Gopal Singh Nepali: कुछ कवि केवल कविताएं नहीं लिखते, वे अपने समय की धड़कनों को शब्द देते हैं। गीतों के राजकुमार गोपाल सिंह नेपाली ऐसे ही बहुआयामी रचनाकार थे, जिनकी लेखनी में देशभक्ति, प्रकृति, प्रेम और मानवीय संवेदनाओं का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। 11 अगस्त को उनकी जयंती पर बेतिया अपनी उस साहित्यिक विरासत को याद करता है, जिसने चंपारण को हिंदी साहित्य के मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलायी।
11 अगस्त 1911 को बेतिया में जन्मे गोपाल सिंह नेपाली का मूल नाम गोपाल बहादुर सिंह था। उनकी काव्य प्रतिभा बचपन से ही दिखाई देने लगी थी। औपचारिक शिक्षा सीमित रहने के बावजूद उन्होंने हिंदी साहित्य में अपनी अलग पहचान बनायी। सहज भाषा, मधुर लय और प्रभावशाली बिंब उनकी रचनाओं की प्रमुख विशेषताएं थीं।
कलम में राष्ट्रप्रेम, प्रकृति और संवेदना
गोपाल सिंह नेपाली की रचनाओं में प्रेम और प्रकृति के साथ राष्ट्रीय चेतना भी प्रमुखता से दिखाई देती है। ‘मेरा धन है स्वाधीन कलम’ जैसी रचनाओं में उनकी स्वतंत्र चेतना और ‘यह दिया बुझे नहीं’ जैसी कविताओं में राष्ट्रप्रेम का स्वर दिखाई देता है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान उन्होंने देशभक्ति से ओतप्रोत कविताओं के माध्यम से लोगों में राष्ट्रीय भावना जगाने का काम किया।
उनका पहला काव्य-संग्रह ‘उमंग’ 1933 में प्रकाशित हुआ। इसके बाद ‘पंछी’, ‘रागिनी’, ‘पंचमी’, ‘नवीन’ और ‘हिमालय ने पुकारा’ जैसी कृतियों ने उन्हें हिंदी गीत-कविता की दुनिया में स्थापित किया।
पत्रकारिता से सिनेमा तक बनाई पहचान
नेपाली केवल कवि नहीं थे। उन्होंने पत्रकारिता में भी सक्रिय भूमिका निभायी और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के संपादन से जुड़े रहे। 1944 में मुंबई पहुंचने के बाद उन्होंने फिल्म जगत में कदम रखा। करीब 60 फिल्मों के लिए 400 से अधिक गीत लिखे और बाद में हिमालय फिल्म्स तथा नेपाली पिक्चर्स जैसी फिल्म निर्माण कंपनियों की स्थापना भी की।
17 अप्रैल 1963 को एक कवि सम्मेलन से लौटते समय भागलपुर में उनका अचानक निधन हो गया। उम्र महज 51 वर्ष रही, लेकिन साहित्य, पत्रकारिता और सिनेमा में उनका योगदान आज भी उन्हें अलग पहचान देता है।
बेतिया के लिए गोपाल सिंह नेपाली केवल एक महान कवि का नाम नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक और साहित्यिक पहचान का महत्वपूर्ण अध्याय हैं। उनकी जयंती पर उन्हें याद करना उस रचनाकार को नमन करना है, जिसकी कलम ने देश, भाषा, प्रकृति और समाज को अपना स्वर दिया।
