सीवान: बड़हरिया के कमरुल हक थे आजादी के अनसंग हीरो, गांधीजी के आह्वान पर स्वतंत्रता आंदोलन में कूदे

देश आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, लेकिन कई अनसंग फ्रीडम फाइटर इतिहास के पन्नों में खो गए. ऐसे ही एक वीर थे कमरुल हक, जिन्होंने गांधीजी की विचारधारा से प्रेरित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में अपना जीवन समर्पित कर दिया. जानें उनके असाधारण योगदान के बारे में.

Unsung Freedom Fighter: देश स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना रहा है. आजादी की जंग देशवासियों के त्याग, बलिदान और कुर्बानियों की कहानियों से भरी हुई है. स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास ऐसी साहसी शख्सियतों की कहानियों से भी भरा है, जिन्होंने देश को गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए हर संभव संघर्ष किया. इनमें कुछ ने गोलियां खाईं, कुछ स्वतंत्रता सेनानियों ने जेल की यातनाएं सहीं, तो कुछ आजादी के दीवाने अपने तरीके से देश को आजाद कराने के लिए ताउम्र संघर्ष करते रहे. लेकिन आजादी के इतिहास के पन्नों में कई ऐसे सेनानियों को जगह नहीं मिल सकी.

इन्हीं अनसंग फ्रीडम फाइटर में शामिल थे कमरुल हक साहब. कमरुल हक का जन्म प्रखंड के बभनबारा में वर्ष 1902 में हुआ था. मुस्लिम यूनिवर्सिटी अलीगढ़ से इंटर करने के बाद उन्होंने ग्रेजुएशन के लिए दाखिला लिया ही था कि गांधीजी का स्वतंत्रता आंदोलन जोर पकड़ने लगा. इसके बाद कमरुल हक स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और हिंदू-मुस्लिम एकता सम्मेलनों में भाग लेकर देशवासियों को एकजुट करने में जुट गये.

गांधीजी के आगमन पर कौमी एकता सम्मेलन में लिया हिस्सा

कमरुल हक की उम्र उस समय करीब 22 से 25 वर्ष रही होगी. सीवान के गांधी मैदान में महात्मा गांधी का आगमन होने वाला था, जिसकी अगुवाई डॉ. राजेंद्र प्रसाद कर रहे थे. उस समय गांधी मैदान एडवर्ड मेमोरियल ग्राउंड के नाम से जाना जाता था.

वर्ष 1927 में स्वतंत्रता संग्राम की मशाल लेकर निकले महात्मा गांधी 16 जनवरी 1927 को महाराजगंज के रास्ते राजेंद्र बाबू के पैतृक आवास जीरादेई पहुंचे थे. इस मौके पर कौमी एकता सम्मेलन आयोजित किया गया था. सम्मेलन में कमरुल हक ने मौलाना मजहरुल हक, राजा रफीक बाबू, सगीरुल हक उर्फ मोख्तार बाबू, अब्दुल खालिद उर्फ हकीम जी, श्रीकृष्ण सिंह, मोहम्मद हबीबुल्लाह समेत अन्य लोगों के साथ बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया.

गांधीजी की विचारधारा से प्रभावित होकर अपनाई खादी

कमरुल हक गांधीजी की विचारधारा से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गांधीजी के आह्वान पर खादी का पायजामा, कुर्ता और टोपी धारण कर लिया. इसके बाद वह ताउम्र खादी की पोशाक में रहे. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान उन्होंने हिंदू-मुस्लिम एकता और देशवासियों को एकजुट करने के लिए लगातार काम किया.

1957 में बने बड़हरिया के विधायक

बड़हरिया विधानसभा क्षेत्र की जनता ने आजादी के आंदोलन में उनके योगदान को देखते हुए वर्ष 1957 में उन्हें बड़हरिया विधानसभा क्षेत्र से विधायक चुना. वह वर्ष 1962 तक बड़हरिया का प्रतिनिधित्व करते रहे.

उनके पुत्र मोहम्मद उमैर ने बताया कि कमरुल हक दिल्ली जाकर देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से भी मिले थे. बभनबारा निवासी स्व. अजीमुल हक के पुत्र कमरुल हक का निधन 30 जून 1993 को हुआ.

क्षेत्रवासी आज भी उन्हें हिंदू-मुस्लिम एकता के पुरोधा और गांधीजी के विचारों के अलमबरदार के रूप में याद करते हैं.

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By आनंद मिश्र

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