इलाज नहीं, इंज्यूरी रिपोर्ट की दरकार

Updated at : 22 Sep 2017 6:13 AM (IST)
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इलाज नहीं, इंज्यूरी रिपोर्ट की दरकार

सदर अस्पताल. आवेदन पर पुलिस करती है प्राथमिकी से इनकार, तो आते हैं हॉस्पीटल जमीन विवाद व आपसी रंजिश के ज्यादा हैं मामले महीने में चार दर्जन से अधिक मामले होते हैं दर्ज सहरसा : आप जमीन विवाद या आपसी रंजिश से परेशान हैं, आपके द्वारा दिये गये आवेदन पर थाना मुकदमा करने से इंकार […]

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सदर अस्पताल. आवेदन पर पुलिस करती है प्राथमिकी से इनकार, तो आते हैं हॉस्पीटल

जमीन विवाद व आपसी रंजिश के ज्यादा हैं मामले
महीने में चार दर्जन से अधिक मामले होते हैं दर्ज
सहरसा : आप जमीन विवाद या आपसी रंजिश से परेशान हैं, आपके द्वारा दिये गये आवेदन पर थाना मुकदमा करने से इंकार कर रहा है. इस प्रकार की समस्या वाले लोगों के लिए इन दिनों सदर अस्पताल का बिस्तर वरदान साबित होने लगा है. सरकारी अस्पताल में उपलब्ध स्वास्थ्य सुविधाओं का आलम यह है कि शहर के दर्जनों निजी नर्सिंग होम में मरीजों की भीड़ लगी रहती है. ऐसे में भी सदर अस्पताल के अधिकांश बेड मुकदमे की चाहत में पहुंचे तथाकथित मरीजों से भरे रहते हैं.
खास बात यह है कि अस्पताल के आपातकालीन कक्ष में निबंधन के बाद अधिकांश लोग पुलिस द्वारा लिये जाने वाले फर्द बयान तक मौजूद रहते हैं. बाद में इनकी परछाईं भी आपको ढूंढ़ने से नहीं मिलेगी. जबकि अस्पताल के रजिस्टर में अभी भी दर्जनों मरीज का नाम दैनिक पंजी में दर्ज रहती है. मिली जानकारी के अनुसार, वादी-प्रतिवादी पर प्राथमिकी दर्ज कराने के उद्देश्य से जख्म प्रतिवेदन सुनिश्चित करने के लिए भी अस्पताल का सहारा लेने से नहीं कतराते हैं. ऐसे मामलों में अस्पताल प्रबंधन की सख्ती से मरीजों की बढ़ती संख्या को भी कम किया जा सकता है. इस प्रकार की कवायद से प्रतिदिन बढ़ने वाले झूठे मुकदमे की लिस्ट भी छोटी की जा सकती है.
मिली जानकारी के अनुसार जख्म प्रतिवेदन के मामलों की संख्या महीने में साठ से सत्तर तक पहुंच जाती है. जिसमें जिले के सभी पीएचसी भी शामिल होते हैं. शहर के निजी नर्सिंग होम से गंभीर अवस्था वाले मरीजों की लिस्ट ही पहुंचती है. हालांकि बाद में पुलिसिया अनुसंधान व कोर्ट तक पहुंचने में कई मामले फर्जी साबित होते हैं. आप गौर करियेगा, सदर अस्पताल में ऐसे तथाकथित मरीज व उनके परिजन चिकित्सक व अन्य सुविधाओं से ज्यादा इंज्यूरी रिपोर्ट देने वाले कार्यालय की खबर रखते हैं.
इलाज से ज्यादा इंज्यूरी रिपोर्ट की चिंता
मारपीट व इस प्रकार के विवाद में भरती मरीज की भौतिक दशा देख प्रथम दृष्टया परिजनों से पूछने की नौबत आ जाती है कि मरीज कौन है? भरती मरीज बेड पर बैठे पुलिस के आगमन का ही इंतजार करते रहते हैं. लोग बताते हैं कि सरकारी अस्पताल में भरती होने पर दूसरे पक्ष पर दबाव बनाया जा सकता है. इनलोगों को बेड आवंटित कर दिये जाने की वजह से जरूरतमंद मरीजों को बरामदे पर इलाज कराना पड़ता है.
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