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Gandhi Jayanti: महात्मा गांधी के फिरंगी महल आने पर नहीं खाया जाता था मांसाहार, ब्राह्मण बावर्ची बनाता था खाना

फिरंगी महल में वह कमरा आज भी मौजूद है, जहां महात्मा गांधी ठहरते थे. लखनऊ में कई ऐसे गुट थे जो महात्मा गांधी की मुहिम के विरुद्ध थे और लखनऊ आने पर उन्होंने बापू को काले झंडे भी दिखाए थे. स्वतंत्रता सेनानी और उपन्यासकार हयातुल्लाह अंसारी ने अपने एक लेख 'अवध का नया जन्म' में इसका जिक्र किया है.

Gandhi Jayanti 2023: महात्मा गांधी की जयंती 2 अक्टूबर को पूरे देश में मनाई जा रही है.‌ आजादी के महानायक महात्मा गांधी का लखनऊ से गहरा नाता था. पुराने लखनऊ के नक्खास में फिरंगी महल कोठी इसकी गवाह है. आजादी की लड़ाई के दौरान महात्मा गांधी इसी घर में ठहरते थे. उस वक्त की बड़ी शख्सियत मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली महात्मा गांधी के लिए सारे इंतजाम इसी हवेली में करते थे. वह कमरा अब एक संग्रहालय के तौर पर संरक्षित है.

महात्मा गांधी के शाकाहारी होने के कारण बुलाया जाता था ब्राह्मण बावर्ची

मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली के नगर नाती अदनान ने बताते हैं कि महात्मा गांधी वर्ष 1920 से 1922 के बीच तीन बार फिरंगी महल आए थे. महात्मा गांधी शाकाहारी थे, इसलिए लखनऊ के चौक इलाके से खासतौर से एक ब्राह्मण बावर्ची बुलाया जाता था, जो उनके लिए खाना बनाता था. महात्मा गांधी ने इसका जिक्र अपनी आत्मकथा में भी किया है. उन्होंने बताया कि सबसे खास बात यह थी कि फिरंगी महल के दौरे पर एक बार महात्मा गांधी अपने साथ अपनी बकरी भी लाए थे और एक बार उनकी पत्नी कस्तूरबा गांधी तथा कुछ अन्य रिश्तेदार भी यहां आकर ठहरे थे. इसके दस्तावेजी सुबूत फिरंगी महल में आज भी महफूज हैं.

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महात्मा गांधी के फिरंगी महल आने का ये था मकसद

अदनान बताते हैं कि महात्मा गांधी का फिरंगी महल के दौरे का उद्देश्य आपसी एकजुटता को बढ़ावा देने का था. उस वक्त फिरंगी महल में दो तरह की विचारधाराएं थीं. एक ऐसी विचारधारा थी जिसमें कुछ उलेमा अंग्रेजों के साथ थे और उनका सोचना था कि अंग्रेजों के साथ ही मुल्क की तरक्की मुमकिन है जबकि मौलाना अब्दुल बारी की सोच इससे बिल्कुल अलग थी और उन्होंने महात्मा गांधी के आंदोलन में उनके साथ देने का फैसला किया था. इसी सिलसिले में महात्मा गांधी फिरंगी महल आते थे और यहां स्वाधीनता संघर्ष की रणनीति पर बैठकें होती थी.

महात्मा गांधी को लोगों ने दिखाए थे काले झंडे

अदनान बताते हैं कि वह कमरा हमारे घर में आज भी मौजूद है जहां महात्मा गांधी ठहरते थे. उन्होंने बताया कि लखनऊ में कई ऐसे गुट थे जो महात्मा गांधी की मुहिम के विरुद्ध थे और लखनऊ आने पर उन्होंने बापू को काले झंडे भी दिखाए थे. स्वतंत्रता सेनानी और उपन्यासकार हयातुल्लाह अंसारी ने अपने एक लेख ‘अवध का नया जन्म’ में इसका जिक्र किया है. अदनान ने बताया कि महात्मा गांधी द्वारा मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली को लिखे गए खत और टेलीग्राम आज भी यहां के संग्रहालय में मौजूद हैं. महात्मा गांधी का फिरंगी महल आने का व्यापक संदेश यही था कि देश में आपसी भाईचारा बढ़ाया जाए. मशहूर किस्सागो और ‘कल्चर बाजार’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाने वाले महमूद आब्दी बताते हैं कि महात्मा गांधी ने उस्मानिया सल्तनत के समर्थन में चलाए जा रहे खिलाफत आंदोलन की हिमायत की थी, जबकि मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली ने महात्मा गांधी के स्वाधीनता आंदोलन को समर्थन देने का ऐलान किया था. दोनों के बीच घनिष्ठता का यह बहुत बड़ा कारण था.

अब्दुल बारी फिरंगी महली ने महात्मा गांधी को इस बात के लिए किया राजी

खिलाफत आंदोलन मुसलमानों द्वारा वर्ष 1919 से 1924 के बीच चलाया गया एक राजनीतिक अभियान था, जिसका मकसद प्रथम विश्व युद्ध के बाद उस्मानिया सल्तनत को संरक्षण देने की हिमायत करना था. वर्ष 1919 में मौलाना अब्दुल बारी फिरंगी महली ने महात्मा गांधी को खिलाफत आंदोलन का समर्थन करने पर रजामंद किया. उसी साल मौलाना बारी ने लखनऊ में ऑल इंडिया कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया. इसके बाद ऑल इंडिया सेंट्रल खिलाफत कमेटी की स्थापना की गई. पुराने लखनऊ में स्थित फिरंगी महल अदब और सूफीवाद का बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था.

फिरंगी महल में थे रहते थे फ्रांसीसी व्यापारी

फिरंगी महल दरअसल एक हवेली थी जिसका नाम हवेली फिरंगी था. उसमें फ्रांसीसी व्यापारी रहते थे जो घोड़े और नील का कारोबार किया करते थे. उसमें रहने वाले फ्रांसीसियों ने इस हवेली का कर नहीं चुकाया तो तत्कालीन बादशाह औरंगजेब ने यह हवेली जब्त कर मुल्ला मोहम्मद असद और मुल्ला मोहम्मद सईद को सौंप दी थी. यह हवेली इतनी बड़ी थी कि इसे एक मोहल्ले की तरह माना जाता था और इसके अलग-अलग हिस्सों में हिंदू-मुस्लिम और मुसलमानों के दोनों तबके यानी शिया और सुन्नी सभी रहते थे. धीरे-धीरे और लोगों ने यहां जमीन खरीद कर घर बनाए. पहले इसे मोहल्ला चिराग बेग भी कहा जाता था. इसके आसपास भी फ्रांसीसी लोग रहते थे इसलिए इसे ‘फ्रैंक कॉटेज’ के नाम से भी जाना जाता था. महात्मा गांधी से जुड़ी यादें आज भी फिरंगी महल को बेहद खास बनाती हैं.

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