आदिवासी दिवस पर बदला अधिकारियों का अंदाज, पारंपरिक वेशभूषा में दिखे

गुमला में आदिवासी दिवस के अवसर पर प्रशासनिक अधिकारी पारंपरिक वेशभूषा में नजर आए. इस अनूठे आयोजन ने जिले की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत कर दिया है.

गुमला: आदिवासी बहुल जिला है. यहां की परंपरा अनूठी है. संस्कृति दिल को छूती है. यहां की वेशभूषा अक्सर लोगों को आकर्षित करती है. यही वजह है. इसबार आदिवासी दिवस भी गुमला में एक अलग अंदाज में प्रशासन ने मनाया. सीधे शब्दों में कहा जाये. प्रशासन ने अनूठे तरीके से आदिवासी दिवस मनाकर इतिहास बनाया है.

जिले के सभी अधिकारी आदिवासी वेशभूषा में नजर आये. अधिकारियों की पहनावा मुख्य चर्चा का विषय रहा. लोगों ने अधिकारियों की पहनावा की प्रशंसा की. साथ ही जिस अंदाज व भव्यता से आदिवासी दिवस मना. इसकी भी प्रशंसा हुई है.

प्रशासन का कार्यक्रम था. झारखंड आदिवासी महोत्सव. यह महोत्सव गुमला की उस सांस्कृतिक पहचान को एक बार फिर जीवंत किया. जिसमें मांदर की थाप केवल संगीत नहीं, बल्कि परंपरा की आवाज है.

लोकनृत्य केवल प्रस्तुति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही विरासत है. जल, जंगल, जमीन केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन एवं अस्तित्व का आधार है. नगर भवन में महोत्सव हुआ. जिले के सभी प्रशासनिक अधिकारी थे. मांदर की थाप, झारखंडी गीतों की गूंज और पारंपरिक नृत्यों ने सभी का मनमोह लिया.

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By दुर्जय पासवान

दुर्जय पासवान ने वर्ष 2001 से पत्रकारिता की शुरुआत की. दैनिक जागरण में दो साल काम करने के बाद 2003 में वे प्रभात खबर से जुड़े. इसके साथ ही नयी दुनिया अखबार, प्रहार मैगजीन में भी अपनी सेवा दी. इसके बाद 2010 में वे दैनिक भास्कर गुमला का ब्यूरो इंचार्ज के रूप में काम शुरू किये. भास्कर में पांच साल सेवा देने के बाद दोबारा 2014 में प्रभात खबर में ब्यूरो इंचार्ज के रूप में वापसी की. तब से अबतक प्रभात खबर से जुड़े हुए हैं. उन्होंने नक्सलियों से जुड़ी खबरें, नक्सली घटनाएं, ग्राउंड रिपोर्ट, प्राचीन और ऐतिहासिक धरोहरों की खोज से संबंधित खबरों पर अच्छा काम किया. इन्हीं खबरों ने उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में पहचान दी. दुर्जय पासवान बहुत लगन से अपना सभी काम का पूरा करते हैं.

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