गुमनाम पार्टी एनसीपीआई कैसे रातोंरात बन गयी 20 सांसदों वाली पार्टी? पढ़ें पूरी कहानी

How NCPI ‍Became 20 MP Party: पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 में हार के बाद ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ टीएमसी में हुए ऐतिहासिक विद्रोह की इनसाइड स्टोरी जानिए. काकोली घोष दस्तीदार और सुदीप बंद्योपाध्याय के नेतृत्व में 20 बागी सांसदों के महा-विलय के बाद गुमनाम पार्टी एनसीपीआई रातोंरात संसद में बंगाल की सबसे बड़ी पार्टी बन गयी.

How NCPI ‍Became 20 MP Party: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में करारी हार के बाद ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी के खिलाफ वरिष्ठ नेताओं ने मोर्चा खोल दिया. सबसे पहले काकोली घोष दस्तीदार ने विधानसभा चुनाव में हार के लिए ‘भाईपो’ को जिम्मेदार ठहराया. इसके बाद बारी-बारी से वरिष्ठ नेताओं ने मुंह खोलना शुरू किया. जब तक ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी पार्टी में विद्रोह की आहट को समझ पाते, काकोली घोष दस्तीदार के नेतृत्व में 19 सांसदों ने बगावत का झंडा बुलंद कर दिया.

टीएमसी में विद्रोह का फायदा एनसीपीआई को

एक ओर अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (AITC) के राष्ट्रीय महासचिव और डायमंड हार्बर के सांसद अभिषेक बनर्जी बागियों को कुचलने की तैयारी कर रहे थे, तो दूसरी तरफ बागी सांसद अपना संख्याबल बढ़ा रहे थे. राज्यसभा के 3 सांसद अब तक इस्तीफा दे चुके हैं. लोकसभा के 22 सांसदों के बागी होने का दावा काकोली का गुट कर रहा है. इसका फायदा एक गुमनाम पार्टी नेशनलिस्ट सिटिजंस पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) को हुआ.

मई में बगावत, जून में एनसीपीआई में विलय

मई में पार्टी में जो बगावत का दौर शुरू हुआ था, 14 जून को उसने अचानक नया मोड़ ले लिया. ममता बनर्जी के सबसे खास नेता सुदीप बंद्योपाध्याय ने रविवार को बागी गुट के साथ जाने का ऐलान कर दिया. रविवार को ही देर शाम बागी गुट के सांसद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से मिले और उनको बताया कि दो तिहाई बहुमत वाला उनका गुट ही असली तृणमूल कांग्रेस है. उन्होंने पार्टी का एनसीपीआई में विलय कर दिया है.

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राष्ट्रीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बनी पार्टी

इसके साथ ही त्रिपुरा में पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त पार्टी की श्रेणी में रजिस्टर्ड राजनीतिक दल अचानक राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय राजनीति में चर्चा का केंद्र बन गया है. सोमवार को पार्टी ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि लोकसभा में 20 सांसदों के साथ वह पश्चिम बंगाल की सबसे बड़ी संसदीय ताकत बनकर उभरी है. फेसबुक पेज पर ग्राफिक साझा करते हुए पार्टी ने दावा किया कि पश्चिम बंगाल की 42 लोकसभा सीटों में से 20 उसके, 12 भाजपा, 8 तृणमूल कांग्रेस और एक कांग्रेस के पास हैं.

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तृणमूल के बागी सांसदों का सोशल मीडिया पर स्वागत

पोस्ट में कहा गया है कि पार्टी अब संसद में पश्चिम बंगाल की सबसे मजबूत आवाज है. पार्टी ने तृणमूल के सभी बागी सांसदों का अलग-अलग पोस्ट के माध्यम से स्वागत भी किया. बारासात की सांसद काकोली घोष दस्तीदार को लोकसभा में पार्टी का नेता बताते हुए एक पोस्ट भी किया गया था, जिसे बाद में हटा दिया गया.

How NCPI ‍Became 20 MP Party: हावड़ा के हाटगाछा में है मुख्यालय

फेसबुक पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, पार्टी का मुख्यालय हावड़ा जिले के संकराइल थाना क्षेत्र के हाटगाछा गांव में है. स्थानीय लोगों के अनुसार, हाटगाछा निवासी शिउली कुंडू लंबे समय से पार्टी के संगठनात्मक कार्यों से जुड़ी रही हैं. उनके पति उत्तीय कुंडू भी सामाजिक गतिविधियों में सहयोग करते हैं. लोगों ने बताया है कि एनसीपीआई का कार्यालय 2022 से यहां है. 2023 पंचायत चुनाव में पार्टी ने हावड़ा की जोरहाट ग्राम पंचायत की एक सीट पर उम्मीदवार उतारा था.

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कौन हैं उत्तीय कुंडू?

संकराइल की जिस इमारत को पार्टी का पंजीकृत कार्यालय बताया गया है, उसकी दीवारों पर ‘जागो विश्व’ और ‘असंगठित महिला कामगार संघ’ के भित्तिचित्र बने हैं. मुख्य द्वार पर लगे साइनबोर्ड में उत्तीय कुंडू को बांग्ला अखबार के संपादक, गणित शिक्षक, ऑडिटर, स्वास्थ्य सलाहकार और योग साधक बताया गया है. शिउली कुंडू का परिचय कलकत्ता हाईकोर्ट की वकील के रूप में दिया गया है. स्थानीय लोगों के मुताबिक, कुंडू दंपती यहां एक गैर-सरकारी संगठन (एनजीओ) भी चलाते हैं, जो स्वयं सहायता समूहों के सदस्यों को प्रशिक्षण देता है.

बागी सांसदों के एनसीपीआई में शामिल होने से खुश हैं शांतनु दे

खुद को एनसीपीआई का संस्थापक सदस्य और राष्ट्रीय सचिव बताने वाले शांतनु दे ने उत्तर 24 परगना में संवाददाताओं से कहा कि तृणमूल के 20 बागी सांसदों के शामिल होने से पार्टी को मजबूती मिलेगी. उन्होंने कहा कि एनसीपीआई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का समर्थन करती है. पार्टी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के घटक दल के रूप में काम करना चाहती है. सूत्रों ने बताया कि पार्टी के कुछ संस्थापक सदस्य और कार्यकर्ता कभी मुकुल रॉय के करीबी थे.

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Published by: Mithilesh Jha

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