US की मुनरो डॉक्ट्रिन; लैटिन अमेरिका का दादा बनने में गिराईं 9 सरकारें, लाखों जानें लीं, अब भी मन नहीं भरा

US Monroe Doctrine in Latin America: संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने 1823 में एक नीति पेश की, जो पश्चिमी गोलार्ध में किसी भी तरह का औपनिवेशिक विस्तार के खिलाफ थी. इसे मुनरो डॉक्ट्रिन कहा गया, जो अमेरिकी प्रभुत्व को स्थापित करती थी, लेकिन समय के साथ इसने लैटिन अमेरिका को संप्रभु देशों के समुदाय की बजाय रणनीतिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के रूप में बना दिया. हाल ही में वेनेजुएला में सरकार गिराने वाले यूएस ने सालों से सरकार गिराने के क्रम में और विस्तार ही किया है. अब तक लगभग 9 सरकारें अमेरिकी की वजह से गिरी हैं, जिसके बाद उन देशों में अस्थिरता आई, लाखों लोगों की जान गईं.

US Monroe Doctrine in Latin America: 3 जनवरी 2026, रविवार तड़के अमेरिकी विशेष बलों ने ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व के तहत काराकस स्थित राष्ट्रपति आवास से वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में लिया और उन्हें विमान के जरिए देश से बाहर ले जाया गया. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की कि मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस पर न्यूयॉर्क में नार्को-आतंकवाद से जुड़े मामलों में मुकदमा चलाया जाएगा. लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई क्षेत्र में अमेरिका के पुराने हस्तक्षेपों से परिचित लोगों के लिए यह परिदृश्य नया नहीं है, किसी नेता को अस्वीकार्य ठहराना, भारी सैन्य दबाव का इस्तेमाल करना और फिर बहुत कम समय में सत्ता परिवर्तन करा देना. यह अमेरिका की मुनरो डॉक्ट्रिन वाली मानसिकत है, जिसने केवल सरकार नहीं गिराई, बल्कि लाखों जान केवल अमेरिका को इलाके का शक्तिशाली देश बनाए रखे.  

किन-किन देशों में मुनरो डॉक्ट्रिन का पड़ा असर

ब्रिटिश गुयाना : 1953 में ब्रिटेन ने अपने उपनिवेश ब्रिटिश गुयाना (अब गुयाना) का संविधान निलंबित कर केवल 133 दिन बाद लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई चेडी जागन की सरकार को हटा दिया था. ब्रिटिश अधिकारियों को आशंका थी कि जागन की सामाजिक-आर्थिक नीतियां उनके व्यापारिक हितों के खिलाफ जा सकती हैं. इसके लगभग दस साल बाद सीआईए ने जागन की बाद की सरकार को कमजोर करने के लिए एक लंबा गुप्त अभियान चलाया, जिसका नतीजा 1964 के चुनावों में धांधली के रूप में सामने आया और उनके प्रतिद्वंद्वी फोर्ब्स बर्नहम को सत्ता में लाया गया.

ग्वाटेमाला : 1954 में ग्वाटेमाला के लोकतांत्रिक राष्ट्रपति जाकोबो आर्बेन्स के खिलाफ तख्तापलट से पड़ी. उनका असली “अपराध” आतंकवाद नहीं, बल्कि भूमि सुधार थे, जिनसे अमेरिकी कंपनी यूनाइटेड फ्रूट के हित प्रभावित हो रहे थे. संदेश साफ था, जो सरकार अमेरिकी आर्थिक हितों को चुनौती देगी, उसका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा. सीआईए समर्थित अभियान ने आर्बेन्स को सत्ता से हटाया और ग्वाटेमाला को दशकों तक सैन्य शासनों और 36 साल लंबे गृहयुद्ध में झोंक दिया. इस संघर्ष में दो लाख से ज्यादा लोग मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासियों की थी. साम्यवाद विरोध के नाम पर चलाए गए इन अभियानों का नतीजा राज्य आतंक, जबरन विस्थापन और गहरे सामाजिक घावों के रूप में सामने आया.

डोमिनिकन रिपब्लिक : 1965 में अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने डोमिनिकन गणराज्य में 22,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक भेजे, ताकि 1963 में हटाए गए पूर्व राष्ट्रपति जुआन बोश की सत्ता में वापसी रोकी जा सके और एक और वामपंथी सरकार बनने से क्षेत्र को बचाया जा सके.

चिली : यहां भी अमेरिकी दबाव और गुप्त कार्रवाइयों ने राष्ट्रपति सल्वाडोर आयेंदे की निर्वाचित सरकार को कमजोर किया और 1973 में ऑगस्टो पिनोशे के तख्तापलट का रास्ता खोला. इसके बाद हजारों लोगों की हत्या या गुमशुदगी हुई और देश को आर्थिक “शॉक थेरेपी” का प्रयोगक्षेत्र बना दिया गया.

निकारागुआ : इस लैटिन अमेरिकी देश में सैंडिनिस्टा आंदोलन (FSLN) द्वारा अमेरिका समर्थित तानाशाही गिराए जाने के बाद वॉशिंगटन ने सरकार विरोधी गुटों को धन, प्रशिक्षण और हथियार मुहैया कराए. यहां तक कि बंदरगाहों में नौसैनिक बारूदी सुरंगें बिछाने के लिए भी उकसाया गया. इस हस्तक्षेप ने देश को लंबे गृहयुद्ध में धकेल दिया और वह पश्चिमी गोलार्ध के सबसे गरीब देशों में शामिल हो गया. यह भी 1970 के दशक तक चला. 

ग्रेनाडा : 1983 में ग्रेनाडा के प्रधानमंत्री मॉरिस बिशप के अपहरण और हत्या के बाद राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने वहां सैन्य हस्तक्षेप का आदेश दिया. रीगन प्रशासन ने इस कदम को अमेरिकी मेडिकल छात्रों की सुरक्षा और ग्रेनाडा को कथित रूप से “सोवियत-क्यूबा प्रभाव” से बचाने के लिए जरूरी बताया था.

पनामा : दिसंबर 1989 में राष्ट्रपति जॉर्ज एच. डब्ल्यू. बुश ने 24,000 अमेरिकी सैनिकों के साथ पनामा पर पूर्ण पैमाने का हमला शुरू किया. इसका उद्देश्य जनरल मैनुअल नोरिएगा को हटाना था, जिन पर मादुरो की तरह मादक पदार्थों की तस्करी के आरोप लगे थे. नोरिएगा को बाद में अमेरिका लाया गया, वहां मुकदमा चलाया गया और जेल भेज दिया गया. हाल ही में वे 45 साल की जेल से रिहा हुए हैं.

हैती : इसके बाद 2004 में हैती के राष्ट्रपति जीन-बर्त्रेंड एरीस्टिड को सत्ता से हटाकर अफ्रीका भेज दिया गया. एरीस्टिड ने इस घटनाक्रम को अमेरिका द्वारा रचा गया तख्तापलट और अपना “अपहरण” करार दिया था. 2022 में फ्रांस और हैती के अधिकारियों ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को बताया कि फ्रांस और अमेरिका ने मिलकर एरीस्टिड को सत्ता से हटाने में भूमिका निभाई थी.

मुनरो डॉक्ट्रिन: हस्तक्षेप की वैचारिक नींव

अमेरिकी नीति की इस सोच की जड़ें मुनरो डॉक्ट्रिन में मिलती हैं, जिसे 1823 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जेम्स मुनरो ने पेश किया था. इसका घोषित उद्देश्य यह था कि यूरोपीय शक्तियां पश्चिमी गोलार्ध में किसी भी तरह का औपनिवेशिक विस्तार न करें. समय के साथ, यह सिद्धांत बदलकर अमेरिकी प्रभाव-क्षेत्र की अवधारणा में तब्दील हो गया, जिसमें लैटिन अमेरिका को संप्रभु देशों के समुदाय की बजाय रणनीतिक नियंत्रण वाले क्षेत्र के रूप में देखा जाने लगा. बाद के दशकों में इसी सोच का इस्तेमाल सैन्य हस्तक्षेपों, तख्तापलटों और सत्ता परिवर्तन को वैध ठहराने के लिए किया गया.

इमरान और शेख हसीना भी अमेरिका का नाम लेने के बाद हुए सत्ता से बेदखल

यहां गौर करने वाली बात है कि पाकिस्तान में इमरान खान और बांग्लादेश में शेख हसीना की सरकार भी कुछ मामलों में सीधे अमेरिका का नाम लेने के ही बाद गई. हालांकि उन्होंने इस मामले में उनके देश से कोई सीधा आरोप नहीं लगाया, क्योंकि इमरान सत्ता से बाहर जेल में हैं और शेख हसीना देश से बाहर भारत में है. अमेरिका के ईराक और लीबिया में झूठे आरोप लगाकर किए गए हमले और सत्ता परिवर्तन को इनमें गिना नहीं गया है. हालांकि, वेनेजुएला का मामला अन्य देशों की अपेक्षा कई मायनों में अलग और ज्यादा चिंताजनक है. यह अमेरिका के बैकयार्ड में है. अमेरिका ने महीनों तक इस देश के खिलाफ खुले तौर पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी और उसे अंजाम देने का संकेत दिया. इन अभियानों के लिए बार-बार बदलते और अस्पष्ट तर्क दिए गए, जिनके समर्थन में ठोस सबूत भी बेहद सीमित रहे. अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ पहले से ही चेतावनी दे रहे थे कि वैश्विक कानूनी व्यवस्था गंभीर दबाव में है.

3 जनवरी की सुबह कराकास के ऊपर जो घटनाएं घटीं, वे भले ही चौंकाने वाली लगें, लेकिन उनका तरीका नया नहीं है. पहले किसी सरकार को असुविधाजनक या खतरनाक घोषित किया जाता है, फिर एकतरफा यह मान लिया जाता है कि उसे हटाने का अधिकार अमेरिका के पास है. वेनेजुएला पर अमेरिका की सैन्य कार्रवाई लैटिन अमेरिका में लंबे समय से चली आ रही सैन्य हस्तक्षेप और सत्ता परिवर्तन की नीति की ही अगली कड़ी है. 1954 में ग्वाटेमाला से लेकर 1989 में पनामा और अब 2026 के ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व तक, वॉशिंगटन ने बार-बार लोकतंत्र और स्थिरता की आड़ में क्षेत्रीय देशों की संप्रभुता और आम लोगों की जिंदगियों को दांव पर लगाया है.

वेनेजुएला: पुरानी नीति का नया अध्याय

ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व इसी ऐतिहासिक परंपरा का नया रूप है. कराकास के आसपास तड़के किए गए हमले, दर्जनों सैन्य विमान और राष्ट्रपति मादुरो की गिरफ्तारी को न्याय और क्षेत्रीय सुरक्षा के नाम पर पेश किया जा रहा है, जबकि आलोचकों का कहना है कि असल उद्देश्य एक ऐसी सरकार को हटाना है जो वॉशिंगटन की पसंद के अनुरूप नहीं है. वेनेजुएला के अधिकारियों के अनुसार शुरुआती हमलों में नागरिकों और सैनिकों की मौत हुई, कई इलाकों में बिजली आपूर्ति ठप हो गई और आम लोग विस्फोटों के डर से घरों में बंद रहने को मजबूर हुए. 

हर नई सैन्य कार्रवाई अंततः उसी पुरानी सच्चाई की याद दिलाती है कि अमेरिका के लिए लैटिन अमेरिका अक्सर पड़ोसी से ज़्यादा एक युद्धभूमि रहा है. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को प्रेसिडेंट ऑफ पीस कहते हैं, दुनिया भर में युद्ध रुकवाने का दावा करते हैं, इसके लिए वे खुद को नोबेल पुरस्कार का सबसे बड़ा दावेदार मानते हैं. लेकिन अब तक वह सीरिया, नाइजीरिया और  कैरिबियाई समुद्र में वेनेजुएला के जहाजों पर हमला करके सैकड़ों लोगों को मारने का आदेश दे चुके हैं. उनकी धमकियां फिलहाल रुकने का नाम नहीं ले रही हैं. उन्होंने ग्रीनलैड कब्जाने के लिए डेनमार्क को धमकी दी है. अगले नंबर के तौर पर कोलंबिया की भी धड़कने बढ़ा दी हैं और ईरान तो उनका पसंदीदा देश है ही, जिस पर उनका निशाना हमेशा तना ही रहता है. 

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