पारंपरिक नृत्य कर मां दुर्गा के प्रति जतायी जाती है आस्था, गुरु से मंत्र की दीक्षा लेने का दिन है हुदूड़ दुर्गा पूजा
Edited by Prabhat Khabar Digital Desk
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पालोजोरी: आदिवासी समुदाय के लोग शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा दसांय के रूप में करते हैं. इस समुदाय में दशहरा को दसांय बोला जाता है. इसमें मुख्य रूप से शक्ति की पूजा की जाती है. यह पर्व पांच दिनों तक चलता है. षष्ठी तिथि से यह शुरू होता है. पूजा विधि-विधान के साथ […]
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पालोजोरी: आदिवासी समुदाय के लोग शक्ति की देवी मां दुर्गा की पूजा दसांय के रूप में करते हैं. इस समुदाय में दशहरा को दसांय बोला जाता है. इसमें मुख्य रूप से शक्ति की पूजा की जाती है. यह पर्व पांच दिनों तक चलता है. षष्ठी तिथि से यह शुरू होता है. पूजा विधि-विधान के साथ संपन्न की जाती है. दशमी को मां के मंडप में पहुंच कर हुदूड़ दुर्गा को समर्पित करते हैं.
इस दौरान मां दुर्गा के प्रतीक रूप में सिंदूर को एक कटोरी में रख कर मरांग बुरू व कामरू बुरू की देख-रेख में उनके शिष्य संताली समाज का पारंपरिक लिबास पहन कर दसांय नृत्य करते हैं. नृत्य में शामिल लोग हाथों में मोर पंख का चांवर नगाड़ा, मांदर, झाल की थाप पर दसांय नृत्य कर भिक्षाटन करते हैं. यह आदिवासी समुदाय का एक महत्वपूर्ण धर्म पर्व है.
पर्व को लेकर छोटे-बड़े व बुजुर्गों में काफी उत्साह रहता है. पालोजोरी के मनोज मुर्मू, राजू चौड़े व गोकुल सोरेन के अनुसार भिक्षाटन में मिली राशि को गुरु दक्षिणा के रूप में समर्पित करते हैं. यह पर्व गुरु व शिष्य के बीच आत्मीय संबंध को भी दर्शाता है. शिष्य अपने गुरु से तंत्र मंत्र की दीक्षा प्राप्त करते हैं. तंत्र दीक्षा की तैयारी विल्ववरण पूजा से 15 दिन पहले शुरू हो जाती है.
गुरु दक्षिणा के तौर पर कुछ चीजें गुरु को समर्पित भी करते हैं, जिनका उपयोग वे जीवन भर नहीं करते. दसांय पर्व के अवसर पर ही शक्ति की उपासना के साथ-साथ शस्त्र विद्या का भी प्रशिक्षण लिया जाता है. इसमें तलवार बाजी व ढाल से बचाव आदि सीखते हैं. आदिवासी धर्मगुरु के अनुसार यह परंपरा उनके जीवन का ही एक हिस्सा है और पूर्वजों से ही वे लोग अपने सभी पर्व-त्योहारों के बारे में जानते व सीखते आ रहे हैं.
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