पानीपत के 20,000 मुसलमानों की महात्मा गांधी ने बचाई जान, लेकिन उन्हें पाकिस्तान जाने से नहीं रोक सके

Story Of Partition Of India 9 : भारत का बंटवारा धर्म के आधार पर करवाया गया. जिस देश में हिंदू और मुसलमान वर्षों से साथ रह रहे थे, वहां बंटवारे की रेखा खिंची गई. इस बंटवारे ने लोगों को वहशी बना दिया. पाकिस्तान से जो रेलगाड़ियां भारत आती थीं, उनमें बर्बरता के साथ मारे गए हिंदू और सिखों की लाशें होती थीं, जिसने बदले की भावना देश में बढ़ा दी थी. ऐसे माहौल में भी गांधी जी ने प्रेम और इंसानियत की बात करके लोगों को हथियार डालने पर मजबूर किया.

Story Of Partition Of India 9 : मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी जिद पर मुसलमानों के लिए भारत से अलग पाकिस्तान की मांग तो कर ली और उस मांग को साकार रूप भी दे दिया. लेकिन उनकी इस जिद ने देश को जिस हिंसा की आग में झोंका उससे देश को निकाल पाना और लोगों के मन में जागे नफरत को मिटा पाना बहुत मुश्किल था. ऐसे में महात्मा गांधी ही वो शख्स थे जिन्होंने अपने शब्दों के अस्त्र चलाकर लोगों को संयमित करने की कोशिश की. बावजूद इसके महात्मा गांधी का वो सपना टूट गया, जिसमें पहले तो उन्होंने देश को एक रखने की कोशिश की और दूसरे कि वो भारत के अधिकांश मुसलमानों को पाकिस्तान जाने से नहीं रोक सके. उस वक्त देश में नफरत की आग बुरी तरह फैली हुई थी.

स्वतंत्रता के दिन पंडित नेहरू और पटेल के लिए पाकिस्तान से आया था ये तोहफा

भारत के विभाजन के बाद जब हिंदू भारत की ओर मुसलमान पाकिस्तान की ओर रुख कर रहे थे, तो वे खौफजदा थे. हिंसा की आग में देश चल रहा था और वे सबकुछ छोड़कर भागने को विवश थे. हजारों के परिवार वाले बिछड़ गए, तो हजारों की हत्या उनके सामने हुई. जिसको जैसे मौका मिला वह सुरक्षित स्थान की ओर भागा. अमृतसर रेलवे स्टेशन पर शरणार्थी जमा थे. रेलगाड़ी आने पर वे अपनों की तलाश करते थे. 15 अगस्त 1947 को 10 डाउन एक्सप्रेस, आठ डिब्बों की गाड़ी जब प्लेटफाॅर्म पर रूकी तो उससे चार सिपाहियों के अलावा कोई उतरा नहीं.

स्टेशन मास्टर छेनी सिंह ने देखा सभी बोगियों की खिड़कियां खुलीं थीं, लेकिन कोई वहां से झांक नहीं रहा था. सन्नाटा पसरा था. स्टेशन पर मौजूद शरणार्थी जो परिजनों की तलाश में आए थे, वे भी डरे हुए थे. स्टेशन मास्टर ने एक बोगी का दरवाजा खोला और जो देखा उसे देखकर उनका सिर चकरा गया. डिब्बे के फर्श पर इंसानी जिस्मों का ढेर पड़ा था. किसी की खोपड़ी चकनाचूर थी, तो किसी की आंत बाहर थी. कटे हुए हाथ-पैर बिखरे पड़े थे. तभी उन्हें किसी की घुटी हुई आवाज सुनाई थी. उन्होंने चिल्लाकर कहा, अमृतसर आ गया है, यहां सिर्फ हिंदू और सिख हैं बाहर आ जाओ. तभी एक औरत ने हाथ में अपने पति का कटा हुआ सिर उठाया और उसे सीने से लगाकर दहाड़े मारकर रोने लगी. कुछ बच्चे माओं के सीने से लिपटकर रो रहे थे. स्टेशन मास्टर ने एक के बाद दूसरे बोगी का रुख किया और हर बोगी की वही स्थिति थी. वह लाशों की ढेर से गुजर रहे थे. अंतिम बोगी तक पहुंचते-पहुंचते उन्हें उल्टी होने लगी और वे सोचने लगे कि इंसान इतना निर्दयी कैसे हो सकता है. उस ट्रेन के अंतिम बोगी पर सफेद अक्षरों में लिखा था-यह पटेल और नेहरू को हमारी ओर से स्वतंत्रता का उपहार है.

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जब दंगाई के सामने खाली हाथ खड़े थे महात्मा गांधी

देश में जब ऐसी आग फैली हुई थी, उस वक्त भी महात्मा गांधी एक ऐसे व्यक्ति थे, जो लोगों को नियंत्रित कर सकते थे. इस बात को लार्ड माउंटबेटन अच्छी तरह जानते थे.  महात्मा गांधी को लार्ड माउंटबेटन वन मैन आर्मी कहा करते थे. इसलिए जहां भी हिंसा की आग तेज हुई, उन्होंने महात्मा गांधी को आगे करके हिंसा करने वालों को धराशाई करने की कोशिश की और वे काफी हद तक सफल भी रहे. दिल्ली से सटे हुए पानीपत में जब हिंसा की आग बहुत तेज हो गई और मुसलमानों की हिंसा का जवाब देने के लिए हिंदू और सिख पागल हो गए, तब एक रेलवे स्टेशन पर उनका उत्पाद जारी था. स्टेशन मास्टर के सहायक को वे अपना शिकार बना चुके थे और मुसलमान बस्ती का रुख कर चुके थे. उसी वक्त रेलवे स्टेशन पर एक वैगन आकर रूकी और उससे उतरा वह शख्स जो मुसलमानों के लिए मसीहा बनकर आया था.

दंगाइयों के सामने महात्मा गांधी, ai image

जी हां, महात्मा गांधी. कलकत्ता को विनाश से बचाने के बाद वे यहां आए थे. प्लेटफाॅर्म पर उतरकर वे दंगाइयों की ओर बढ़ गए, बिना किसी को सहायता के लिए बुलाए बिना. डोमिनीक लापिएर और लैरी काॅलिंस ने अपनी किताब फ्रीडम एड नाइट में लिखा है कि वे भीड़ से कहने लगे-‘इस शहर के मुसलमानों को जाकर गले लगाइए और उनसे कहिए कि वे यहीं रहें. पाकिस्तान ना जाएं.’ गांधीजी की बात सुनकर भीड़कर में से एक ने चि़्ल्लाकर कहा-बलात्कार क्या आपकी पत्नी के साथ हुआ? क्या आपके बच्चे को उन लोगों ने बोटी-बोटी करके फेंक दिया.’ गांधी जी ने जवाब दिया- हां. बलात्कार मेरी पत्नी के साथ हुआ है, उनलोगों ने मेरे बेटे को मारा है, क्योंकि आपकी औरतें मेरे घर की लाज हैं. आपके बेटे मेरे बेटे हैं. भीड़ में जो लोग थे उनके हाथों में तलवार, कृपाण, छुरा और भाले थे और वे कइयों का खून कर आए थे. गांधी जी उनसे कहा-इन हथियारों और घृणा से कुछ नहीं होगा, इसलिए मुसलमानों को रोको.

गांधी जी ने भीड़ पर अपनी अहिंसा का अस्त्र चलाया

गांधी जी के पानीपत पहुंचने पर माहौल बदल गया. गांधी जी की प्रार्थना सभा के लिए तैयारी शुरू हो गई. मुसलमान घर से निकलकर वहां आने लगे. साथ में हिंदू और सिख भी आए. यह गांधी जी का असर था कि उनके सामने हथियार भी बेकार साबित हो जाती थी.गांधी जी ने लोगों का आह्वान किया-हम सब भारत माता की संतान हैं. घृणा और नफरत से इंसानियत को मरने ना दें. इंसानियत सबसे ऊपर है. बदले की भावना से कुछ मिलने वाला नहीं है. दूसरे की मदद करने और उसे प्रेम देने से शांति और सुकून मिलेगा. गांधी जी के भाषण का असर यह था कि हिंदू और मुसलमान मदद के लिए आगे आए. कोई भोजन तो कोई कपड़े लाने लगा. हिंसा की आग को रोककर यह महात्मा दूसरे मोर्चे की ओर निकला. लेकिन उन्होंने मुसलमानों को रोकने का जो वादा लिया था, वह पूरा नहीं हो पाया. पानीपत से 20 हजार मुसलमान, जिनकी जान गांधीजी ने बचाई थी, वे भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए. इस बात का महात्मा गांधी को बहुत दुख था. नफरत के आगे मोहब्बत हार गई थी.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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