रांची: झारखंड की पहचान सिर्फ जंगलों और प्राकृतिक संपदा से नहीं, बल्कि जंगल से मिलने वाले ऐसे पारंपरिक खाद्य पदार्थों से भी है, जिनका स्वाद और उपयोग पीढ़ियों से स्थानीय खान-पान का हिस्सा रहा है. इन्हीं में से एक है बस करील यानी बांस की कोमल कोंपल. बारिश के मौसम में बांस के पौधों से निकलने वाली नई कोंपलों को तोड़कर इसका इस्तेमाल भोजन में किया जाता है. उत्तर छोटानागपुर क्षेत्र में इसे स्थानीय तौर पर ‘करील’ कहा जाता है. शोध के मुताबिक राजधानी रांची, हजारीबाग, चतरा, रामगढ़, बोकारो, गिरिडीह, धनबाद और कोडरमा जैसे जिलों में इसका पारंपरिक रूप से खाद्य उपयोग होता रहा है.
बारिश के साथ जंगलों में निकलता है करील
बांस की नई कोंपल बाहर से देखने में भले ही सख्त और परतदार दिखाई देती है, लेकिन इसकी अंदरूनी कोमल कोंपल ही खाने योग्य हिस्सा होती है. उत्तर छोटानागपुर पर किए गए एक अध्ययन में बताया गया है कि यहां करील की उपलब्धता मुख्य रूप से जुलाई से सितंबर के बीच रहती है. स्थानीय लोग जंगल और आसपास के बांस के झुरमुटों से इसे इकट्ठा करते हैं. कुछ परिवार इसका इस्तेमाल अपने भोजन के लिए करते हैं, जबकि कुछ लोग इसे बाजार में बेचकर आय भी अर्जित करते हैं.
झारखंड पर्यटन की आधिकारिक वेबसाइट भी बांस की कोमल कोंपलों को राज्य के पारंपरिक भोजन का हिस्सा बताती है. इसके अनुसार झारखंड में बांस की कोंपलों का इस्तेमाल अलग-अलग तरह के व्यंजनों में सब्जी के रूप में किया जाता है.
सिर्फ सब्जी नहीं, चटनी और अचार में भी स्वाद
बस करिल की खासियत यह है कि इसका इस्तेमाल सिर्फ एक तरह की सब्जी बनाने तक सीमित नहीं है. झारखंड के पारंपरिक खान-पान में इसे अलग-अलग रूपों में इस्तेमाल किया जाता है. ताजा करील से सब्जी बनाई जाती है, जबकि इसे सुखाकर या किण्वित करके लंबे समय तक सुरक्षित रखने की परंपरा भी रही है.
Condé Nast Traveller ने झारखंड के आदिवासी खान-पान पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में सूखे बांस की कोंपल ‘हड़ुवा’ का उल्लेख किया है और इसे चटनी के साथ परोसे जाने वाले पारंपरिक भोजन का हिस्सा बताया है.
वहीं, एक स्वतंत्र पोषण एवं खाद्य अध्ययन में भी झारखंड में बांस की कोंपलों को सब्जी और अचार के रूप में इस्तेमाल किए जाने की बात सामने आई है. इसमें ताजा, कच्चे और किण्वित बांस शूट से अलग-अलग तरह के उत्पाद तैयार करने का उल्लेख है.
करील की खटास ही बनाती है इसे खास
करील का स्वाद सामान्य हरी सब्जियों से अलग होता है. इसे सही तरीके से तैयार करने पर इसमें हल्की खटास और खास तरह की सुगंध आती है. Times of India की रांची से जुड़ी एक रिपोर्ट में करील की भुजिया की विधि भी साझा की गई है, जिसमें करील को काटकर पानी में भिगोने के बाद सरसों के तेल, राई और मिर्च के साथ पकाया जाता है.
झारखंड के पारंपरिक भोजन पर प्रकाशित अन्य रिपोर्टों में भी करील को सुखाकर, भिगोकर और फिर पकाने की परंपरा का उल्लेख मिलता है. कई जगह इसे चावल के साथ परोसा जाता है, जबकि स्थानीय खान-पान में रोटी के साथ भी इसका स्वाद लिया जाता है.
रोटी के साथ भी पसंद किया जाता है बस करील
झारखंड में भोजन की परंपरा काफी हद तक स्थानीय अनाज, सब्जियों और जंगल से मिलने वाले खाद्य पदार्थों पर आधारित रही है. ऐसे में बस करील को रोटी के साथ सब्जी, चटनी या अचार के रूप में खाना भी स्थानीय भोजन संस्कृति का हिस्सा है. झारखंड के पारंपरिक भोजन पर उपलब्ध स्रोतों में बांस की कोंपल से बने व्यंजनों को रोटी और चावल दोनों के साथ परोसे जाने का उल्लेख मिलता है.
यानी एक ही वन उपज से घर की थाली में कई तरह के स्वाद तैयार किए जा सकते हैं- करील की सब्जी, करिल की चटनी, करिल का अचार और रोटी के साथ इसका पारंपरिक स्वाद.
करील को सीधे खाना क्यों ठीक नहीं?
करील को लेकर एक जरूरी बात यह है कि ताजा बांस की कोंपल को सीधे खाना उचित नहीं माना जाता. कुछ बांस प्रजातियों की कोंपलों में प्राकृतिक रूप से ऐसे यौगिक पाए जा सकते हैं जिन्हें उचित प्रसंस्करण के जरिए कम करना जरूरी होता है. इसलिए स्थानीय पारंपरिक विधियों में इसे काटने के बाद पानी में भिगोना, उबालना या किण्वित करना जैसी प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं.
एक अध्ययन में भी करील को खाद्य बनाने के लिए इसकी बाहरी परत हटाने और अंदर के कोमल हिस्से को प्रसंस्कृत करने की प्रक्रिया का उल्लेख है.
जंगल की उपज से जुड़ी है आजीविका भी
बस करिल की कहानी सिर्फ स्वाद तक सीमित नहीं है. यह झारखंड के जंगलों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जुड़ी हुई है. उत्तर छोटानागपुर क्षेत्र पर हुए अध्ययन के अनुसार स्थानीय समुदाय बांस की खाद्य कोंपलों को अपने भोजन के साथ-साथ बाजार में बिक्री के लिए भी इकट्ठा करते हैं. इस तरह करील जंगल से मिलने वाली उन मौसमी उपजों में शामिल है, जो ग्रामीण परिवारों के लिए भोजन और आय-दोनों का साधन बन सकती है.
बांस की कोंपलों से अचार, सूखे उत्पाद और अन्य मूल्यवर्धित खाद्य पदार्थ तैयार करने की संभावनाओं का भी आधुनिक शोध में उल्लेख किया गया है. इससे स्थानीय वन उपज को बाजार से जोड़कर ग्रामीण आजीविका के अवसर बढ़ाए जा सकते हैं.
झारखंड की थाली में जंगल का स्वाद
झारखंड की खाद्य संस्कृति में करील इस बात का उदाहरण है कि यहां जंगल सिर्फ लकड़ी और वन संपदा का स्रोत नहीं रहे, बल्कि पीढ़ियों से स्थानीय भोजन का भी आधार रहे हैं. बारिश में निकलने वाली बांस की कोमल कोंपल जब घरों तक पहुंचती है तो उससे बनने वाली सब्जी, चटनी और अचार में जंगल का स्वाद महसूस होता है.
बस करील इसलिए सिर्फ बांस की नई कोंपल नहीं, बल्कि झारखंड की पारंपरिक खाद्य संस्कृति, मौसमी ज्ञान और ग्रामीण जीवन से जुड़ी एक खास वन उपज है.
