Sangameshwar Nath Temple Bhojpur : भोजपुर जिला मुख्यालय से 25 किमी उत्तर-पूर्व और सारण (छपरा) जिला मुख्यालय से 20 किमी दक्षिण-पूर्व दिशा में अवस्थित है गंगा और सोन का समागम स्थल.
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पूर्व में यहां गंगा, सरयू व सोन का संगम स्थान हुआ करता था, परन्तु कालांतर में भौगोलिक परिस्थितियां बदलीं और सरयू मुख्य स्थान से 10-15 किमी पश्चिम में ही रिविलगंज के पास गंगा में समाहित होने लगीं.
चूंकि सोन को नदियों में महानद का दर्जा प्राप्त है और इस हिसाब से गंगा व सोन का यह समागम एक स्त्री नदी और एक पुरुष नद के मिलन का दुनिया में एकमात्र व अपने तरह का अनूठा समागम है.
इसी समागम स्थल के मुहाने पर कोईलवर प्रखंड के बिंदगांवा में पौराणिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण संगमेश्वरनाथ का शिवलिंग स्थापित है. लोकआस्था पर विश्वास करें तो जो एक बार संगमेश्वरनाथ के शिवलिंग का दर्शन मात्र कर लेता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है.
माता सरस्वती द्वारा स्थापित है प्रतिमा
पौराणिक मान्यताओं की मानें तो संगमेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग माता सरस्वती द्वारा स्थापित की गई है. किंवदंतियों के अनुसार भगवान ब्रह्मा के यहां सभा चल रही थी, जहां अनेक ऋषि-मुनि व देवगण बारी-बारी से ऋचाओं का गान कर रहे थे, तभी अतिउत्साह में ऋषि मंदपाल अपना स्वर भंग कर बैठे.
यह देख सभा में बैठे महर्षि अत्री व माता अनुसुइया के पुत्र दुर्वाषा ऋषि क्रोधित हो उठे और ऋषि मंदपाल से झगड़ा कर बैठे. ब्रह्मा के बगल में बैठी सरस्वती यह सब देख मुस्कुरा रही थीं, जिसे देख दुर्वाषा ऋषि क्रोधित हो उन्हें श्राप दे दिया कि मृत्युलोक में जाकर एक वर्ष नारकीय जीवन व्यतीत करें, तभी श्रापमुक्त होंगी.
श्रापमुक्ति के लिए जब माता सरस्वती ने पृथ्वीलोक को प्रस्थान किया, तब वह सर्वप्रथम इसी समागम स्थल पर पहुंचीं और यहां का मनोरम दृश्य देख मंदाकिनी से पावन महानद में स्नान कर बालू से शिवलिंग बनाकर पूजा-अर्चना की. वही शिवलिंग आज संगमेश्वरनाथ के मंदिर में स्थापित है.
धर्मशास्त्रों में उल्लेख और शिवलिंग में गौरी-गणेश व शिव की झलक
माता सरस्वती द्वारा बालू से शिवलिंग निर्मित कर पूजा करने का उल्लेख बाणभट्ट रचित 'हर्षचरित' में है. वहीं अपने गुरु विश्वामित्र के साथ जनकपुर यात्रा के क्रम में भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम यहां पहुंचे थे और संगम में स्नान कर शिवलिंग की पूजा-अर्चना की थी, जिसका उल्लेख 'रामायण के बालकांड' में है.
आदिगुरु शंकराचार्य ने भी इसका उल्लेख 'सौंदर्य लहरी' पुस्तक में किया है. वहीं महाभारत के 'बलराम यात्रा' में भी इसका जिक्र आया है. संगमेश्वरनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग में अलग-अलग दिशाओं से देखने पर तीन अलग-अलग आकृतियां दिखाई देती हैं.
सामने से शिव, बाएं से गणेश व दाहिने ओर से देखने पर माता गौरी की आकृति शिवलिंग से झलकती है. साथ ही शिवलिंग के बगल में एक त्रिशूल स्थापित किया गया है जो सदैव कंपायमान रहता है.
मान्यताओं के अनुसार महादेव को प्रसन्न कर माता सरस्वती ने श्रापमुक्त होने का वरदान पाया, तब भगवान शंकर ने माता सरस्वती से कहा कि तुम्हारे हाथों से निर्मित होने के कारण मैं यहाँ गौरी-गणेश के साथ एक ही शिवलिंग में सदैव रहूंगा.
भक्तों की आस्था और प्रशासनिक अनदेखी
मंदिर के महंत संत योगानंद जी महाराज कहते हैं कि संगमेश्वरनाथ मंदिर स्थित शिवलिंग के दर्शन मात्र से ही भक्त पापमुक्त हो जाते हैं.
नागपंचमी के दिन कालसर्पयोग की पूजा करने दूर-दूर से लोग यहां आते हैं. सावन महीने में आसपास के इलाके के भक्त भी शिवलिंग के दर्शन को आते हैं. अतिप्राचीन व धार्मिक दृष्टिकोण से अति महत्वपूर्ण स्थान होने के बाद भी प्रशासन व जनप्रतिनिधियों की अनदेखी व उदासीन रवैये के कारण मंदिर की महत्ता के बारे में अधिक लोगों को जानकारी नहीं है.
स्थानीय लोगों ने इलाके को पर्यटन के इरादे से विकसित करने व धार्मिक पर्यटन सर्किट से जोड़ने की गुहार कई बार अधिकारियों से लेकर जनप्रतिनिधियों तक से लगाई, नतीजा सिफर रहा. बहरहाल, कारण जो भी हो, जानकारी के अभाव में लोग इस अतिविशिष्ट धार्मिक स्थान की जानकारी व उसकी महत्ता से वंचित हैं.
