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सृजन घोटाला : गरीबों, पिछड़ों और महादलित महिलाओं की संस्था में कैसे हो गया 1000 करोड़ का घोटाला, जानें पूरी कहानी

पटना : बिहार में इन दिनों सृजन घोटाले का बड़ा शोर है. कल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सीबीआइ जांच की अनुशंसा किये जाने के बाद इसकी चर्चा बिहार से बाहर होने लगी है. इस घोटाले के पीछे सृजन नामक एनजीओ की कहानी है. सृजन संस्था का पूरा नाम ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ है. इससे […]

पटना : बिहार में इन दिनों सृजन घोटाले का बड़ा शोर है. कल मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सीबीआइ जांच की अनुशंसा किये जाने के बाद इसकी चर्चा बिहार से बाहर होने लगी है. इस घोटाले के पीछे सृजन नामक एनजीओ की कहानी है. सृजन संस्था का पूरा नाम ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ है. इससे एकीकृत बिहार (अब झारखंड) के रांची में लाह अनुसंधान में वरीय वैज्ञानिक की पत्नी मनोरमा देवी के आत्मनिर्भर बनने की कहानी गुंथी हुई है. इसकी शुरुआत वर्ष 1993-94 में की गयी थी. वर्ष 1991 में जब मनोरमा देवी के पति का निधन हो गया, तब छह बच्चों की मां के कंधों पर परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी आ गयी. पति की मौत के करीब ढाई-तीन वर्षों बाद वर्ष 1993-94 में मनोरमा देवी ने दो महिलाओं के साथ सृजन संस्था की शुरुआत की. वर्ष 1996 में सहकारिता विभाग में को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में संस्था को मान्यता भी मिल गयी. को-ऑपरेटिव सोसाइटी के रूप में सदस्य महिलाओं के पैसे जमा भी लिये जाते थे, जिस पर उन्हें ब्याज भी मिलता था. आपातकाल में महिलाओं को संस्था कर्ज भी देने लगी.

गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं का जीवन स्तर ऊंचा उठाने के लिए संस्था से जोड़ा

मनोरमा देवी ने वर्ष 1993-94 में सबौर में किराये का एक कमरा लिया. उन्हें सुनीता और सरिता नाम की दो महिलाओं का सहयोग मिला. मनोरमा देवी ने एक सिलाई मशीन लेकर कपड़ा सिलने का काम शुरू किया. कपड़े तैयार कर बाजार में बेचा जाने लगा. मनोरमा देवी गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने और आत्मनिर्भर करने के लिए अपनी संस्था से जोड़ने लगीं. महिलाओं की संख्या बढ़ने और काम अधिक आने पर मनोरमा देवी ने रजंदीपुर पैक्स से 10 हजार रुपये कर्ज लिया. कपड़े सिलने और बाजार में आपूर्ति बढ़ने से मनोरमा देवी ने स्वयं सहायता समूह बनाना शुरू कर दिया. इन महिलाओं को स्वरोजगार के जरिये अपनी संस्था ‘सृजन’ से जोड़ने लगीं.

धीरे-धीरे बढ़ने लगा ‘सृजन संस्था’ का कद

धीरे-धीरे आमदनी भी बढ़ने लगी. सिलाई-कढ़ाई का काम भी बढ़ता गया. एक से बढ़ कर कई सिलाई मशीनों पर काम होने लगा. महिलाओं की संख्या भी बढ़ने लगी. इसके बाद वर्ष 1996 में मनोरमा देवी ने ‘सृजन महिला विकास सहयोग समिति’ नाम से अपनी संस्था का निबंधन कराया. साथ ही मनोरमा देवी संस्था में सचिव के रूप काम करने लगीं. समाज की गरीब, पिछड़ी और महादलित महिलाओं को समिति से जुड़ता देख सहकारिता बैंक ने 40 हजार रुपये का लोन पास कर दिया. काम से प्रभावित होकर सबौर स्थित ट्रायसम भवन में समिति को अपनी गतिविधियों के आयोजन की अनुमति भी मिल गयी. बाद में जिलाधिकारी एक एनजीओ को सरकार की जमीन मात्र 200 रुपया महीने पर 35 साल की लीज पर दे देते हैं.

कैसे शुरू हुआ घोटाले का खेल

वर्ष 2007-2008 में सृजन को-ऑपरेटिव बैंक खुल जाने के बाद से घोटाले का खेल शुरू होता है. भागलपुर ट्रेजरी के पैसे को सृजन को-ऑपरेटिव बैंक के खाते में ट्रांसफर करने और फिर वहां से सरकारी पैसे को बाजार में लगाया जाने लगा. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सृजन में स्वयं सहायता समूह के नाम पर कई फर्जी ग्रुप बनाये गये. उनके खाते भी खोले गये और इन खातों के जरिये नेताओं और नौकरशाहों का कालाधन सफेद किया जाने लगा.

कैसे होता था घोटाला

सरकारी विभाग के बैंकर्स चेक या सामान्य चेक के पीछे ‘सृजन समिति’ की मुहर लगाते हुए मनोरमा देवी हस्ताक्षर कर देती थीं. इस तरह उस चेक का भुगतान सृजन के उसी बैंक में खुले खाते में हो जाते थे. जब भी कभी संबंधित विभाग को अपने खाते की विवरणी चाहिए होती थी, तो फर्जी प्रिंटर से प्रिंट करा कर विवरणी दे दी जाती थी. इस तरह विभागीय ऑडिट में भी अवैध निकासी पकड़ में नहीं आ पाती थी.

वर्ष 2008 से ही हो रहा था घोटाला

सृजन में घोटाला वर्ष 2008 से ही हो रहा है. उस समय बिहार में जदयू-भाजपा की सरकार थी. वित्त मंत्रालय का प्रभार सुशील कुमार मोदी के पास था. उसी साल ऑडिटर ने यह गड़बड़ी पकड़ ली. तब ऑडिटर ने आपत्ति जतायी कि सरकार का पैसा को-ऑपरेटिव बैंक में कैसे जमा हो रहा है? उसके बाद तत्कालीन एसडीएम विपिन कुमार ने सभी प्रखंड के अधिकारियों को पत्र लिखा कि पैसा ‘सृजन’ के खाते में जमा नहीं करें. इसके बावजूद सब कुछ पहले जैसा ही होता रहा. आखिर कोई जिलाधिकारी किसके आदेश पर सरकारी विभागों का पैसा ‘सृजन को-ऑपरेटिव बैंक’ के खाते में भेज रहाथा? यहां पदस्थापित होनेवाले दूसरे कई जिलाधिकारियों ने भी ऐसा होने दिया. इसके बाद 25 जुलाई, 2013 को भारतीय रिजर्व बैंक ने बिहार सरकार से कहा था कि इस को-ऑपरेटिव बैंक की गतिविधियों की जांच करें. रिजर्व बैंक का आदेश है कि अगर 30 करोड़ से अधिक की गड़बड़ी होगी, तो जांच सीबीआई करेगी. वर्ष 2013 में भागलपुर के तत्कालीन जिलाधिकारी प्रेम सिंह मीणा ने ‘सृजन’ की बैंकिंग प्रणाली पर सवाल खड़े करते हुए जांच टीम गठित कर दी थी. अब फिर यह मामला गर्म हो गया है.

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