण के मुताबिक विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में जून में कुछ स्थायित्व आया, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर लॉकडाउन बढ़ाने के कारण कारोबार की स्थिति बिगड़ी रही. आईएचएस मार्किट इंडिया विनिर्माण परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) जून में 47.2 पर रहा. यह सूचकांक मई में 30.8 था. सर्वेक्षण के मुताबिक सुधार के बावजूद भारत में विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियां जून में लगातार तीसरे महीने कम हुईं.

पीएमआई के 50 से ऊपर रहने का अर्थ है कि गतिविधियों में विस्तार हो रहा है, जबकि 50 से कम अंक संकुचन को दर्शाता है. आईएचएस मार्किट के अर्थशास्त्री इलियट केर ने कहा कि भारत का विनिर्माण क्षेत्र जून में स्थिरीकरण की ओर बढ़ा, हालांकि क्षेत्रीय स्तर पर लॉकडाउन को बढ़ाने से मांग में कमी देखी गई. सर्वेक्षण के मुताबिक मांग में लगातार गिरावट के कारण जून में रोजगार में और कमी हुई. बता दें कि लॉकडाउन के कारण उद्योग पूरी तरह से चरमरा गए थे.

अप्रैल महीने में आईएचएस मार्केट इंडिया मैन्यूफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स सूचकांक (पीएमआई विनिर्माण) गिरकर 27.4 अंक पर पहुंच गया था. यह मार्च में 51.8 अंक था. इस सर्वेक्षण के पिछले 15 साल के इतिहास में यह आंकड़ा सबसे तेज गिरावट थी. जबकि पिछले 32 महीनों से विनिर्माण क्षेत्र की गतिविधियों में लगातार तेजी का रुख बना हुआ था. बता दें कि पीएमआई सूचकांक 50 अंक से ऊपर रहना कारोबारी गतिविधियों में तेजी, जबकि उससे नीचे रहना गिरावट को दर्शाता है.

लॉक डाउन में काम बंद रहने के कारण कंपनियों ने अपने कर्मचारियों की संख्या में भारी कटौती की थी जो सर्वे के इतिहास में रोजगार में आई सबसे तेज गिरावट थी. हालांकि इस रिपोर्ट में साल भर के लिए मांग में सुधार का आकलन किया था. कोरोना संकट से उबरने के बाद में बाजार में मांग में तेजी आने की उम्मीद जतायी गयी है. सीएमआईई की रिपोर्ट के अनुसार मार्च तक भारत में बेरोजगारी दर 23 फीसदी था जो अप्रैल में बढ़कर 27 फिसदी हो गया. इस दौरान कई लोगों के रोजगार छिन गए, और कई रिपोर्ट में इस बात का खुलासा भी हुआ था कि बेरोजगारी दर इस संकट की घड़ी में शहरी क्षेत्रों में सबसे ज्यादा थी जबकि ग्रमीण क्षेत्रों में यही दर शहरी क्षेत्रों के मुकाबले कम थे.

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