Simplicity of Sanskrit: बैजनाथ पाण्डेय आर्य संस्कृत महाविद्यालय, सीवान में 25 से 31 अगस्त तक आयोजित संस्कृत सप्ताह समारोह के छठे दिन रविवार को संस्कृत की आवश्यकता, उपयोगिता, सरलता, ऐतिहासिक महत्व और विभिन्न शास्त्रों में निहित दार्शनिक तत्वों पर विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया. वक्ताओं ने संस्कृत को केवल धार्मिक अथवा प्राचीन भाषा मानने की धारणा बदलने और इसे दैनिक व्यवहार से जोड़ने पर जोर दिया.
भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल संवाहिका है संस्कृत
मुख्य वक्ता डीएवी महाविद्यालय, सीवान के सेवानिवृत्त आचार्य प्रो. रविन्द्र पाठक ने कहा कि संस्कृत केवल प्राचीन भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल संवाहिका है. वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष, व्याकरण, साहित्य और गणित सहित ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं का मूल साहित्य संस्कृत में उपलब्ध है.
उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल पूजा-पाठ तक सीमित करना इसके व्यापक स्वरूप को सीमित करना है. जिस भाषा में ज्ञान की इतनी समृद्ध परंपरा सुरक्षित है, उसकी आवश्यकता केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज को इसकी जानकारी होनी चाहिए.
संस्कृत को सरल बनाने की जरूरत
प्रो. रविन्द्र पाठक ने संस्कृत को सरल बनाने पर जोर देते हुए कहा कि इसे कठिन समझने की मानसिकता को समाप्त करना होगा. घर-परिवार, विद्यालय और सामाजिक जीवन में छोटे-छोटे संस्कृत वाक्यों के प्रयोग से इसे सहज रूप से व्यवहार की भाषा बनाया जा सकता है.
महावीरी विद्यालय के आचार्य मनोज पाठक ने कहा कि संस्कृत किसी एक वर्ग या समुदाय की भाषा नहीं है. यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और ज्ञान-विज्ञान की महत्वपूर्ण भाषा है. इसके अध्ययन से भारतीय चिंतन, दर्शन, संस्कार और जीवन-मूल्यों को समझने का अवसर मिलता है.
उन्होंने विद्यार्थियों से संस्कृत को केवल परीक्षा का विषय न मानकर जीवन और ज्ञान से जोड़ने की अपील की.
भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत की महत्वपूर्ण भूमिका
जेडए इस्लामिया महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. डॉ. अशोक प्रियंबद ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में संस्कृत की भूमिका पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि भारतीय भाषाओं के विकास में संस्कृत का महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
उन्होंने कहा कि संस्कृत की शब्द-संपदा और व्याकरणिक संरचना का भारतीय भाषाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा है. भारतीय भाषाओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए संस्कृत का ज्ञान उपयोगी है.
छोटे प्रयोगों से आसान होगी संस्कृत
राजा सिंह कॉलेज के सेवानिवृत्त प्रधानाचार्य प्रो. उदय शंकर पाण्डेय ने संस्कृत की सरलता और व्यवहारिकता के उदाहरण प्रस्तुत किये. उन्होंने दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले सामान्य वाक्यों के संस्कृत रूप बताते हुए कहा कि छोटे-छोटे प्रयोगों के माध्यम से संस्कृत बोलना आसान हो सकता है.
उन्होंने कहा कि संस्कृत को कठिन मानने के बजाय सरल और दैनिक प्रयोगों के माध्यम से अपनाने की जरूरत है.
संस्कृत को जनभाषा बनाने की जरूरत : प्रधानाचार्य
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्रधानाचार्य प्रो. श्याम शंकर प्रसाद ने कहा कि संस्कृत को केवल देवभाषा तक सीमित कर देने से इसका दायरा संकुचित हुआ है. अब इसे जनभाषा बनाने की आवश्यकता है.
उन्होंने कहा कि पंडितों और पुरोहितों ने संस्कृत को जीवित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है, लेकिन दैनिक जीवन में संस्कृत शब्दों और वाक्यों के प्रयोग को बढ़ावा देकर ही इसका संवर्धन और संरक्षण संभव है.
संस्कृत वर्तमान और भविष्य के लिए भी उपयोगी
कार्यक्रम का संचालन डॉ. बद्रीनारायण गौतम ने किया. उन्होंने संस्कृत की वैज्ञानिकता, सरलता और व्यापकता से संबंधित उदाहरण प्रस्तुत किये. उन्होंने कहा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के लिए भी उपयोगी ज्ञान-भाषा है.
मौके पर डॉ. दिग्विजय कुमार पाण्डेय, डॉ. शाहिद आलम, डॉ. संतोष कुमार, तेज नारायण सिंह, अर्जुन कुमार यादव, रमेश कुमार सिंह, हर्षित कुमार, सुदामा भगत, नेहा, अंकु, सपना सहित शिक्षक, विद्यार्थी, गणमान्य लोग और संस्कृत प्रेमी मौजूद रहे. अंत में अतिथियों और उपस्थित लोगों के प्रति आभार व्यक्त किया गया.
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