पटना : हिंदी पट्टी में बिहार के बच्चे निकल रहे यूपीएससी में आगे
Updated at : 07 Apr 2019 5:38 AM (IST)
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पटना : करीब सवा सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 20वीं सदी के अंत से देश में पिछड़ों का उदय होगा और उनका सभी क्षेत्रों में दबदबा होगा. हाल के दो-तीन वर्षों के यूपीएससी के परिणाम स्वामी विवेकानंद की इस भविष्यवाणी को सच साबित कर रहा है. बिहार इसका सटीक उदाहरण है. […]
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पटना : करीब सवा सौ साल पहले स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि 20वीं सदी के अंत से देश में पिछड़ों का उदय होगा और उनका सभी क्षेत्रों में दबदबा होगा. हाल के दो-तीन वर्षों के यूपीएससी के परिणाम स्वामी विवेकानंद की इस भविष्यवाणी को सच साबित कर रहा है. बिहार इसका सटीक उदाहरण है. न सिर्फ मध्यम वर्ग बल्कि गरीब घरों में पले बढ़े लड़कों ने यूपीएससी की परीक्षाओं में अपनी मेधा साबित की है.
सरकारी स्कूल में पढ़ी और साधारण घर की बेटी चित्रा मिश्रा ने अखिल भारतीय रैंक में 20 वां स्थान तथा ऋषभ मंडल ने 58 वां रैंक हासिल कर बिहारी प्रतिभा का लोहा मनवाया है. 80 के दशक में आइएएस और आइपीएस की भर्ती करने वाले यूपीएससी की परीक्षाओं में बिहार की दमदार उपस्थिति होती थी. बाद के दिनों में इसमें गिरावट आयी. पर, हाल के वर्षों में एक बार फिर इतिहास दोहराने की स्थिति में है. दूसरे प्रांतों की तुलना में यहां के कालेज और विवि में यहां शिक्षा का माहौल बेहतर नहीं है, पर प्रतिभा के मामले में यहां के बच्चों की सानी नहीं है.
2015 में समस्तीपुर के भगवान जसवा गांव से निकल देश भर में पांचवां स्थान हासिल करने वाले सुहर्ष भगत कहते हैं, सी-सैट प्रक्रिया की अनिवार्यता जब से खत्म हुई है, बिहारी के लड़कों की बाधा भी कम हुई है.
वर्तमान में सारण के उप विकास आयुक्त के पद पर नियुक्त सुहर्ष कहते हैं, दिल्ली में पढ़ रहे हाेशियार लोगों की तुलना में बिहार के छोटे शहरों में रह कर तैयारी करने वाले युवाओं के पास भी अब यूपीएससी की सभी मेटेरियन आन लाइन उपलब्ध है. यह भी एक बड़ा कारण है.
पटना कालेज के प्राचार्य डा आरएस आर्या कहते हैं, बिहार के बच्चे अपनी लगन और मेहनत से वो परिणाम हासिल कर रहे हैं. डॉ आर्या कहते हैं,इस बार का टापर राजस्थान के दलित बिरादरी का युवक है. यह बदलाव है.
अनुग्रह नारायण सिंह सामाजिक अध्ययन संस्थान के पूर्व निदेशक डा डीएम दिवाकर कहते हैं, कारपोरेट सेक्टर की नौकरियों में अनिश्चिता की माहौल ने एक बार फिर सरकारी नौकरियों के प्रति युवाओं मे आकर्षण बढ़ा है.
खास कर गरीब व मध्यम वर्ग के बच्चों ने जुझारूपन का यह परिणाम है. दिवाकर कहते हैं,बड़े घरों के बच्चों के पास कई विकल्प होते हैं. इंजीनियर, डाक्टर, प्रबंधन और कारपोरेट सेक्टर की अन्य नौकरियां आसानी से मिल जाती है. पर, गरीब और मध्यम वर्ग के घराें में पले बचों के पास सीमित विकल्प और संसाधन होते हैं. वो अपने लगन और मेहनत से सफलता हासिल कर रहे हैं.
बेहतर मेटेरियल, बेहतर मार्गदर्शन से आगे आ रहे युवा
दूसरे राज्यों की तुलना में बिहार में सरकारी नौकरी के विकल्प नहीं बढ़े. गरीब घरों में पले युवकों के सामने नौकरी के लिए जीवन मरण का प्रश्न होता है. ऐसे में उनका यह प्रयास रंग ला रहा है.
विजय प्रकाश, रिटायर आइएएस
गांव से पटना और फिर दिल्ली की पढ़ाई बिहार के युवाओं को सफलता दिला रही है. बेहतर मेटेरियल, बेहतर मार्गदर्शन और इंटरनेट की जानकारी के कारण ऐसे युवा भी यूपीएससी की परीक्षा देने आगे आ रहे जो पहले सोचते भी नहीं थे.
कुमार विजय, शिक्षाविद
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