झारखंड के प्रमुख सांस्कृतिक पर्व कर्मा को लेकर जमुआ प्रखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में उत्साह का माहौल है. भाई-बहन के अटूट स्नेह और प्रकृति से जुड़ी लोक परंपराओं का प्रतीक कर्मा पूजा आठ दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान के साथ शुरू हो गयी है. पूजा का विधिवत शुभारंभ जोवा धारने की परंपरा से हुआ. इसके तहत अखड़ा में बालू भरकर कुर्थी, उरद, चना और जौ के बीज बोये गये.
आठ दिनों तक बहनें उपवास रखकर शाम को करती हैं पूजा-अर्चना
इसे जावा या जोवा उठाना कहा जाता है. अगले आठ दिनों तक युवतियां और कुंवारी कन्याएं उपवास रखकर शाम को अखड़ा में जावा की पूजा-अर्चना करेंगी. इस दौरान पारंपरिक कर्मा गीतों के साथ नृत्य भी होगा. इससे गांवों के अखड़े शाम ढलते ही ढोल, मांदर और झांझ की थाप से गूंजने लगे हैं.
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सातवें दिन होगी कर्मडाली की पूजा
कर्मा पूजा का मुख्य अनुष्ठान सातवें दिन होगा. इस दिन श्रद्धालु जंगल से कर्म वृक्ष की डाली यानी कर्मडाली लाकर अखड़ा में स्थापित करेंगे. शाम को विधि-विधान से कर्मडाली की पूजा की जायेगी. बहनें उपवास रखकर भाइयों की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और आरोग्य की कामना करेंगी.
कर्मा-धर्मा की पौराणिक कथा सुनायी जाती है
पूजा के दौरान कर्मा और धर्मा भाइयों की पौराणिक कथा सुनायी जायेगी. कथा में धर्म, कर्म और सच्चाई का संदेश दिया जाता है. पूजा के बाद आठ दिनों तक सहेजे गये जावा को प्रसाद के रूप में भाइयों के कान और सिर पर लगाकर आशीर्वाद दिया जायेगा.
प्रकृति और कृषि संस्कृति से जुड़ा है पर्व
ग्रामीणों के अनुसार कर्मा केवल भाई-बहन के प्रेम का पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति संरक्षण और कृषि संस्कृति से जुड़ी समृद्ध लोक परंपरा भी है. आठवें दिन सुबह नदी या पोखर में कर्मडाली और जावा के विसर्जन के साथ अनुष्ठान का समापन होगा. कर्म बहन पार्वती वर्मा ने बताया कि झारखंड में कर्मा पूजा का विशेष महत्व है. भाई-बहन इस पर्व को अन्य त्योहारों की तुलना में अधिक महत्व देते हैं.
