ग्लैडसन डुंगडुंग को मिलेगा 'स्वामी देवानंद चक्कुंगल पुरस्कार', हिन्दी पत्रकारिता में योगदान के लिए होंगे सम्मानित

ग्लैडसन डुंगडुंग, जो झारखंड के एक प्रमुख आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, शोधकर्ता और लेखक हैं, को हिन्दी पत्रकारिता में उनके अमूल्य योगदान के लिए प्रतिष्ठित 'स्वामी देवानंद चक्कुंगल पुरस्कार' से सम्मानित किया जाएगा। यह सम्मान 9 सितंबर को बेंगलुरु में आयोजित एक समारोह में दिया जाएगा.


Award: झारखंड के चर्चित आदिवासी अधिकार कार्यकर्ता, शोधकर्ता और लेखक ग्लैडसन डुंगडुंग को हिन्दी पत्रकारिता में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए प्रतिष्ठित 'स्वामी देवानंद चक्कुंगल पुरस्कार' से सम्मानित किया जाएगा. इंडियन कैथोलिक प्रेस एसोसिएशन (ICPA) ने इसकी आधिकारिक घोषणा की है. यह सम्मान उन्हें आदिवासी समाज के मुद्दों, अधिकारों, संघर्ष और सामाजिक न्याय से जुड़े विषयों को हिन्दी पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी ढंग से सामने लाने के लिए दिया जा रहा है.

9 सितंबर को बेंगलुरु में होगा सम्मान

आईसीपीए की ओर से जारी जानकारी के अनुसार, ग्लैडसन डुंगडुंग को यह पुरस्कार 9 सितंबर 2026 को बेंगलुरु में आयोजित इंडियन कैथोलिक प्रेस एसोसिएशन के वार्षिक सम्मेलन में प्रदान किया जाएगा. इस अवसर पर देशभर के वरिष्ठ पत्रकार, संपादक, मीडिया विशेषज्ञ और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोग मौजूद रहेंगे.

हिन्दी और अंग्रेजी में 500 से अधिक ग्राउंड रिपोर्ट

ग्लैडसन डुंगडुंग पिछले कई वर्षों से पत्रकारिता, शोध और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर सक्रिय हैं. उन्होंने अब तक हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में 500 से अधिक ग्राउंड रिपोर्ट, शोधपत्र और विश्लेषणात्मक आलेख लिखे हैं. उनके लेख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्र-पत्रिकाओं, समाचार पत्रों और संपादित पुस्तकों में प्रकाशित हो चुके हैं. उनकी रिपोर्टिंग का प्रमुख फोकस आदिवासी समाज, विस्थापन, जंगल, जल, जमीन, मानवाधिकार और विकास परियोजनाओं से जुड़े मुद्दे रहे हैं.

35 पुस्तकों के लेखक हैं ग्लैडसन डुंगडुंग

पत्रकारिता के साथ-साथ ग्लैडसन डुंगडुंग एक चर्चित लेखक भी हैं. उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी में अब तक 35 पुस्तकें लिखी हैं. उनकी प्रमुख पुस्तकों में 'Adivasis and Their Forest', 'Endless Cry in the Red Corridor', 'Mission Saranda', 'Whose Country Is It Anyway?', 'Crossfire', 'भारत देश के प्रथम निवासी और मालिक कौन', 'उलगुलान का सौदा', 'असूरों की पीड़ा' और 'विकास के कब्रगाह' शामिल हैं. इन पुस्तकों में आदिवासी समुदायों के इतिहास, अधिकार, संसाधनों पर दावेदारी और विकास के मॉडल से जुड़े सवालों को विस्तार से उठाया गया है.

हाशिये के समाज की आवाज को मिला सम्मान

इंडियन कैथोलिक प्रेस एसोसिएशन के अनुसार, 'स्वामी देवानंद चक्कुंगल पुरस्कार' ऐसी पत्रकारिता को सम्मानित करता है जो उन समुदायों और मुद्दों को मुख्यधारा की सार्वजनिक चर्चा में स्थान दिलाने का प्रयास करती है, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. संस्था का मानना है कि ग्लैडसन डुंगडुंग ने अपनी लेखनी, शोध और जमीनी कार्यों के माध्यम से आदिवासी समाज की समस्याओं, अधिकारों, न्याय, सम्मान और जवाबदेही जैसे विषयों को लगातार राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया है.

मानवाधिकार के क्षेत्र में भी निभाई सक्रिय भूमिका

पत्रकार और लेखक होने के साथ-साथ ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे हैं. उन्होंने पुलिस अत्याचार, फर्जी मुकदमों, मानवाधिकार उल्लंघन और आदिवासी समुदायों से जुड़े सैकड़ों मामलों का अध्ययन और दस्तावेजीकरण किया है. कई मामलों में उन्होंने पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने और न्याय दिलाने के प्रयास भी किए हैं. सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों के मुद्दों पर उनकी सक्रियता को देश-विदेश के कई मंचों पर सराहा गया है.

सामाजिक जिम्मेदारी वाली पत्रकारिता को बढ़ावा

आईसीपीए का कहना है कि हिन्दी पत्रकारिता के लिए दिया जाने वाला 'स्वामी देवानंद चक्कुंगल पुरस्कार' केवल उत्कृष्ट लेखन का सम्मान नहीं है, बल्कि ऐसी पत्रकारिता को प्रोत्साहित करने का प्रयास है जो पेशेवर प्रतिबद्धता के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी निभाती है. यह पुरस्कार उन पत्रकारों और लेखकों को सम्मानित करता है, जिनकी रिपोर्टिंग में समाज के वंचित, कमजोर और बेजुबान वर्गों की आवाज प्रमुखता से दिखाई देती है.

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हिन्दी मीडिया में योगदान को मिली राष्ट्रीय पहचान

ग्लैडसन डुंगडुंग को यह सम्मान हिन्दी मीडिया में उनके दीर्घकालिक योगदान की राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण पहचान माना जा रहा है. आदिवासी समुदायों के अधिकार, मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित उनकी पत्रकारिता ने हिन्दी मीडिया में एक अलग पहचान बनाई है. यह पुरस्कार न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि उन सभी पत्रकारों के लिए भी प्रेरणा है जो जमीनी मुद्दों और समाज के हाशिये पर खड़े लोगों की आवाज को ईमानदारी से सामने लाने का काम कर रहे हैं.

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लेखक के बारे में

By कुमार विश्वत सेन

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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