रांची: संत मैक्सिमिलियन कोल्बे का शहादत दिवस 14 अगस्त को मनाया गया. इस अवसर पर शुक्रवार को कोकर खोरहाटोली स्थित होली एंजिल्स चर्च में सुबह छह बजे की आराधना में उन्हें विशेष रूप से याद किया गया. मिस्सा आराधना की अगुवाई फादर बाबू वर्गीस ने की. आराधना में फादर रॉबिन थॉमस, पल्ली पुरोहित फादर आनंद सुरीन और डीकन सलमोन मिंज ने सहयोग किया. इस अवसर पर फादर बाबू वर्गीस ने संत मैक्सिमिलियन कोल्बे के जीवन और उनकी शहादत पर प्रकाश डाला.
पोलैंड में हुआ था जन्म
फादर बाबू वर्गीस ने बताया कि संत मैक्सिमिलियन कोल्बे का जन्म 8 जनवरी 1894 को पोलैंड में हुआ था. उनका प्रारंभिक नाम रेमंड था. बचपन में उन्हें कुंवारी मरियम का दर्शन हुआ था. इस अनुभव के बाद उन्होंने पवित्रता और शहादत का मार्ग चुना.
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नाजियों ने ऑश्विट्ज भेज दिया था
द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान नाजी जर्मनी ने पोलैंड पर अधिकार कर लिया था. नाजियों ने यहूदियों और पोलिश लोगों को अपने मठ में छिपाकर रखने के आरोप में मैक्सिमिलियन कोल्बे को गिरफ्तार कर लिया और पोलैंड स्थित नाजी यातना शिविर ऑश्विट्ज भेज दिया. ऑश्विट्ज में कुछ कैदियों को भूखा-प्यासा रखकर मौत की सजा देने के लिए चुना गया था. इनमें फ्रांसिसजेक गाजोनिकजेक नामक एक कैदी भी था. वह सजा की बात सुनकर जोर-जोर से रो रहा था और नाजियों से रहम की गुहार लगा रहा था. यह देखकर मैक्सिमिलियन कोल्बे ने खुद को उसकी जगह प्रस्तुत कर दिया.
दूसरे कैदी की जान बचाने के लिए दी अपनी जान
मैक्सिमिलियन कोल्बे को फ्रांसिसजेक की जगह अन्य कैदियों के साथ एक कमरे में भूखा-प्यासा बंद कर दिया गया. कई दिनों तक उन्होंने लगातार प्रार्थना की. अंतत: 14 अगस्त 1941 को उनकी मौत हो गई. उनके बलिदान और शहादत को बाद में विशेष सम्मान मिला. वर्ष 1981 में पोप जॉन पॉल द्वितीय ने उनकी शहादत को सम्मानित किया. इसके बाद 10 अक्तूबर 1982 को उन्हें संत घोषित किया गया.
