झारखंड के सूचना आयुक्तों की नियुक्ति पर राजभवन का 'ब्रेक', इन नामों पर आपत्ति के साथ फाइल सरकार को लौटाई

Santosh Gangwar: झारखंड सूचना आयोग में आयुक्तों की बहाली को लेकर बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है. राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राजनीतिक दलों से जुड़े चेहरों को सूचना आयुक्त बनाने की फाइल सरकार को वापस कर दी है. नियमों का हवाला देते हुए राज्यपाल ने पूछा है कि किसी राजनीतिक दल से संबद्ध व्यक्ति इस पद पर कैसे हो सकता है? देखिए, कैसे आरटीआई कार्यकर्ताओं की शिकायत और कानूनी नियमों ने सरकार की सिफारिशों पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

Santosh Gangwar, रांची : झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राज्य में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया पर संवैधानिक और कानूनी सवाल उठाते हुए संबंधित संचिका (फाइल) राज्य सरकार को वापस कर दी है. राज्यपाल ने विशेष रूप से उन नामों पर आपत्ति जताई है जो सक्रिय राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं. राजभवन ने मुख्य सचिव को फाइल भेजते हुए इन नामों पर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश दिया है. यह फैसला मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिशों के खिलाफ एक बड़ा कदम माना जा रहा है.

राजनीतिक चेहरों की सिफारिश पर फंसा पेंच

मुख्यमंत्री चयन समिति ने 25 मार्च को वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा के साथ तनुज खत्री (JMM नेता), शिवपूजन पाठक (भाजपा मीडिया प्रभारी) और अमूल्य नीरज खलखो (कांग्रेस महासचिव) के नामों की अनुशंसा राजभवन को भेजी थी. राजभवन को प्राप्त शिकायतों और समीक्षा में यह पाया गया कि इनमें से तीन नाम तनुज खत्री, शिव पूजन पाठक और अमूल्य नीरज खलखो का सीधा संबंध राजनीतिक दलों से है, जो आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों के विपरीत है.

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नियमों की अनदेखी और शिकायत का असर

आरटीआई कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो ने राज्यपाल को लिखित शिकायत भेजकर आगाह किया था कि आरटीआई एक्ट 2005 के अध्याय चार (पारा छह) के अनुसार, राज्य सूचना आयुक्त किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होना चाहिए. वह किसी लाभ के पद पर या संसद/विधानमंडल का सदस्य भी नहीं हो सकता. शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के ‘अंजलि भारद्वाज बनाम भारत सरकार’ मामले का भी हवाला दिया गया, जिसमें नियुक्ति प्रक्रिया में पारदर्शिता और पात्रता को सार्वजनिक करने का निर्देश है.

मुख्यमंत्री के साथ चर्चा और हाईकोर्ट का रुख

फाइल लौटाने से पहले राज्यपाल ने विशेषज्ञों से विधिक राय ली और शुक्रवार को मुख्यमंत्री के साथ इस गंभीर विषय पर विचार-विमर्श भी किया. गौरतलब है कि यह मामला झारखंड हाईकोर्ट में भी लंबित है. महाधिवक्ता ने 1 अप्रैल को कोर्ट को चयन प्रक्रिया की जानकारी दी थी, जिस पर अगली सुनवाई 13 अप्रैल 2026 को होनी है. राजभवन के इस कदम से सरकार की मुश्किल अब कोर्ट में भी बढ़ सकती है.

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Published by: Sameer Oraon

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