झारखंड के पहले वन एवं पर्यावरण मंत्री यमुना सिंह की आज पुण्यतिथि है. उन्हें इलाके में आदर से 'हाथी सिंह' भी कहते थे. इस मौके पर उनके पैतृक गांव और पूरे लातेहार इलाके में उन्हें नम आंखों से श्रद्धांजलि दी जा रही है. साल 2000 में झारखंड राज्य बनने के बाद बनी बाबूलाल मरांडी की सरकार में उन्होंने इस अहम पद की जिम्मेदारी संभाली थी.
वे बिहार से लेकर झारखंड बनने तक मनिका इलाके की आवाज़ बने रहे, खासकर घने जंगलों वाले पलामू टाइगर रिजर्व इलाके में आदिवासियों और स्थानीय लोगों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए उन्होंने पुरजोर आवाज़ उठाई थी.
पैतृक गांव कोटाम और बरवाडीह में दी जा रही श्रद्धांजलि
यमुना सिंह का पैतृक गाँव लातेहार जिले के गारू ब्लॉक का कोटाम गाँव है. हर साल 9 सितंबर को उनके इस गाँव और पूरे लातेहार इलाके में उनकी पुण्यतिथि बड़े ही सम्मान के साथ मनाई जाती है. आज के दिन बरवाडीह राजा मेदिनीराय कॉलेज के परिसर में लगी उनकी प्रतिमा पर स्थानीय लोग और अलग-अलग पार्टियों के कार्यकर्ता फूल चढ़ाकर उन्हें याद कर रहे हैं. साल 2010 में उनके निधन के बाद से यह सिलसिला हर साल पूरी श्रद्धा के साथ चल रहा है.
श्रद्धांजलि के साथ-साथ उनके राजनीतिक जीवन के सफर को भी याद किया जा रहा है.
भाजपा के दमदार आदिवासी नेता के तौर पर शुरुआत
यमुना सिंह ने अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ की थी. वे लातेहार और मनिका इलाके में भाजपा के सबसे दमदार, असरदार और ज़मीनी आदिवासी नेताओं में से थे. इलाके में पार्टी को मजबूत करने और आदिवासी समाज की दिक्कतों को मुख्यधारा में लाने में उनका योगदान बहुत बड़ा माना जाता है.
मनिका विधानसभा से रिकॉर्ड छह बार विधायक रहे
यमुना सिंह का राजनीतिक सफर और चुनाव क्षेत्र काफी ऐतिहासिक रहा है. उन्होंने अविभाजित बिहार के दौर से लेकर अलग झारखंड राज्य बनने तक लगातार लातेहार जिले की मनिका (अनुसूचित जनजाति सुरक्षित) विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया. वे इस सीट से रिकॉर्ड 6 बार विधानसभा चुनाव जीते. यह रिकॉर्ड आज भी उनके मज़बूत समर्थन और इलाके पर उनकी गहरी पकड़ को दिखाता है.
झारखंड के पहले वन एवं पर्यावरण मंत्री
15 नवंबर 2000 को जब बिहार से अलग होकर झारखंड एक नया राज्य बना, तब बाबूलाल मरांडी के नेतृत्व में पहली सरकार बनी. इस अहम मंत्रालय में यमुना सिंह को राज्य का पहला वन एवं पर्यावरण मंत्री बनने का सम्मान मिला. नए राज्य के शुरुआती दिनों में वन नीतियों और पर्यावरण को बचाने की दिशा तय करने में उन्होंने बहुत बड़ी भूमिका निभाई थी.
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"हाथी सिंह" व "गरीबों के मसीहा" और उनका आखिरी चुनाव
घने जंगलों वाले पलामू टाइगर रिजर्व इलाके में आदिवासियों और स्थानीय लोगों के जल-जंगल-जमीन के अधिकारों के लिए मज़बूती से आवाज़ उठाने और उस समय के बिहार विधानसभा में हाथियों द्वारा फसल बर्बाद करने के मामले को खास तौर पर उठाते थे, जिसके कारण उन्हें हाथी सिंह का नाम मिला था. इसके साथ ही, लोगों की सेवा करने में उनकी लगन और समर्पण को देखते हुए जनता ने उन्हें
"गरीबों का मसीहा" कहना शुरू कर दिया था. उनके लिए यह उपाधि तब और भी खास हो गई जब उन्होंने अपने इलाके में एक बार सूखा पड़ने पर भूखे लोगों के लिए खुद अनाज का इंतजाम करवाया और ज़रूरतमंदों तक खुद पहुंचाया.
2009 में लड़ा था आखिरी चुनाव
उन्होंने अपने जीवन का आखिरी चुनाव साल 2009 में एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था. इसके बाद खराब सेहत की वजह से वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए और साल 2010 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनका योगदान आज भी अमर है.
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