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जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय आयोग गठन की राज्यपाल से नहीं ली गयी सहमति

Updated at : 27 May 2024 12:30 AM (IST)
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विधानसभा नियुक्ति-प्रोन्नति के मामले जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग के गठन के मामले में राज्यपाल की सहमति नहीं ली गयी थी.

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शकील अख्तर (रांची).

विधानसभा नियुक्ति-प्रोन्नति के मामले जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग के गठन के मामले में राज्यपाल की सहमति नहीं ली गयी थी. इससे पहले जस्टिस लोक नाथ प्रसाद और जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद की अध्यक्षता में आयोग के गठन की स्वीकृति राज्यपाल ने दी थी. राज्यपाल सचिवालय द्वारा हाइकोर्ट में दायर शपथ पत्र में इस तथ्य का उल्लेख किया गया है. झारखंड विधानसभा में नियुक्तियों और प्रोन्नति में हुई गड़बड़ी की सीबीआइ जांच की मांग को लेकर हाइकोर्ट में एक जनहित याचिका पर सुनवाई जारी है. न्यायालय ने सुनवाई के दौरान राज्य सरकार और राज्यपाल सचिवालय को शपथ पत्र दायर कर जानकारी देने का निर्देश दिया था. इसके आलोक में राज्यपाल सचिवालय की ओर से एक शपथ पत्र दायर किया गया है. इसमें यह कहा गया है कि विधानसभा में नियुक्त और प्रोन्नति में हुई गड़बड़ी के मामले में प्रकाशित खबरों को राज्यपाल ने गंभीरता से लिया. राज्यपाल ने फरवरी 2012 में पत्र लिख कर विधानसभा के प्रभारी सचिव को इस मामले में कार्रवाई करने और संबंधित रिपोर्ट राज्यपाल को भेजने का निर्देश दिया. जून 2012 में राज्यपाल को यह सूचित किया गया कि राज्यपाल की सहमति के बाद 10 मार्च 2003 को विधानसभा सचिवालय में कर्मचारियों की नियुक्ति से संबंधित नियमावली से संबंधित अधिसूचना जारी की गयी. 10 मार्च के बाद इस नियमावली में राज्यपाल की सहमति के बिना ही संशोधन किया गया. इस संशोधन के सहारे कुछ नये पद सृजित किये गये और वेतनमान में बदलाव किया गया. इस बदलाव में वित्त विभाग की सहमति भी नहीं ली गयी. जबकि, किसी भी तरह के वित्तीय मामलों में वित्त विभाग की सहमति आवश्यक है.

महाधिवक्ता की सलाह पर पहली बार गठित हुआ था आयोग :

विधानसभा के सचिव द्वारा दी गयी सूचना के आलोक में राज्यपाल ने 23 जुलाई 2012 को विधानसभा अध्यक्ष को नियुक्ति में हुई गड़बड़ी की जांच करने और संबंधित रिपोर्ट उन्हें सौंपने का निर्देश दिया. राज्यपाल के इस निर्देश पर महाधिवक्ता ने कानूनी सलाह देते हुए यह कहा कि चूंकि नियुक्त विधानसभा अध्यक्ष के हस्ताक्षर से हुई है. इसलिए विधानसभा अध्यक्ष से ही जांच कराना न्याय के हित में नहीं होगा. महाधिवक्ता ने किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश से मामले की जांच कराने की राय दी. इसके के बाद राज्यपाल सचिवालय से हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जेनरल को पत्र लिख कर किसी न्यायाधीश को जांच के लिए नामित करने का अनुरोध किया गया. हाइकोर्ट ने 22 मार्च 2013 को पत्र लिख कर जस्टिस लोक नाथ प्रसाद का नाम प्रस्तावित किया. इसके बाद जस्टिस लोक नाथ प्रसाद की अध्यक्षता में एक सदस्यीय आयोग का गठन किया गया. दो मई 2013 को जांच के बिंदु तय करते हुए इसकी सूचना आयोग की दी गयी. साथ ही आयोग से तीन सप्ताह के अंदर जांच कर रिपोर्ट देने का अनुरोध किया गया.

दूसरी बार जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद की अध्यक्षता में गठित हुआ जांच आयोग :

जस्टिस लोक नाथ प्रसाद ने 13 मई 2013 को आयोग के अध्यक्ष के रूप में योगदान किया. लेकिन 16 सितंबर 2013 को ही उन्होंने त्यागपत्र दे दिया. इसके बाद 19 मई 2014 को हाइकोर्ट के रजिस्ट्रार जेनरल को पत्र लिख कर वस्तुस्थिति की जानकारी दी गयी और दूसरे सेवानिवृत न्यायाधीश के नाम का सुझाव देने का अनुरोध किया गया. हाइकोर्ट ने 17 जुलाई 2014 को जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद का नाम अनुमोदित किया. इसके बाद जस्टिस विक्रमादित्य प्रसाद की अध्यक्षता में जांच आयोग का गठन किया गया. इस आयोग ने 24 जून 2016 में प्रगति प्रतिवेदन दिया. आयोग ने नियुक्ति प्रोन्नति की जांच करने के बाद 16 जुलाई 2018 को राज्यपाल को अपनी रिपोर्ट सौंपी. राज्यपाल ने आयोग की अनुशंसाओं के आलोक में विधानसभा को सितंबर 2018 में पत्र भेजा.

जस्टिस विक्रमादित्य आयोग की रिपोर्ट पर राज्यपाल ने ये अनुशंसाएं की थीं

1- आयोग के कर्मचारियों को प्रताड़ित नहीं करें.

2- स्पीकर द्वारा बीरेंद्र कुमार को दिये गये दंड पर पुनर्विचार करें.

3- नियुक्ति में गड़बड़ी और सीडी को जांच के लिए सीबीआइ के हवाले करें.

4- आयोग के संबंधित कर्मचारियों को एक अतिरिक्त इंक्रीमेंट दी जाये. इसके अलावा राज्यपाल ने जांच के 30वें बिंदु में वर्णित दोषी लोगों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई का निर्देश दिया.

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राज्यपाल की अनुशंसा के आलोक में कार्रवाई के बदले गठित किया गया तीसरा आयोग :

यहां यह उल्लेखनीय है कि विक्रमादित्य प्रसाद आयोग की रिपोर्ट के 30वें बिंदु में तत्कालीन विधानसभा अध्यक्षों को दोषी मानते हुए कार्रवाई करने की अनुशंसा की गयी थी. हालांकि, जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय आयोग ने 30वें बिंदु को यह कहते हुए खारिज कर दिया है कि जस्टिस विक्रमादित्य आयोग के लिए निर्धारित जांच के बिंदुओं में यह शामिल नहीं था. कोर्ट में दायर शपथ पत्र में कहा गया है कि राज्यपाल की अनुशंसा के आलोक में कार्रवाई करने के बदले जस्टिस एसजे मुखोपाध्याय की अध्यक्षता में एक दूसरे आयोग का गठन कर दिया गया. इस आयोग के गठन पर राज्यपाल की सहमति नहीं ली गयी. आयोग के गठन के बाद सिर्फ इससे संबंधित अधिसूचना राज्यपाल सचिवालय को भेज दी गयी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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