खास बातें
TMC Splits: तृणमूल कांग्रेस को बुधवार को अपने 28 साल के इतिहास में पहली फूट का सामना करना पड़ा. पार्टी के 58 बागी विधायकों ने निष्कासित नेता रीतब्रत बनर्जी को नेता प्रतिपक्ष चुनकर विधायक दल पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. इसके साथ ही उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मान्यता भी प्राप्त कर ली, जिससे ममता बनर्जी की पार्टी अपने गठन के बाद से अब तक के सबसे गंभीर आंतरिक संकट में घिर गयी है.
टीएमसी ने सभी समितियों को किया भंग
कुछ ही घंटों के भीतर, घबराये हुए तृणमूल नेतृत्व ने पूरे पश्चिम बंगाल में पार्टी की सभी समितियों और अग्रिम मोर्चों को भंग कर दिया. यह कदम तेजी से बढ़ते सत्ता संघर्ष के बीच राजनीतिक नियंत्रण वापस पाने की एक कोशिश के रूप में देखा जा रहा है.
विधायकों में गहरी दरार उजागर
विधानसभा चुनाव 2026 में पार्टी की करारी हार के दो महीने के भीतर ही हुई इस नाटकीय बगावत ने संगठन और इसके निर्वाचित विधायकों के बीच एक गहरी दरार को उजागर कर दिया है. इसने नेतृत्व, उत्तराधिकार और उस पार्टी की भविष्य की दिशा पर भी सवाल खड़े कर दिये हैं, जिसका एक दशक से अधिक समय से बंगाल की राजनीति पर दबदबा रहा है.
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स्पीकर को सौंपा 58 विधायकों का समर्थन पत्र
रीतब्रत बनर्जी और उनके साथी एवं निष्कासित विधायक संदीपन साहा के नेतृत्व वाले विद्रोही खेमे ने विधानसभा अध्यक्ष रथींद्र बोस को 58 विधायकों के समर्थन पत्र सौंपे. यह संख्या दलबदल रोधी कानून के तहत एक अलग गुट के रूप में मान्यता प्राप्त करने के लिए आवश्यक दो-तिहाई बहुमत की सीमा को आसानी से पार कर लेती है.
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विधानसभा में हम हैं असली तृणमूल : रीतब्रत
विधानसभा अध्यक्ष से मुलाकात के बाद रीतब्रत ने पत्रकारों से कहा- विधानसभा अध्यक्ष ने हमारे दावे को स्वीकार कर लिया है. संख्याबल के माध्यम से अपनी वैधता का दावा करते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि टीएमसी विधायक दल 58 विधायकों की एक टीम है, जिन्होंने पार्टी के चुनाव चिह्न पर चुनाव जीता है. अब विधानसभा में असली तृणमूल हम ही हैं.
स्पीकर ने बागी गुट के दावे को दी मंजूरी
विधानसभा अध्यक्ष की स्वीकृति ने प्रभावी रूप से उस पार्टी में पहली संगठनात्मक दरार को औपचारिक रूप दे दिया, जिसकी स्थापना ममता बनर्जी ने 1998 में कांग्रेस से अलग होने के बाद की थी. बागी खेमे ने एक नयी नेतृत्व संरचना प्रस्तुत की, जिसमें रीतब्रत को नेता प्रतिपक्ष और अखरुज्जमां को मुख्य सचेतक नामित किया गया. वरिष्ठ विधायकों और पार्टी के पुराने सदस्यों जावेद अहमद खान, संदीपन साहा, सबीना यास्मीन और शिउली साहा को उपनेता नियुक्त किया गया.
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टीएमसी के दिग्गज नेता भी विद्रोही गुट में शामिल
तृणमूल कांग्रेस के तमाम दिग्गज विधायक भी इस विद्रोह में शामिल हो गये हैं, जिनमें समर मुखोपाध्याय, अरूप रॉय, रथीन घोष, जावेद खान और प्रसून बनर्जी जैसे नाम शामिल हैं. हालांकि, बागियों ने सीधे तौर पर ममता बनर्जी के नेतृत्व को चुनौती नहीं दी.
ममता बनर्जी मंजूर, अभिषेक बनर्जी नहीं : बागी विधायक
विधानसभा अध्यक्ष को भेजे गये अपने पत्र में, बागी विधायकों ने ममता बनर्जी को तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष के रूप में मान्यता देना जारी रखा. साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि वे विधायक दल के कामकाज में उनके भतीजे तथा पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के अधिकार को अब और स्वीकार नहीं करेंगे.
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ममता बनर्जी से की मार्गदर्शन करने की अपील
विपक्ष के नेता रीतब्रत ने पूर्व मुख्यमंत्री से विधायक दल का मार्गदर्शन करने की अपील भी की. उन्होंने कहा- हम ममता बनर्जी से अनुरोध करेंगे कि वह विधायक दल के मुख्य सलाहकार की भूमिका निभाएं.
ममता ने कहा- बागियों के कदम अवैध
ममता खेमे ने बागियों के कदम की वैधता पर सवाल उठाये हैं. उनका दावा है कि विधानसभा अध्यक्ष को दी गयी जानकारी पार्टी के आधिकारिक लेटरहेड की बजाय सादा कागज पर जमा की गयी. पार्टी ने कहा कि विधानसभा को इस तरह के किसी भी निर्णय की जानकारी देने का अधिकार केवल पार्टी अध्यक्ष और राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी के पास ही है.
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संसदीय परंपराओं और नियमों के अनुरूप उठाया कदम – रीतब्रत
रीतब्रत ने जोर देकर कहा कि हर कदम संसदीय परंपराओं और विधायी नियमों के अनुरूप उठाया गया है. विद्रोह के तात्कालिक कारणों के तार चुनाव बाद नेता प्रतिपक्ष के चयन को लेकर पैदा हुए विवाद से जुड़े हैं.
TMC Splits: क्या है टीएमसी का पूरा विवाद?
- विवाद तब शुरू हुआ, जब विधानसभा अध्यक्ष को वरिष्ठ तृणमूल विधायक शोभनदेव चट्टोपाध्याय को मान्यता देने के लिए भेजे गये एक प्रस्ताव में कथित तौर पर कई विधायकों के फर्जी हस्ताक्षर पाये गये. इन आरोपों के कारण इस मामले में प्राथमिकी दर्ज की गयी और सीआईडी जांच शुरू हुई.
- खतरे की गंभीरता को भांपते हुए, ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट ने संगठनात्मक मोर्चे पर तेजी से कदम उठाये और सभी संगठनात्मक इकाइयों के पुनर्गठन से पहले उनकी संरचना और कामकाज की व्यापक समीक्षा करने की घोषणा की.
- रीतब्रत तृणमूल कांग्रेस के श्रमिक संघ के प्रदेश अध्यक्ष थे और अभिषेक बनर्जी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव. राजनीतिक पर्यवेक्षकों ने इस कदम को इस स्वीकारोक्ति के रूप में देखा कि यह संकट सामान्य गुटबाजी से कहीं आगे निकल गया है. अब पार्टी पर नियंत्रण के संघर्ष के रूप में बदल चुका है.
महाराष्ट्र में शिवसेना में टूट की दिलायी याद
वर्ष 2022 में एकनाथ शिंदे ने शिवसेना को दोफाड़ किया था और वर्ष 2023 में अजित पवार के नेतृत्व में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का विभाजन हुआ था. बंगाल की यह बगावत भी मूल संगठन पर नियंत्रण की बजाय विधायक दल के भीतर संख्या बल के इर्द-गिर्द बुनी गयी है.
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