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पलायन, रोजगार, शिक्षा नहीं बना चुनावी मुद्दा

Updated at : 22 May 2024 9:02 PM (IST)
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खलारी प्रखंड में 25 मई को होनेवाले चुनाव में महज तीन दिन रह गये हैं. पर चुनावी माहौल में किसी भी प्रत्याशी के पास कोई अपना विजन नहीं है.

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प्रतिनिधि, खलारी खलारी प्रखंड में 25 मई को होनेवाले चुनाव में महज तीन दिन रह गये हैं. पर चुनावी माहौल में किसी भी प्रत्याशी के पास कोई अपना विजन नहीं है. एक राष्ट्रीय पार्टी जहां मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही है, वहीं दूसरी संविधान बचाने का हवाला देकर चुनावी रण में है. जबकि खलारी के स्थानीय मुद्दे जिसका जिक्र दोनों राष्ट्रीय पार्टीियां नहीं कर रही हैं. प्रखंड हमेशा से ही पिछड़ा रहा है. यहां आज तक किसी ने न उद्योग लगाने की पहल की, न शिक्षा, न स्वास्थ्य पर ध्यान दिया गया. कोयला का अकूत भंडार होने के बावजूद प्रखंड में रोजगार के साधन नहीं हैं. जिससे स्थानीय युवा पलायन को विवश हैं. किसी प्रत्याशी ने पलायन, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे गंभीर मुद्दों का निराकरण को लेकर बात नहीं कर रहे हैं. प्रत्याशी के बीच सिर्फ चुनाव जीतने की होड़ है. कोयला का भरपूर भंडार पर युवा है बेरोजगार प्रकृति ने खलारी प्रखंड को कोयला से परिपूर्ण किया है. खलारी का कोयला से दूसरे राज्य दिल्ली, पंजाब, हरियाणा जैसे राज्य रोशन हैं. वहां पर कोयला से बिजली उत्पादन हो रहा है. वहां के युवाओं को रोजगार मिल रहा है, लेकिन खलारी में थर्मल पावर प्लांट लगाने की दिशा में कोई भी जनप्रतिनिधि पहल नहीं करते हैं. जिससे क्षेत्र के युवा बेराेजगार हैं. शिक्षा को लेकर नहीं किया गया पहल खलारी कोयलांचल क्षेत्र में शिक्षा को लेकर आज तक पहल नहीं किया गया. प्रखंड में मैट्रिक व इंटरमीडिएट पास करने के बाद बच्चों को सीधा रांची या दूसरे राज्यों में पढ़ाई के लिये जाना पड़ता है. सबसे ज्यादा परेशानी लड़कियों को होती है. इंटर तक तो किसी तरह प्राइवेट स्कूल में अभिभावक पढ़ा लेते हैं, लेकिन यहां महिला कॉलेज के नहीं होने से लड़कियाें को काफी परेशानी होती है. सीमेंट कारखाना के बाद नहीं लगा कोई उद्योग खलारी में सीमेंट कारखाना के बाद कोई दूसरा बड़ा उद्योग नहीं लगा. एसीसी लिमिटेड के खलारी स्थित जिस सीमेंट कारखाना में कभी देश के दूसरे राज्यों के लोग नौकरी करने आये थे, उसी खलारी के युवा आज रोजगार के लिये दिल्ली, पंजाब, गुजरात जैसे बड़े शहरों में पलायन को विवश हैं. खलारी क्षेत्र की कई पीढ़ी इस आस में गुजर गयी कि इस क्षेत्र में किसी तरह का उद्योग लगाने की कहीं से पहल होगी. खलारी की पहचान सीमेंट उद्योग से ही थी. 80 के दशक में कोयला खदानों के राष्ट्रीयकरण के बाद मशीनीकरण का युग आ गया. सीसीएल की परियोजनाओं में सीमित लोगों को रोजगार मिला. आम ग्रामीण इस क्षेत्र में कोयला आधारित उद्योग लगाने की आस लगाये हुए हैं. जबकि क्षेत्र में उद्योग लगाने के असीम संभावनाएं हैं.

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