लोहरदगा से गोपी कृष्ण कुंवर की रिपोर्ट
Lohardaga News: आदिवासी पारंपरिक बहुस्तरीय व्यवस्था, लोहरदगा के प्रतिनिधियों ने जिले के उपायुक्त को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आदिवासी समाज की पारंपरिक ग्राम सभाओं, रूढ़िजन्य कानूनों तथा धार्मिक और सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण की मांग की है. इस कार्यक्रम का नेतृत्व वरिष्ठ आईआरएस अधिकारी निशा उरांव ने किया. बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग इस दौरान मौजूद रहे और अपनी पारंपरिक व्यवस्था को संवैधानिक संरक्षण देने की मांग दोहराई.
पेसा कानून के विपरीत गतिविधियों पर जताई चिंता
ज्ञापन में कहा गया कि वर्तमान समय में कुछ ऐसी व्यवस्थाएं और प्रवृत्तियां सामने आ रही हैं, जो पेसा अधिनियम 1996 और संविधान में प्रदत्त प्रावधानों के विपरीत हैं. प्रतिनिधियों का कहना था कि “मॉडल ग्राम सभा” के नाम पर ऐसी नई संरचनाएं तैयार की जा रही हैं, जिनका आदिवासी समाज की परंपरागत व्यवस्था से कोई संबंध नहीं है. संगठन ने मांग की कि केवल पारंपरिक ग्राम प्रधान, हातु मुंडा, महतो, पाहन और पाइनभरा जैसे स्थापित पदों वाली ग्राम सभाओं को ही मान्यता दी जाए. साथ ही सचिव और कोषाध्यक्ष जैसे आधुनिक पदों पर आधारित गैर-पारंपरिक ढांचे को अस्वीकार करने की भी मांग की गई.
धार्मिक और सांस्कृतिक पदों की परंपरा बनाए रखने की मांग
ज्ञापन में कहा गया कि ग्राम प्रधान, पाहन, महतो और पड़हा राजा जैसे पद केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व भी रखते हैं. संगठन का कहना है कि इन पदों के निर्वहन के लिए आदिवासी आस्था और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन आवश्यक है. इसी आधार पर संगठन ने यह भी कहा कि जो लोग धर्म परिवर्तन कर चुके हैं और पारंपरिक आस्थाओं का पालन नहीं करते, वे इन पदों के पात्र नहीं हैं. ऐसे लोगों को पदमुक्त करने की मांग भी प्रशासन के समक्ष रखी गई.
बिना अनुमति चंगाई सभा पर रोक लगाने की मांग
आदिवासी समाज ने गांवों में आयोजित होने वाली चंगाई सभाओं पर भी कड़ा एतराज जताया. प्रतिनिधियों का कहना था कि बिना ग्राम सभा की अनुमति आयोजित होने वाली ऐसी गतिविधियां उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और पारंपरिक व्यवस्था का उल्लंघन हैं. ज्ञापन में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में दायर डब्ल्यूपीपीआईएल संख्या 83/2025 तथा सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न आदेशों का हवाला देते हुए मांग की गई कि ग्राम सभा की पूर्व स्वीकृति के बिना किसी भी चंगाई सभा के आयोजन पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया जाए.
भुईहरी और पहनाई भूमि को लेकर उठाया मुद्दा
संगठन ने अपने ज्ञापन में भुईहरी और पहनाई भूमि के उपयोग और स्वामित्व का मुद्दा भी उठाया. आरोप लगाया गया कि कुछ धर्मांतरित पाहन, जो अब पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं का पालन नहीं करते, वे अब भी इन जमीनों पर कब्जा बनाए हुए हैं. संगठन के अनुसार, यह भूमि पाहन पद से जुड़ी होती है और धर्म परिवर्तन के बाद उस पर अधिकार स्वतः समाप्त हो जाना चाहिए. ऐसी जमीनों को पुनः ग्राम सभा के नियंत्रण में देने की मांग की गई.
गैर-पारंपरिक पड़हा संगठनों पर जताई चिंता
लोहरदगा जिले में कुछ गैर-पारंपरिक पड़हा संगठनों के गठन पर भी चिंता व्यक्त की गई. संगठन का आरोप है कि धनबल के आधार पर कुछ लोग स्वयं को समाज पर थोपने का प्रयास कर रहे हैं. ज्ञापन में प्रशासन से आग्रह किया गया कि ऐसे किसी भी गैर-पारंपरिक पड़हा संगठन को सरकारी अथवा कानूनी मान्यता नहीं दी जाए, क्योंकि इससे पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था प्रभावित हो सकती है.
नई ग्राम सभाओं में पारंपरिक प्रतिनिधि शामिल हों
आदिवासी पारंपरिक बहुस्तरीय व्यवस्था ने मांग की कि नई ग्राम सभाओं के गठन के लिए प्रशासन द्वारा बनाई जाने वाली टीम में पारंपरिक आदिवासी पदाधिकारियों को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाए. इसके अलावा पेसा नियमावली के तहत कोष संचालन के लिए तीन सदस्यों के चयन में भी पारंपरिक व्यवस्था और सामाजिक ढांचे का सम्मान सुनिश्चित किया जाए.
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धार्मिक और सामाजिक स्वायत्तता की रक्षा की अपील
संगठन ने कहा कि वर्तमान हस्तक्षेपों के कारण आदिवासी समाज की धार्मिक और सामाजिक स्वायत्तता पर खतरा मंडरा रहा है. उन्होंने प्रशासन से आग्रह किया कि संविधान और पांचवीं अनुसूची की भावना के अनुरूप आदिवासी समाज की परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक संरचना की रक्षा करना प्रशासन की संवैधानिक जिम्मेदारी है. ज्ञापन सौंपने के दौरान बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित रहे और अपनी मांगों के समर्थन में एकजुटता दिखाई.
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