साधारण परिवार के अनूप राज का औरंगाबाद के सुदूर गांव से हेल्थ केयर स्टार्टअप

By Prabhat Khabar Digital Desk
Updated Date

-विजय बहादुर-

(vijay@prabhatkhabar.in)

मन में आत्मविश्वास हो और दोस्तों का साथ हो, तो कोई भी लक्ष्य मुश्किल नहीं है. यदि दोस्तों और सुपर 30 का साथ न मिला होता, तो शायद अनूप भी उन लाखों-करोड़ों लोगों में होते, जो एक अदद नौकरी की तलाश में दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं. लेकिन, अनूप के मन में पढ़ने की इच्छा थी, उन्हें दोस्तों और अपने टीचर्स का सपोर्ट मिला. लगन तो थी ही. सो सफलता के सोपान चढ़ते गये और वो सब कुछ हासिल किया, जो वह करना चाहते थे. अाज इस स्थिति में हैं कि हर उस ‘अनूप’ की मदद कर सकें, जो अभावों में जी रहा है या अभावों की वजह से कुछ कर नहीं पा रहा. उन्होंने इसकी शुरुअात भी कर दी है. इसलिए जीवन में सफलता की चाह रखनेवाले हर शख्स को अनूप की कहानी पढ़नी चाहिए, ताकि वह जीवन में कभी हताश न हो, निराश न हो, हताशा में कोई गलत कदम न उठाये.

अनूप राज ने 2015 में अपने मित्रों के साथ मिल कर हेल्थ केयर में काम करनेवाली स्टार्टअप कंपनी pstakecare.com बनायी. pstakecare.com पेशेंटस को बहुत ही यूनिक तरीके से सर्जरी संबंधी जरूरतों के लिए सुझाव, मार्गदर्शन और सुविधा मुहैया कराती है. इसमें मरीजों को उनके बजट के अनुरूप सही डॉक्टर और सही हॉस्पिटल तक पहुंचाता है. इतना ही नहीं, मरीज को घर से हॉस्पिटल तक लाने-ले जाने, हॉस्पिटल में किसी काम के लिए असिस्टेंट देना, सर्जरी के बाद घर में देखभाल के लिए नर्स और फिजियोथेरेपिस्ट की व्यवस्था भी करता है. सर्जरी की प्रक्रिया पूरी होने तक एक मरीज के साथ पेशेंट रिलेशन ऑफिसर को तैनात किया जाता है. दो साल में ही pstakecare.com का विस्तार भारत के विभिन्न राज्यों में हो चुका है. विदेशों में भी मेडिकल टूरिज्म पर काम कर रहा है. इसी साल जनवरी में अनूप 25 साल के हुए हैं. अनूप कहते हैं कि वह अपने अब तक के काम से काफी संतुष्ट हैं.

जून, 2014 का समय था. अनूप राज का प्लेसमेंट क्विकर जैसी कंपनी में हुआ. एक लाख रुपये प्रति माह के वेतन पर. बिहार के औरंगाबाद जिले में सुदूर गांव चेनेव में रहनेवाले अनूप के दादा को विश्वास ही नहीं हो रहा था कि किसी को इतनी सैलरी मिल सकती है. अनूप ने दादा को विश्वास दिलाने के लिए उन्हें अपना पासबुक दिखाया. अनूप कहते हैं कि उनका संयुक्त परिवार है. इसमें 22 लोग थे, गांव में खपड़ैल के मकान में रहते थे. दो भाइयों में वे छोटे हैं. पिता रामप्रवेश प्रसाद इतिहास में स्नातक थे. गांव में सबसे पढ़े-लिखे लोगों में थे.

स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद भी पिताजी को नजदीक में कहीं अध्यापन का काम नहीं मिला, तो वह खेती से जुड़ गये. अनूप बताते हैं कि अन्य गांव के बच्चों की ही तरह पांचवीं तक की पढ़ाई उन्होंने घर पर ही की, क्योंकि उग्रवाद की समस्या के कारण स्कूल में प्राइमरी की पढ़ाई बंद हो गयी थी. लेकिन, पिताजी की प्रबल इच्छा थी कि उनके बच्चे पढ़ें. अनूप की भी पढ़ाई में रुचि थी. इसी को ध्यान में रखकर अनूप के पिता ने उनका नामांकन रफीगंज के जैन मिशनरी स्कूल में पांचवीं कक्षा में कराया, जबकि उस स्कूल में जैन के बच्चों का ही नामांकन होता था. वर्ष 2003 में अनूप ने सातवीं कक्षा में रानी बराजराज, रफीगंज में नामांकन ले लिया.

अनूप कहते हैं कि जब आप गांव में रहते हैं, तो आप बहुत कम में भी अपना गुजारा कर पाते हैं, लेकिन जिस दिन बच्चे का नामांकन स्कूल में हो जाता है, गरीब परिवार के लिए किताब व स्कूल यूनिफार्म का खर्च वहन करना बहुत बड़ा चैलेंज बन जाता है. सातवीं कक्षा में ही अनूप को लगा कि उसे अपने पिताजी के आर्थिक बोझ में हाथ बंटाना चाहिए. इसलिए उसने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. इससे उसे लगभग 1,000 रुपये प्रतिमाह आमद होने लगी. स्कूल की फीस भी सिर्फ 10 रुपये प्रतिमाह था. वर्ष 2006 तक सब कुछ बढ़िया तरीके से चल रहा था, लेकिन आठ अगस्त को अनूप के पिताजी बिना किसी सूचना के कहीं चले गये. पूरे परिवार ने उन्हें खोजने की पुरजोर कोशिश की. थाने में भी शिकायत दर्ज करायी, लेकिन कहीं पता नहीं चल सका. इस घटना ने पूरे परिवार को तोड़ कर रख दिया.

अनूप की मां ने काम पर जाना छोड़ दिया. दिन भर रोती थी और उम्मीद में ईश्वर से प्रार्थना करती थी कि उनके पति जरूर लौटेंगे. अनूप दसवीं कक्षा में थे और इस घटना ने उसकी पढ़ाई को भी बुरी तरह से प्रभावित किया. चार महीने तक उसे समझ में ही नहीं आया कि आगे क्या? संयुक्त परिवार के अन्य सदस्यों ने भी अपरोक्ष रूप से बता दिया कि लंबे समय तक वे उनका आर्थिक बोझ उठाने में समर्थ नहीं हैं.

अनूप ने महसूस किया कि उन्हें जीना है, तो धनोपार्जन करना होगा. लेकिन, यह इतना भी आसान नहीं था. लेकिन, दोस्तों और शिक्षकों के मोरल सपोर्ट ने उनका हौसला टूटने नहीं दिया. पढ़ाई करने के साथ-साथ अनूप होम ट्यूशन लेने लगे. 10वीं की परीक्षा में पूरे बिहार में अनूप को 15वां स्थान मिला. उन्होंने गया कॉलेज में नामांकन ले लिया. कॉलेज उनके गांव से 40 किमी था. अनूप सुबह सात बजे रफीगंज से ट्रेन पकड़ कर नौ बजे तक गया पहुंचते और फिर वहां से पैदल चल कर 10 बजे तक कॉलेज पहुंच जाते थे. रफीगंज में ट्यूशन पढ़कर देर शाम घर लौटते थे.

अनूप का यह रूटीन बेहद थकान भरा था. दूसरा कोई रास्ता भी नहीं था. ट्यूशन के पैसे से ही उसके कॉलेज की फीस और अन्य पारिवारिक जरूरतें पूरी होती थी. अनूप ने इंजीनियरिंग को अपना करियर बनाने का निर्णय लिया, लेकिन उसकी आर्थिक हालत प्राइवेट ट्यूशन पढ़ने की इजाजत नहीं दे रहे थे. वर्ष 2009 में पहली बार अनूप ने आइआइटी की परीक्षा दी. अनूप हिंदी माध्यम के छात्र थे और प्रश्नपत्र अंग्रेजी में था. इसलिए ज्यादातर सवाल ही समझ नहीं आया. केमिस्ट्री में तो सिर्फ तीन नंबर मिले. अनूप समझ गये कि आइआइटी की परीक्षा के लिए वे फिट नहीं हैं. वर्ष 2009 में वह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के जनता दरबार में गये और आर्थिक सहायता के लिए आवेदन दिया. उसी दौरान पार्टी कार्यालय में किसी ने सुझाव दिया कि उन्हें सुपर 30 के आनंद कुमार से मिलना चाहिए.

अनूप ने आनंद कुमार से मिलने के लिए इंटरमीडिएट का रिजल्ट निकलने का इंतजार करने लगे. इंटरमीडिएट की परीक्षा में अनूप को गया जिले में पहला स्थान और राज्य में 11वां स्थान मिला. उसके बाद अनूप आनंद कुमार से मिले और अपनी आपबीती सुनायी. आनंद कुमार ने उनका टेस्ट लिया. अनूप पास हो गये. इसके बाद सुपर 30 में अनूप की जगह पक्की हो गयी. निःशुल्क शिक्षा के साथ-साथ रहने और खाने की भी व्यवस्था हो गयी. वर्ष 2010 में ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जाम पास कर अनूप ने आइआइटी मुंबई में सिविल इंजिनियरिंग में दाखिला लिया. लेकिन, आइआइटी मुंबई में शुरुआती एक वर्ष अनूप अपने में ही सिमटे रहे.

हिंदी मीडियम का स्टूडेंट होने के कारण अंग्रेजी में सहपाठियों और टीचर्स से संवाद करने में झिझक महसूस होती थी. सब्जेक्ट को समझने के लिए डिक्शनरी की मदद लेनी पड़ती थी. कुछ महीने के बाद उन्हें लगा कि कंप्यूटर ही उनकी समस्या का समाधान है. यही एक चीज है, जो सीधा मानवीय संवाद से अलग करती है. तीसरे सेमेस्टर तक अनूप नये स्टार्टअप के लिए वेबसाइट और प्रोजेक्ट बना कर प्रति माह 60 हजार रुपये तक कमाने लगे. तीसरे सेमेस्टर में ही इंटर्नशिप के लिए अनूप को दुबई जाने का मौका मिला, जिसने उसे बड़े फलक को समझने और सीखने का मौका दिया. दुबई में काम करने के अनुभव के कारण वर्ष 2014 में क्विकर ने अनूप को अपने यहां एसोसिएट सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में प्लेसमेंट का ऑफर दिया और अनूप ने उसे स्वीकार कर लिया. अनूप बताते हैं कि आइआइटी मुंबई आते समय ही तय किया था कि अपना उद्यम शुरू करेंगे. वर्ष 2015 में उनका सपना साकार हुआ और मित्रों के साथ मिल कर हेल्थ केयर स्टार्टअप pstakecare.com शुरू किया.

अनूप कहते हैं कि उन्हें उनके जीवन में हुए परिवर्तन ने बहुत कुछ सिखाया है. समय किसी का इंतजार नहीं करता है. कोई उसे रोक भी नहीं सकता. आगे बढ़ना है, तो खुद पर भरोसा जरूरी है. आज लगता है कि मैं अपने जैसे कुछ लोगों की, जिन्होंने शून्य से शुरुआत की है, के लिए कुछ कर सकूं, तो मेरे जीवन का मकसद और बेहतर हो जायेगा. अच्छा लगता है, जब मुझे आइआइटी, आइआइएम और अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों में मोटिवेशनल व्याख्यान के लिए बुलाया जाता है. समाज ने मुझे बहुत कुछ दिया है और आज लगता है कि उसे वापस करना मेरी नैतिक जवाबदेही है. इसी मकसद से अपना छोटा-सा क्लास रूम 7classes.com शुरू किया है. इसमें एक बैच में सिर्फ सात बच्चे होते हैं. यहां मैं हायर मैथ पर फोकस करता हूं. इन बच्चों को ओलिंपियाड और मैथमेटिक्सके क्षेत्र में बेहतर करने में मदद करना 7classes.com का उद्देश्य है.

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