खास बातें
West Bengal Left Front Decline: बंगाल चुनाव 2026 की घोषणा से ठीक पहले सिलीगुड़ी के कद्दावर नेता अशोक भट्टाचार्य के एक बयान ने राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी थी. 5 बार के विधायक और पूर्व मंत्री भट्टाचार्य ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि उनके अपने वोटरों ने भाजपा की ओर रुख करना शुरू कर दिया है.
वजूद बचाने की लड़ाई लड़ रहा वाम मोर्चा
यह ईमानदारी भरा स्वीकारोक्ति उस कड़वी सच्चाई को बयां करती है, जिससे बंगाल का वामपंथ पिछले 2 दशकों से जूझ रहा है. वर्ष 2006 में ऐतिहासिक 233 सीटें जीतने वाला वाम मोर्चा (Left Front) आज अपने वजूद को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है.
2006 से 2021: अर्श से फर्श तक का सफर
आंकड़ों में देखेंगे, तो बंगाल में वामपंथ के पतन की कहानी बेहद डरावनी है. वर्ष 2006 में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व में वाममोर्चा ने 294 में से 233 सीटें जीती थीं. यह उसकी ऐतिहासिक जीत थी. वर्ष 2011 में सत्ता जाने के बावजूद वामपंथ का वोट शेयर 30 प्रतिशत से अधिक था. लेकिन 2016 में यह गिरकर 19 प्रतिशत और 2021 में महज 5 प्रतिशत रह गया. पिछले विधानसभा चुनाव में पहली बार वामपंथ का खाता तक नहीं खुल सका.
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‘आगे राम, पोरे बाम’: क्यों फिसला वामपंथी वोटर?
2016 से 2019 के बीच करीब एक करोड़ वामपंथी मतदाता भाजपा की ओर चले गये. ‘आगे राम, पोरे बाम’ (पहले राम, फिर वाम) का नारा वैचारिक नहीं, सुरक्षा पर आधारित था. 2018 के पंचायत चुनाव में हुई भारी हिंसा और करीब 25 मौतों ने वामपंथी कार्यकर्ताओं का हौसला तोड़ दिया.
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उन्हें लगा कि केवल भाजपा ही तृणमूल कांग्रेस के कैडर का मुकाबला कर सकती है. इसी साल त्रिपुरा में भाजपा की जीत ने बंगाल के कम्युनिस्ट वोटरों को यह संदेश दिया कि बदलाव संभव है.
2026 की रणनीति : युवा कंधों पर लाल झंडे का भार
- तमाम झटकों के बाद सीपीआई (एम) अब वापसी की कोशिशों में जुटी है. पार्टी ने मीनाक्षी मुखर्जी (उत्तरपाड़ा), दिप्सिता धर (दमदम उत्तर) और सृजन भट्टाचार्य जैसे युवा चेहरों को आगे किया है. अनुभवी नेताओं में विकास रंजन भट्टाचार्य जादवपुर से मैदान में हैं.
- इस बार कांग्रेस अलग राह पर है, लेकिन वामपंथ के भीतर एकता दिख रही है. सीपीआई (एमएल) लिबरेशन ने 10 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं, जो वामपंथी एकता का नया संकेत है.
- 2026 बंगाल चुनाव के लिए वामपंथ का मुख्य एजेंडा ‘नौकरी और भ्रष्टाचार’ है. पार्टी उन धर्मनिरपेक्ष मतदाताओं को टारगेट कर रही है, जो टीएमसी के भ्रष्टाचार और भाजपा की सांप्रदायिकता दोनों से नाराज हैं.
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West Bengal Left Front Decline: प्रेसिडेंसी मंडल में अब भी बची है उम्मीद
कोलकाता और उसके आसपास के शहरी इलाकों (प्रेसिडेंसी डिवीजन) में वामपंथ की कुछ ऊर्जा अभी भी बची है. शिक्षित और वैचारिक वोटरों के बीच सीपीआई (एम) को उम्मीद है कि उनकी बात सुनी जायेगी. वर्ष 2023 के पंचायत चुनाव में वाम-कांग्रेस-आईएसएफ गठबंधन का वोट शेयर बढ़कर 21 प्रतिशत होना उनके लिए संजीवनी की तरह है.
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