Bihar MLC Election 2026: बिहार विधान परिषद की 10 सीटों के लिए 18 जून को मतदान होगा. इनमें 9 सीटों पर छह साल के कार्यकाल के लिए नियमित चुनाव होना है, जबकि एक सीट पर उपचुनाव कराया जाएगा. यह उपचुनाव पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के विधान परिषद छोड़ने से खाली हुई सीट के लिए हो रहा है. इस सीट का कार्यकाल अभी करीब चार साल बचा हुआ है. विधान परिषद की ये सभी सीटें विधानसभा कोटे की हैं. यानी इन सीटों पर सीधे जनता नहीं, बल्कि बिहार विधानसभा के विधायक मतदान करते हैं. 1 जून से नामांकन प्रक्रिया शुरू हो चुकी है.
किन सीटों पर हो रहा है चुनाव
नियमित चुनाव वाली 9 सीटों में जदयू के श्रीभगवान सिंह कुशवाहा, गुलाम गौस, भीष्म सहनी और कुमुद वर्मा की सीट शामिल हैं. भाजपा के सम्राट चौधरी और संजय मयूख का कार्यकाल भी समाप्त हो रहा है. राजद के सुनील कुमार सिंह और मोहम्मद फारूक तथा कांग्रेस के समीर कुमार सिंह की सीटों पर भी चुनाव होना है.
कैसे तय होती है जीत
243 सदस्यीय बिहार विधानसभा में 9 विधान परिषद सीटों के लिए चुनाव होना है. ऐसे में जीत का आंकड़ा कुल मतदान करने वाले विधायकों की संख्या के आधार पर तय किया जाता है. अगर सभी 243 विधायक वोट डालते हैं, तो चुनावी नियमों के अनुसार जीत का कोटा निकाला जाता है. इसके लिए कुल वोट मूल्य 24300 माना जाता है, क्योंकि हर विधायक के वोट की कीमत 100 होती है.
इसके बाद 24300 को 10 से भाग दिया जाता है, क्योंकि 9 सीटों के साथ एक संख्या और जोड़ी जाती है. इससे आंकड़ा 2430 आता है. इसमें 1 जोड़ने पर जीत का कोटा 2431 हो जाता है. यानी किसी भी उम्मीदवार को जीत दर्ज करने के लिए कम से कम 2431 वोट मूल्य हासिल करना होगा. आसान भाषा में कहें तो लगभग 25 विधायकों की पहली वरीयता का समर्थन किसी उम्मीदवार को जीत दिलाने के लिए पर्याप्त माना जाता है.
एनडीए और महागठबंधन की स्थिति
वर्तमान समय में विधानसभा में एनडीए के पास जदयू, भाजपा, लोजपा (रामविलास), हम और रालोमो को मिलाकर 202 विधायक हैं. इस संख्या के आधार पर एनडीए आसानी से 8 सीटें जीत सकता है. दूसरी तरफ महागठबंधन के पास राजद, कांग्रेस, माले, सीपीएम और अन्य सहयोगी दलों को मिलाकर 35 से ज्यादा विधायक हैं. इसके अलावा एआईएमआईएम और बसपा के विधायक भी विपक्षी खेमे में हैं. कुल मिलाकर विपक्ष के पास लगभग 41 विधायक हैं, जो एक सीट जीतने के लिए पर्याप्त हैं.
दूसरी वरीयता के वोट क्यों अहम
यदि पहली वरीयता के वोटों से सभी सीटों का फैसला नहीं हो पाता, तो दूसरी वरीयता के मतों की गिनती शुरू होती है. इसी प्रक्रिया से पहले भी राज्यसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार शिवेश राम को जीत मिली थी. उस चुनाव में कई उम्मीदवार पहले दौर में ही जीत गए थे. उनके अतिरिक्त वोटों की वैल्यू निकालकर दूसरी वरीयता के आधार पर दूसरे उम्मीदवार को ट्रांसफर किया गया. इसी वजह से शिवेश राम जीत का आंकड़ा पार कर सके थे.
क्या बदल सकता है समीकरण
फिलहाल विधानसभा के मौजूदा आंकड़ों को देखें तो एनडीए के पास 8 सीटें जीतने का स्पष्ट गणित है. वहीं महागठबंधन एक सीट जीत सकता है. एनडीए के पास 8 सीट जीतने के बाद केवल दो अतिरिक्त वोट बचेंगे, जबकि विपक्ष के पास करीब 16 वोट बचेंगे. इन अतिरिक्त वोटों के आधार पर कोई भी पक्ष अतिरिक्त सीट नहीं निकाल सकता. यदि किसी दल ने रणनीतिक तौर पर 10वां उम्मीदवार उतार दिया या कहीं क्रॉस वोटिंग हुई, तो मुकाबला दिलचस्प हो सकता है.
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क्या है संभावित नतीजा
मौजूदा राजनीतिक और संख्यात्मक स्थिति को देखें तो विधानसभा का गणित साफ संकेत दे रहा है कि 9 नियमित सीटों में से 8 सीटें एनडीए और 1 सीट महागठबंधन के खाते में जा सकती है. हालांकि अंतिम तस्वीर मतदान और वरीयता मतों की गिनती के बाद ही साफ होगी.
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