हुसैनाबाद अस्पताल में प्रसव पीड़ा से तड़पती रही गर्भवती, दो एम्बुलेंस खड़े रहने के बाद भी एक घंटे तक नहीं मिला वाहन

हुसैनाबाद अस्पताल में प्रसव पीड़ा से तड़पती गर्भवती महिला को एम्बुलेंस नहीं मिली. ग्रामीणों ने चंदा जुटाकर जच्चा-बच्चा की जान बचाई. स्वास्थ्य विभाग पर उठे सवाल.

हुसैनाबाद: स्थानीय अनुमंडलीय अस्पताल में सरकारी स्वास्थ्य तंत्र की खोखली होती व्यवस्था और दम तोड़ती मानवीय संवेदनाओं को उजागर करने वाला एक बेहद शर्मनाक मामला सामने आया है. यह घटना सीधे तौर पर झारखंड के स्वास्थ्य महकमे की जमीनी हकीकत को बयां करती है, जहां सरकारी दावों के बावजूद आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं पूरी तरह चरमरा चुकी हैं.

जीवन बचाने का दम भरने वाली 108 एम्बुलेंस सेवा समय पर न मिलने के कारण एक बेबस गर्भवती महिला को असहनीय प्रसव पीड़ा के बीच अस्पताल परिसर में ही तड़पने के लिए छोड़ दिया गया. वह दर्द से कराहती रही, सिसकती रही और चीखती रही, लेकिन अस्पताल प्रशासन का दिल नहीं पसीजा.

प्रसूता की यह बेबसी और चीखें न केवल स्वास्थ्य विभाग की घोर संवेदनहीनता को साबित करती हैं, बल्कि यह भी गंभीर सवाल खड़ा करती हैं कि करोड़ों के बजट और परिसर में एम्बुलेंस खड़ी होने के बाद भी गरीब मरीज इस कदर तड़पने को मजबूर क्यों हैं.

खून की कमी देख डॉक्टरों ने किया रेफर

जानकारी के अनुसार, हैदरनगर थाना क्षेत्र के इमलीतर गांव निवासी गीता देवी (पति बाहर मजदूरी करते हैं) को प्रसव पीड़ा होने पर स्थानीय ग्रामीणों ने इंसानियत दिखाते हुए शनिवार की रात अनुमंडलीय अस्पताल पहुंचाया. यहां डॉक्टरों ने महिला की जांच की, जिसमें अत्यधिक खून की कमी पाई गयी. स्थिति को बेहद गंभीर देखते हुए चिकित्सकों ने प्राथमिक उपचार के बाद महिला को तत्काल सदर अस्पताल रेफर कर दिया.

परिसर में खड़ी थीं गाड़ियां, फिर भी एक घंटे तड़पी

पीड़िताअस्पताल से रेफर किए जाने के बाद असली लापरवाही शुरू हुई. पीड़िता के परिजनों ने तुरंत 108 एम्बुलेंस के लिए संपर्क किया, लेकिन उन्हें वाहन नहीं मिल सका. चौंकाने वाली बात यह है कि जिस समय प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला अस्पताल परिसर में एम्बुलेंस का इंतजार कर रही थी, ठीक उसी समय वहां जिला स्वास्थ्य समिति और डीएमएफटी की दो-दो एम्बुलेंस बेकार खड़ी थीं. इसके बावजूद संवेदनहीनता की हद पार करते हुए महिला को एक घंटे तक तड़पने के लिए छोड़ दिया गया.

मजदूर की पत्नी की मदद को आगे आये ग्रामीण

गर्भवती महिला की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है. उसका पति बाहर रहकर मजदूरी का काम करता है. अस्पताल की इस बदहाली और परिवार की लाचारी को देखकर ग्रामीणों ने एक बार फिर मानवता का परिचय दिया. ग्रामीणों ने आपस में चंदा (पैसा) इकट्ठा कर पीड़ित परिवार को आर्थिक सहयोग दिया, ताकि पैसों के अभाव में जच्चा और बच्चा दोनों की जान को कोई खतरा न हो. ग्रामीणों ने स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों से इस घोर लापरवाही और संवेदनहीनता पर दोषी कर्मियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करने की मांग की है.


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By Chandra shekhar singh

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