अज्ञात शवों को कफन भी नहीं होता नसीब

Published at :26 Aug 2016 5:31 AM (IST)
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अज्ञात शवों को कफन भी नहीं होता नसीब

दाह-संस्कार को मिलता है प्रति शव मात्र 400 शवों को नोच-नोच कर खा जाते हैं कुत्ते सीतामढ़ी : कहा जाता है कि जीते जी भले ही किसी को किसी से दुश्मनी रहती है, पर मरने के बाद कोई दुश्मनी नहीं रह जाती है. यह बात जानते हुए भी राज्य सरकार की न जाने अज्ञात शवों […]

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दाह-संस्कार को मिलता है प्रति शव मात्र 400

शवों को नोच-नोच कर खा जाते हैं कुत्ते
सीतामढ़ी : कहा जाता है कि जीते जी भले ही किसी को किसी से दुश्मनी रहती है, पर मरने के बाद कोई दुश्मनी नहीं रह जाती है. यह बात जानते हुए भी राज्य सरकार की न जाने अज्ञात शवों से कैसी दुश्मनी है कि उसके दाह-संस्कार के लिए पर्याप्त पैसा नहीं दे पाती है. यानी अज्ञात शव को कफन भी नसीब नहीं होते. अज्ञात शवों का कैसा हाल होता है, यह जानने के लिए दिल पत्थर का करना होगा. सच्चाई जानने के बाद लोगों को शासन व प्रशासन के प्रति गुस्सा आयेगा, पर सरकार की व्यवस्था ही कुछ ऐसी है कि दाह-संस्कार के अभाव में शवों को नोच-नोच कर कुत्ते खा जाते हैं.
2015 से अब तक 78 अज्ञात शव : सदर अस्पताल की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2015 में 53 अज्ञात शव बरामद किये गये थे. वहीं, वर्ष 2016 में अब तक विभिन्न स्थानों से 25 अज्ञात शव बरामद किये गये हैं, जिसमें पुरुष के 18 व महिला के सात शव शामिल है. नियम है कि अज्ञात शव बरामद होने पर संबंधित थानाध्यक्ष द्वारा यूडी केस दर्ज कर शव को पोस्टमार्टम के लिए सदर अस्पताल भेज दिया जाता है. उसके बाद शव को 72 घंटा तक थाना में सुरक्षित रखा जाता है
ताकि इस बीच कहीं शव की पहचान हो सके. इंस्पेक्टर जगनिवास सिंह बताते हैं कि शव का फोटो व हुलिया का मैसेज सभी थानाध्यक्षों के मोबाइल पर भेज दिया जाता है. थानाध्यक्षों द्वारा ग्रामीण पुलिस की मदद से अज्ञात शव की पहचान करने की कोशिश की जाती है. पहचान नहीं होने पर मृतक का वस्त्र या अन्य कोई सामान सुरक्षित रख कर शव का धर्म के अनुसार संस्कार कर दिया जाता है.
वर्ष 2016 में मिले शव
माह पुरुष महिला
जनवरी 2 0
फरवरी 3 1
मार्च 3 0
अप्रैल 4 0
मई 1 0
जून 2 4
जुलाई 3 0
अगस्त 3 2
गड्ढे में दबा दिया जाता है शव
पोस्टमार्टम के बाद शव का दाह संस्कार करने की जिम्मेवारी कर्मी शंकर राउत की है. बता दें कि एक शव को जलाने के लिए सरकार 400 रुपये देती है. इसी पैसे से उसे शव को नदी के किनारे ले जाना होता है और दाह-संस्कार करना होता है, लेकिन पैसे काफी कम होने के कारण शव को जलाना संभव नहीं हो पाता है. इस बात को शंकर ने भी स्वीकार किया है. बताया कि शव को लक्ष्मणा नदी के किनारे गड्ढा खोद कर उसमें दबा दिया जाता है. बताया कि कई बार देखने को मिला है कि कुत्ते मिट्टी खोद कर शव को बाहर निकाल कर नोच-नोच कर उसे तहस-नहस कर देते हैं.
अज्ञात शव के आने पर परेशानी उत्पन्न हो जाती है. ऐसे शव पर खर्च करने के लिए सरकार एक रुपया भी नहीं देती है. कभी-कभी पुलिस को अपने पॉकेट से खर्च करना पड़ता है. सरकारी व गैर सरकारी कोई संस्था जिले में दिखाई नहीं पड़ती कि अज्ञात शव के लिए कोई कारगर उपाय कर सके.
डॉ पीपी लोहिया, उपाधीक्षक
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