रांची: राष्ट्रीय अध्ययन एवं शोध विधि विश्वविद्यालय (NUSRL), रांची में शनिवार को 'सेंटर फॉर स्टडी एंड रिसर्च इन ट्राइबल राइट्स' (CSRTR) द्वारा करम पर्व की पूर्व संध्या पर एक भव्य समारोह का आयोजन किया गया. इस कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य झारखंड की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, लोक परंपराओं और प्रकृति के साथ आदिवासी समुदाय के गहरे जुड़ाव को उजागर करना और नई पीढ़ी को इससे जोड़ना था.
'करम केवल पर्व नहीं, कर्म और धर्म का प्रतीक है' : डॉ. नारायण भगत
समारोह के मुख्य अतिथि रांची विश्वविद्यालय के डॉ. नारायण भगत ने करम पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और दार्शनिक पहलुओं पर विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि करम पर्व केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह जीवन में किए जाने वाले 'कर्म और उसके फल' की भावना को दर्शाता है. इंसान जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है. वहीं 'धर्म' व्यक्ति को उसके कर्तव्यों और समाज के प्रति नैतिक जिम्मेदारियों का अहसास कराता है.
'समय पर ही गाए जाएं करम के पारंपरिक गीत': डॉ. नारायण भगत
डॉ. नारायण भगत ने करम गीतों के समय-सारणी के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने जिन गीतों को गाने का जो समय निर्धारित किया है, उन्हें उसी समय गाया जाना चाहिए. करम के गीतों में पूर्वजों की जीवन-दृष्टि, सामाजिक नियम और गहरा ज्ञान छुपा हुआ है. ये केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि आदिवासी समाज की जीवन शैली का आधार हैं.
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आदिवासी और गैर-आदिवासी मिलकर मनाते हैं करम: डॉ. नारायण भगत
करम पर्व के ऐतिहासिक विस्तार पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि शुरुआती दौर में यह पर्व मुख्य रूप से मुंडा, उरांव और खड़िया समुदायों तक सीमित था. लेकिन समय के साथ इसकी स्वीकार्यता इतनी बढ़ी कि आज झारखंड में आदिवासी और गैर-आदिवासी, दोनों समुदाय मिल-जुलकर करम पर्व मनाते हैं.
छात्र-छात्राओं ने दी रंगारंग प्रस्तुतियां
समारोह के दौरान विश्वविद्यालय के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक करम पूजा, लोक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं. विद्यार्थियों के पारंपरिक गीतों और मांदर की थाप ने पूरे माहौल को उत्सवमय बना दिया. कार्यक्रम में NUSRL के रजिस्ट्रार, फैकल्टी मेंबर्स और CSRTR के डॉ. राम चंद्र उरांव मौजूद रहे. डॉ. राम चंद्र उरांव ने आदिवासी संस्कृति के संरक्षण और इसके अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर जोर दिया.
