हथुआ में वोटों के बंंटवारे से विधायक की राह हुई आसान
हथुआ में वोटों के बंंटवारे से विधायक की राह हुई आसान चुनाव विश्लेषकों ने कहा कि हथुआ में नीतीश फैक्टर, एनडीए का नकारात्मक चुनाव प्रचार, जातीय पोलराइजेशन, प्रत्याशी चयन में चूक व अगड़ा-पिछड़ा फैक्टर का रहा असरफोटो-1 शिवजी प्रसाद, आमनेसंवाददाता, हथुआहथुआ विधानसभा क्षेत्र का चुनाव काफी दिलचस्प रहा. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान त्रिकोणात्मक संघर्ष […]
हथुआ में वोटों के बंंटवारे से विधायक की राह हुई आसान चुनाव विश्लेषकों ने कहा कि हथुआ में नीतीश फैक्टर, एनडीए का नकारात्मक चुनाव प्रचार, जातीय पोलराइजेशन, प्रत्याशी चयन में चूक व अगड़ा-पिछड़ा फैक्टर का रहा असरफोटो-1 शिवजी प्रसाद, आमनेसंवाददाता, हथुआहथुआ विधानसभा क्षेत्र का चुनाव काफी दिलचस्प रहा. पूरे चुनाव प्रचार के दौरान त्रिकोणात्मक संघर्ष देखने को मिला. दो प्रतिद्वंद्वियों के बीच वोटों के बंटवारे ने रामसेवक सिंह की राह आसान कर दी. चुनाव परिणाम को लेकर जब प्रभात खबर की टीम ने चुनाव विश्लेषकों से राय ली, तो उन्होंने महागंठबंधन प्रत्याशी की जीत व एनडीए प्रत्याशी की हार पर अपने विचार रखे. चुनाव विश्लेषक व शिक्षाविद शिवजी प्रसाद ने बताया कि हथुआ में जातीय पोलराइजेशन जबरदस्त तरीके से हुआ, जिसके आधार पर महागंठबंधन को जीत मिली. वहीं, बीजेपी के आधार वोटों का बंटवारा होना भी महागंठबंधन के प्रत्याशी के पक्ष में गया. प्रत्याशी के चयन में भी लापरवाही बरती गयी, जिसका खामियाजा एनडीए को भुगतना पड़ा. बीजेपी के कैडर वोट भी बंटे. विधायक रामसेवक सिंह के एंटी इन्कमबेन्सी वोट व बीजेपी के कैडर वोट निर्दलीय प्रत्याशी राजेश कुमार सिंह लेने में सफल हुए. एनडीए प्रत्याशी को मतदाताओं ने स्वार्थ पर आधारित माना, जबकि नीतीश कुमार का स्पष्ट विजन मतदाताओं को खूब भाया. सूबे में नीतीश कुमार के विकास पुरुष की छवि को भुनाने में महागंठबंधन कामयाब रहा. विधि व्यवस्था, सड़क व बिजली के क्षेत्र में नीतीश द्वारा किये गये कार्यों का प्रभाव मतदाताओं पर पड़ा. नकारात्मक चुनाव प्रचार का खामियाजा भी एनडीए को भुगतना पड़ा. एनडीए के जातीय गंठबंधन का असर हथुआ विधानसभा क्षेत्र में देखने को नहीं मिला. हथुआ के चुनाव में बाहरी बनाम घर के प्रत्याशी व अगड़े पिछड़े के नाम पर भी मतदान हुआ. टिकट बंटवारा भी एक महत्वपूर्ण फैक्टर रहा. स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा करना एवं हम पार्टी का कोई संगठन व जनाधार नहीं रहने के बावजूद प्रत्याशी उतारना एनडीए के लिए घातक सिद्ध हुआ. निवर्तमान विधायक की साफ छवि का भी मतदाताओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ा.
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