शिबू सोरेन के करीबी साथी दिगम्बर मरांडी नहीं रहे, झारखंड आंदोलन के शुरुआती दौर की टूटी अहम कड़ी

झारखंड आंदोलन के अग्रणी दिगम्बर मरांडी का निधन. शिबू सोरेन के शुरुआती संघर्ष के साथी, जानिए उनके योगदान और परिवार के बारे में.

दुमका : झारखंड आंदोलन के शुरुआती दौर में दिशोम गुरु शिबू सोरेन के बेहद करीबी रहे दिगम्बर मरांडी का निधन हो गया. कुछ समय से बीमार चल रहे दिगम्बर मरांडी ने शुक्रवार को अंतिम सांस ली. शनिवार को दुमका जिले के नवखेता पंचायत के भतकुच्चा में उनका अंतिम संस्कार किया गया. उनके निधन की खबर से झारखंड आंदोलन के शुरुआती संघर्ष को करीब से देखने और उसमें भूमिका निभाने वाले लोगों में शोक की लहर है.

पीछे छोड़ गये भरा-पूरा परिवार

दिगम्बर मरांडी अपने पीछे पत्नी, चार बेटे विजय, विनय, सूरज और सिद्धार्थ तथा दो बेटियों वीणा और स्वीटी समेत भरा-पूरा परिवार छोड़ गये हैं.

शिबू सोरेन के संघर्ष के शुरुआती दौर के रहे साथी

दिगम्बर मरांडी केवल शिबू सोरेन के समर्थक नहीं थे, बल्कि आंदोलन के उस दौर के सक्रिय सहयोगी थे, जब कोयलांचल और संताल परगना में संगठन खड़ा करने और लोगों को एकजुट करने का काम कठिन परिस्थितियों में किया जा रहा था.

शिबू सोरेन के संघर्ष और राजनीतिक जीवन से जुड़ी जानकारी रखने वाले लोगों के अनुसार, शिबू सोरेन को पहली बार भोगनाडीह लेकर जाने वाले शख्स दिगम्बर मरांडी ही थे. यहीं शिबू सोरेन को संताल हूल के अमर नायक सिदो-कान्हू के जीवन-संघर्ष से प्रेरणा मिली. भोगनाडीह की इस यात्रा के साथ दिगम्बर मरांडी का नाम शिबू सोरेन के राजनीतिक संघर्ष के शुरुआती दौर से जुड़ता है.

13 मार्च 1976 की बैठक के लिए किया था पत्राचार

13 मार्च 1976 को दुमका में आयोजित महत्वपूर्ण बैठक के लिए दिगम्बर मरांडी ने पत्राचार किया था और लोगों को जुटाया था. उस समय झारखंड मुक्ति मोर्चा और संताल परगना में सामाजिक-राजनीतिक आंदोलन को मजबूत करने की दिशा में गतिविधियां तेज हो रही थीं.

बैठक में सामाजिक कार्यकर्ताओं, नेताओं और आंदोलन से जुड़े लोगों को जुटाने के लिए दिगम्बर मरांडी ने अपनी पहचान छिपाते हुए ‘डी मरांडी’ के नाम से पत्राचार किया था. वे बताते थे कि जब शिबू सोरेन धनबाद के टुंडी से झारखंड अलग राज्य आंदोलन के विस्तार के लिए संताल परगना की ओर आये, तो उनके विचारों से प्रभावित होकर वे भी उनके साथ जुड़ गये. दुमका में एसपी कॉलेज के समीप मांझी थान में हुई बैठक को वे उस दौर की महत्वपूर्ण घटना मानते थे.

आंदोलन को गांव-गांव पहुंचाने में निभायी भूमिका

70 के दशक में शिबू सोरेन का आंदोलन केवल राजनीतिक मुद्दों तक सीमित नहीं था. महाजनों के शोषण, जमीन और आदिवासी समाज के अधिकारों जैसे सवालों को लेकर गांव-गांव लोगों को जागरूक करने का प्रयास किया जा रहा था. दिगम्बर मरांडी जैसे कार्यकर्ता इस अभियान में उनके साथ खड़े रहे.

उस दौर में संचार के साधन और संसाधन सीमित थे. गांवों तक पहुंचना, लोगों को बैठक की जानकारी देना, सामाजिक कार्यकर्ताओं से संपर्क करना और उन्हें आंदोलन से जोड़ना संगठन निर्माण की बुनियाद थी. दिगम्बर मरांडी ने शिबू सोरेन के साथ रहकर इस जिम्मेदारी को निभाया.

सीजेएम कोर्ट में पेशकार थे दिगम्बर मरांडी

शिबू सोरेन के साथ लंबे समय तक जुड़े रहे दिगम्बर मरांडी धनबाद में सीजेएम कोर्ट में पेशकार थे और सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हुए थे. उनके निधन के साथ झारखंड आंदोलन के शुरुआती दौर की एक महत्वपूर्ण कड़ी भी टूट गयी. वे उस पीढ़ी के गवाह थे, जिसने झारखंड आंदोलन को आकार लेते देखा था और बिना किसी बड़े पद या राजनीतिक महत्वाकांक्षा के संगठन और आंदोलन को मजबूती देने में योगदान दिया.


दिगम्बर मरांडी | Prabhat Khabar Network


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By Anand Jayswal

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