खामोश होते जंगल, सूनी होती रातें

खामोश होते जंगल, सूनी होती रातें

विश्व पृथ्वी दिवस आज. जिले से गायब हो रहे गिद्ध, गौरैया व जुगनू, चमगादड़

– बिगड़ती आबोहवा, कंक्रीट के जंगल और मानवीय लापरवाही से संकट गहराया.

-विशेषज्ञों ने दी चेतावनी, अब नहीं चेते तो बहुत देर हो जायेगी

jamshedpur,

बिगड़ती आबोहवा और पर्यावरण पर पड़ते प्रतिकूल असर ने जानवरों, पेड़-पौधों, पक्षियों और कीटों तक को गहराई से प्रभावित किया है. यही वजह है कि पूर्वी सिंहभूम के जंगलों से लेकर शहरों तक कई प्रजातियां तेजी से गायब हो रही हैं. इनमें जुगनू, चमगादड़, सफेद पंख वाला गिद्ध (व्हाइट-रंप्ड वल्चर), लंबी चोंच वाला गिद्ध (लॉन्ग-बिल्ड वल्चर), रेड वेलवेट माइट (रानी कीड़ा) और बीजा-साल जैसे कई पेड़-पौधे शामिल हैं. इन प्रजातियों को बचाने के लिए अब व्यापक और गंभीर पहल की जरूरत महसूस की जा रही है. विश्व पृथ्वी दिवस पर लाइफ @ जमशेदपुर के लिए ब्रजेश सिंह की रिपोर्ट

दलमा से गायब हो रहे तारों सा टिमटिमानेवाले जुगनू

एक समय था जब दलमा की रातें जुगनुओं की रोशनी से जगमगाती थीं. शहर हो या गांव, हर जगह ये प्रकृति का अनोखा नजारा देखने को मिलता था. लेकिन अब जुगनू तेजी से गायब हो रहे हैं. शायद ही किसी को याद हो कि आखिरी बार उन्हें कब देखा था. जीव विज्ञान सह चाईबासा टाटा कॉलेज के प्राचार्य डॉ अमर सिंह ने बताया कि तेजी से बदलता पर्यावरण और बढ़ता विद्युतीकरण इसके प्रमुख कारण हैं. कृत्रिम रोशनी ने इनके प्राकृतिक जीवन चक्र को प्रभावित किया है, जिससे उनका अस्तित्व संकट में पड़ गया है.

जयंती सरोवर: कभी गूंजती थी चमगादड़ों की आवाज, आज है सन्नाटा

जुबिली पार्क स्थित जयंती सरोवर का टापू कभी चमगादड़ों का गढ़ माना जाता था. रात के समय वहां से गुजरना मुश्किल होता था और दिन में उनकी आवाजें आकर्षण का केंद्र होती थीं. आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं. वहां अब गिने-चुने चमगादड़ ही नजर आते हैं. उनका ठिकाना बदल चुका है. बिगड़ती आबोहवा और बदलते पर्यावरणीय हालात इसके पीछे बड़ी वजह माने जा रहे हैं.

गिद्धों का दिखना हुआ दुर्लभ

बर्ड वॉचर समूह से जुड़ी डॉ विजया भरत के अनुसार, हाल के वर्षों में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट आयी है. जमशेदपुर और आसपास के इलाकों में व्हाइट-रंप्ड वल्चर और लॉन्ग-बिल्ड वल्चर अब लगभग नजर नहीं आते. यह स्थिति बेहद चिंताजनक है, क्योंकि गिद्ध पर्यावरण संतुलन बनाये रखने में अहम भूमिका निभाते हैं.

आंगन से गायब गौरैया

कभी इंसानों के सबसे करीब रहने वाली गौरैया अब शहरों से लगभग गायब हो चुकी है. जुगसलाई, मानगो और आसपास के ग्रामीण इलाकों में भी अब यह मुश्किल से दिखाई देती है. कंक्रीट के घरों, बदलती जीवनशैली और भोजन की कमी ने इनके अस्तित्व को संकट में डाल दिया है. खेतों में कीटनाशकों के बढ़ते इस्तेमाल ने इनके भोजन स्रोत को भी खत्म कर दिया है.

क्या कहते हैं जानकार :

पक्षियों, कीटों को बचाने के लिए लोगों को आगे आना होगा

पक्षियों, कीटों को बचाने के लिए लोगों को भी आगे आना होगा. विद्युतीकरण, तेजी से ईंट व कंक्रीट के तैयार होते मकान के कारण जुगनू गायब हुए हैं.गौरैया के लिए अब कोई जगह नहीं बची है, जहां वे आना जाना और भोजन खा सके. पहले फूस के मकान होते थे, लोग गेहूं फटकते थे, जिसमें से उनके लिए भोजन का इंतजाम हो जाता था, लेकिन यह सब बंद हो गया है, तो ये विलुप्त होने लगे.

– डॉ अमर सिंह, प्राचार्य , टाटा कॉलेज, चाईबासा सह जीव विज्ञानी

गिद्ध और गौरैया गायब होना चिंता का विषय : डॉ विजय

अब गिद्ध की कई प्रजातियां नहीं दिखती है. गौरैया गायब हो चुकी है. इसके लिए हम लोग दोषी है. हमारे पास वह जगह नहीं है कि कहां उन्हें रहने दिया जाये तो वे लोग विलुप्त होते जा रहे है. हमें कम से कम घरों के बाहर घड़ा व सकोरा रखना चाहिए, जहां वे आना जाना कर सके, उन्हें पानी व भोजन मिल सके.शायद इस प्रयास से वे बच जायें.

– विजया भरत, चिकित्सक सह बर्ड वाचर

विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के लिए पहल की जरूरत

विलुप्त होती प्रजातियों को बचाने के लिए बड़ी पहल करने की जरूरत है. पिछले दो दशकों में गौरैया की आबादी में तेजी से गिरावट आयी है. इसका सबसे बड़ा कारण कंक्रीट के मकान हैं. पहले कच्चे घरों या पुरानी इमारतों के झरोखों में इन्हें घोंसला बनाने की जगह आसानी से मिल जाती थी, लेकिन अब नए डिजाइन के घरों में ऐसी जगहें खत्म हो गयी है. साथ ही खेती में कीटनाशकों का प्रयोग भी इनके लिए काल बन रहा है. क्योंकि इससे उनके भोजन के लिए छोटे कीड़े-मकोड़े खत्म हो जाते हैं. कुछ शोधों में पता चला है कि मोबाइल टावरों और वाई-फाई से निकलने वाला इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन पक्षियों के जीवन पर बुरा असर डाल रहा है. इन सब पर सरकार के स्तर पर पहल करनी होगी.

डॉ शम्स परवेज खान, पर्यावरणविद् सह झारखंड वन्य जीव बोर्ड के सदस्य—-

दलमा के जंगल से कई प्रजातियां गायब

दलमा के जंगल में अब चमगादड़ व जुगनू कम दिखते हैं. इसका सबसे बड़ा कारण शहरी क्षेत्र में पर्यावरण का प्रदूषित होना है. दलमा व देश-दुनिया से कई प्रजातियां प्रदूषण के कारण गायब हो गयी हैं. बावजूद इसके दलमा के जंगल में अभी भी कई प्राय: विलुप्त प्रजातियां दिखती है, जो यह बताता हैं कि अगर बेहतर प्रयास किया जाये, तो विलुप्त होती प्रजातियों को बचाया जा सकता है. इसके लिए हर आम नागरिक से लेकर सरकारी स्तर पर प्रयास करना होगा.

– राजा घोष, फॉरेस्टर दलमा

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By SANJAY PRASAD

SANJAY PRASAD is a contributor at Prabhat Khabar.

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