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धनबाद गैंगवार : ‘बंदूक के बल बदली जिंदगी व बंदूक से ही मौत’ का मुहावरा

Updated at : 23 Mar 2017 12:52 PM (IST)
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धनबाद गैंगवार : ‘बंदूक के बल बदली जिंदगी व बंदूक से ही मौत’ का मुहावरा

बेजान बंदूक के बल पर सांसें लेनेवाली जिंदगियां बंदूक से ही खामोश होती रही हैं. बाहुबलियों को जिस बंदूक पर सबसे ज्यादा भरोसा रहा, वही बंदूक उन्हें दगा देता रहा. धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के बेजोड़ गंठबंधन के बीते पांच दशक के इतिहास पर नजर डालें, तो यह मुहावरा सामने आता है […]

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बेजान बंदूक के बल पर सांसें लेनेवाली जिंदगियां बंदूक से ही खामोश होती रही हैं. बाहुबलियों को जिस बंदूक पर सबसे ज्यादा भरोसा रहा, वही बंदूक उन्हें दगा देता रहा. धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के बेजोड़ गंठबंधन के बीते पांच दशक के इतिहास पर नजर डालें, तो यह मुहावरा सामने आता है कि “जो बंदूक के बल जीये, वे बंदूक से ही गये.” लेकिन नीरज सिंह की हत्या ने इस मुहावरा को बदल दिया है.

बेशक नीरज सिंह राजनीति में कोयलांचल के उस ताकतवर राजनीति घराने (सिंह मैंशन) से अाये, जिसकी बुनियाद में बाहुबल व बंदूक था, लेकिन नीरज सिंह ने अपने लिए नयी राह बनायी. ऐसी राह, जिसमें बंदूक व बाहुबल की प्राथमिकता नहीं थी. प्यार, व्यवहार, सभी को सम्मान देते हुए ‘जनबल’ तैयार करने की राजनीति के तहत नीरज सिंह ने महज आठ वर्षों (वर्ष 2009 से 2017) में कोयलांचल की राजनीति में ‘सिंह मैंशन’ के समानांतर एक नया राजनीतिक घराना खड़ा किया-‘रघुकुल.’

नीरज सिंह के पूर्व बीते करीब पांच दशक में धनबाद कोयलांचल की राजनीति में अपनी धाक जमाने और कोयला व्यवसाय पर वर्चस्व स्थापित करने की जंग में खत्म हुई कई जिंदगियों की कहानी ‘बंदूक के बल जीने और बंदूक से ही मरने’ की रही है. आठ दिसंबर, 2011 की रात लगभग साढ़े नौ बजे करोड़पति कोयला व्यवसायी और कांग्रेस नेता सुरेश सिंह (55) की धनबाद क्लब में गोली मार कर हत्या कर दी गयी. सुरेश सिंह ने सपने में भी कभी यह नहीं सोचा होगा कि 9 एमएम पिस्टल की बमुश्किल दो इंच की जो गोलियां उनके लिए खिलौना जैसी थीं, वही कभी उनकी आवाज हमेशा के लिए शांत कर देगी. धनबाद कोयलांचल के लोग भी यह नहीं पचा पाये कि सुरेश सिंह की इस तरह से मौत होगी. वजह हमेशा अत्याधुनिक बंदूक से लैस सुरक्षाकर्मियों के मजबूत घेरे में सुरेश सिंह का होना.
15 जुलाई, 1998 को धनबाद जिले के कतरास बाजार स्थित भगत सिंह चौक के पास दिन के उजाले में मारुति कार पर सवार कुख्यात अपराधियों ने अत्याधुनिक हथियारों से अंधाधुंध गोलियां चलाकर विनोद सिंह की हत्या कर दी. विनोद सिंह को भी बंदूक के बल पर काफी भरोसा रहा. इसी भरोसे विनोद सिंह ने 11 अप्रैल, 1993 को धनबाद जिले के तोपचांची थाना क्षेत्र में तत्कालीन आरक्षी अधीक्षक अनिल सिन्हा पर स्टेनगन सटा दिया था. वह मामला अविभाजित बिहार से लेकर उत्तर प्रदेश तक चर्चित हुआ था. बिहार जनता खान मजदूर संघ के महामंत्री और जनता दल के नेता सकलदेव सिंह भी बंदूक की कड़ी सुरक्षा में रहते थे.
25 जनवरी, 1999 को दोपहर के लगभग साढ़े बारह बजे सकलदेव सिंह सिजुआ स्थित अपने आवास से काले रंग की टाटा जीप पर धनबाद के लिए निकले. हीरक रोड पर पहुंचते ही दो टाटा सूमो (एक सफेद) सकलदेव सिंह की गाड़ी के समानांतर हुई. सूमो की पिछली खिड़की का काला शीशा थोड़ा नीचे सरका और उसमें से एक बैरेल सकलदेव सिंह को निशाना साधकर दनादन गोलियां उगलने लगी. जवाब में सकलदेव सिंह की गाड़ी से भी फायरिंग होने लगी. दोनो गाड़ियां काफी तेज चल रही थी और साथ में फायरिंग भी हो रही थी. अंतत : बंदूक की गोलियों ने सकलदेव सिंह को हमेशा के लिए खामोश कर दिया.
सिंह मैंशन के बड़े युवराज व विधायकजी सूर्यदेव सिंह के बड़े पुत्र राजीव रंजन सिंह के साथ भी बाहुबल व बंदूक की ताकत रही. विनोद सिंह हत्याकांड, सकलदेव सिंह हत्याकांड, मणिंद्र मंडल हत्याकांड, रवि भगत हत्याकांड में राजीव रंजन का नाम आया. तीन अक्तूबर, 2003 में प्रमोद सिंह हत्याकांड में अभियुक्त बनाये जाने के बाद राजीव रंजन सिंह फरार हो गये. करीब 10 वर्षों तक राजीव रंजन की गुमशुदगी रहस्यमय रही. चर्चा होती रही कि सुरेश सिंह ने उत्तर प्रदेश के माफिया डॉन ब्रजेश सिंह के सहयोग से राजीव रंजन की हत्या करा दी. बाद में पुलिस जांच में भी यह खुलासा हुआ.
28 मार्च, 1978 में वीपी सिन्हा की हत्या धनबाद कोयलांचल में कोयला माफिया और राजनीति के गंठबंधन के इतिहास की पहली बड़ी घटना थी. बंदूक व बाहुबल की ताकत के समानांतर ताकत रखनेवाले वीपी सिन्हा की हत्या में उनके करीबी रहे और झरिया से विधायक बने सूर्यदेव सिंह का नाम आया था. वीपी सिन्हा के बाद पूरे कोयलांचल में सूर्यदेव सिंह का सिक्का चल पड़ा. कोयलांचल में सिंह मैंशन के रूप में मजबूत राजनीतिक घराने की नींव रखी. बीपी सिन्हा के अलावा 1983 में शफी खान, 1984 में असगर, 1986 में शमीम खान से लेकर 2003 में सुशांतो सेन गुप्ता तक कई ऐसी जिंदगियां बंदूक से खामोश होती रही, जिन्हें बंदूक पर भरोसा था.
बीबीसी पर प्रसारित हुई थी बीपी सिन्हा की हत्या की खबर
29 मार्च, 1978 को धनबाद के गांधी नगर स्थित आवास सह कार्यालय में वीपी सिन्हा रेकर्ड प्लेयर पर अपने पोते गौतम के साथ गाना सुन रहे थे. बगल के कमरे में उनकी अपाहिज सास लेटी थी. घर में उस वक्त आसपास के चार-पांच लोग अपनी फरियाद लेकर पहुंचे थे. अचानक दो-तीन लोग बरामदे में पहुंचे और एक ने पूछा साहेब हैं? जवाब हां में मिलने पर वे लोग लौट गये. इस बीच अचानक बिजली गुल हो गयी. कुछ सेकेंड में बिजली आ भी गयी. साहेब को पूछने वाले लोग इतने में ही 10-11 व्यक्तियों को साथ ले कर बरामदे में शोर करते हुए प्रवेश कर गये. शोर सुन कर साहेब पूछते हैं कौन आया है? क्या हो रहा है? जवाब मिलता है डाकू आये हैं. इतने में साहेब जैसे ही कमरे से बाहर निकलते हैं मोटा सा एक आदमी लाइट मशीन गन से गोलियों की बौछार कर देता है. करीब सौ गोलियां चलती है. साहेब के शरीर को तब तक कई गोलियां बेध चुकी होती है. साहेब खून से लथ पथ होकर जमीन पर गिर पड़ते हैं. उस वक्त उनकी उम्र करीब 70 साल होगी. गोलियां चलाते हुए हत्यारे सफेद रंग की एम्बेसडर कार में बैठ कर भाग निकले. पूरे धनबाद जिले में कोहराम मच गया. वीपी सिन्हा की मौत उस समय पूरे देश-दुनिया की सबसे बड़ी खबर बनी थी.
अपवाद रहे सूर्यदेव सिंह
बंदूक के बल जीने और बंदूक से मरने के मामले में कुछ अपवाद भी रहे. इनमें सबसे प्रमुख नाम है झरिया के विधायक सूर्यदेव सिंह का. उनकी मृत्यु हृदयाघात से हुई थी. इसी तरह सूर्यदेव सिंह के कट्टर विरोधी व जानेमाने मजदूर नेता एसके राय की मृत्यु भी हृदयाघात से हुई थी. एसके राय भी सूर्यदेव सिंह से जान के खतरे को लेकर काफी वर्षों तक बंदूक की सुरक्षा में रहे थे. सूर्यदेव सिंह और एसके राय के बीच हुई जंग में कई बार कोयलांचल की धरती लाल हुई. दर्जनों लोगों की मौत हुई. लेकिन सूर्यदेव सिंह और एसके राय दोनों की मौत स्वाभाविक रही. सूर्यदेव सिंह की मृत्यु के बाद एसके राय ने बंदूक की कड़ी सुरक्षा से खुद को काफी हद तक मुक्त किया.
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