30 वर्षों से कानपुर के निखिल व पन्ना के हाथों की सेवई बढ़ा रही ईद की मिठास

पड़ोसी जिलों के लोग भी इसका स्वाद लेते हैं

साहिबगंज. हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच भाईचारे और सद्भाव के गंगा-जमनी तहज़ीब को आगे बढ़ाते हुए कानपुर के रहने वाले बहादुर, निखिल और पन्ना, झारखंड के अंतिम छोर पर बसे साहिबगंज जिले में पिछले 30 वर्षों से कानपुरी सेवई बनाकर भाईचारे की मिठास घोल रहे हैं. साहिबगंज के एलसी रोड निवासी हाजी मोहम्मद अरशद अली ने 30 साल पहले कानपुरी सेवई बनाना शुरू किया था. खास बात यह है कि इस काम को आगे बढ़ाने में कानपुर के बहादुर, निखिल और पन्ना अहम भूमिका निभा रहे हैं. हर साल रमज़ान के महीने में वे साहिबगंज आकर कानपुरी सेवई बनाते हैं, जिससे न सिर्फ जिले के लोग बल्कि पड़ोसी जिलों के लोग भी इसका स्वाद ले पाते हैं. दोनों समुदाय निभा रहे एक-दूसरे के त्योहारों में अहम भूमिका सिर्फ कानपुरी सेवई ही नहीं, बल्कि होली के मौके पर यूपी के मुस्लिम युवा छोटे-छोटे ढोल बनाकर बेचते हैं, जिससे हिंदू समुदाय के लोग होली को और धूमधाम से मनाते हैं. यह नज़ारा दिखाता है कि कैसे दोनों समुदाय एक-दूसरे के त्योहारों में अहम भूमिका निभाकर गंगा-जमुनी तहज़ीब को बरकरार रख रहे हैं. साहिबगंज में ही शुरू किया सेवई बनाने का काम हाजी अरशद अली बताते हैं, “कानपुरी सेवई सबसे बेहतर होती है, लेकिन इसे कानपुर से मंगाना महंगा पड़ता था. इसलिए मैंने 30 साल पहले यह फैसला किया कि क्यों न साहिबगंज में ही इसका निर्माण किया जाए. ” उन्होंने इसे बड़े स्तर पर उद्योग के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया, लेकिन कुछ कारणों से यह संभव नहीं हो सका. हालांकि, हर साल रमज़ान में वे इसे तैयार कराते हैं ताकि साहिबगंज और आसपास के जिलों के लोग सस्ते दामों में इसका स्वाद ले सकें. हाजी अरशद अली का कहना है कि वह कानपुर की तुलना में साहिबगंज में बहुत सस्ती दरों पर सेवई उपलब्ध कराते हैं. जहां कानपुर में इसकी कीमत अधिक होती है, वहीं साहिबगंज में यह सिर्फ 200 रुपये प्रति किलो के आसपास मिल जाती है.

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By Abdhesh singh

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