पंबन ब्रिज और रामसेतु का है रामेश्वरम से खास नाता, क्यों सरकार ने बनाई थी रामसेतु को तोड़ने की योजना

Ram Setu: भगवान राम ने लंका से माता सीता को लाने के लिए समुद्र पर अपनी वानर सेना की मदद से पुल बनवाया था. नल और नील नाम के दो वानरों ने इस पुल के निर्माण में अहम भूमिका निभाई थी. यह पुल हिंद महासागर में बना था. सेतु समुद्रम शिपिंग नहर परियोजना को लेकर ऐसी योजना बनी थी कि रामसेतु को तोड़ा जाएगा, हालांकि सरकार ने फैसला वापस ले लिया था. आज उसी हिंद महासागर में पीएम मोदी ने नए पंबन ब्रिज का उद्‌घाटन किया, जिसकी वजह से रामसेतु एक बार फिर याद आया, कुछ लोगों को यह शंका भी हुई कि क्या पंबन ब्रिज उसी जगह पर बना है जहां रामसेतु है?

Ram Setu: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 6 अप्रैल को पंबन ब्रिज का उद्घाटन किया, जो उसी क्षेत्र में है, जहां रामसेतु है. पांबन वर्टिकल सी-लिफ्ट ब्रिज है. यह ब्रिज मंडपम रेलवे स्टेशन से रामेश्वरम द्वीप के बीच बना है. यह ब्रिज पुराने पंबन पुल की जगह लेगा. पंबन ब्रिज के उद्‌घाटन के साथ ही एक बार फिर रामसेतु की चर्चा हो रही है. हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार भगवान राम ने अपनी वानर सेना की मदद से रामेश्वरम से श्रीलंका तक पुल बनाया था. नासा द्वारा ली गई तस्वीर में यह आकृति नजर भी आती है, हालांकि वैज्ञानिक शोधों में यह दावा किया जाता है कि यह प्राकृतिक संरचना है.

कहां स्थित है पंबन ब्रिज और रामसेतु

पंबन ब्रिज और रामसेतु


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस पंबन ब्रिज का उद्‌घाटन किया है, वह भारत के भूमि क्षेत्र से रामेश्वरम द्वीप को जोड़ता है. जबकि रामसेतु रामेश्वरम द्वीप से श्रीलंका को जोड़ता है. पीएम मोदी ने नए पंबन ब्रिज (Pamban Bridge) का उद्घाटन किया है, पुराना पंबन ब्रिज अंग्रेजों ने 1914 में बनवाया था. यह ब्रिज हिंद महासागर में बना भारत का पहला समुद्री ब्रिज है. जबकि रामसेतु का निर्माण हिंदू मान्यताओं के अनुसार भगवान राम की वानर सेना ने किया था. अंग्रेज जब भारत आए, तो उन्होंने इस पुल को एडम्स ब्रिज का नाम दिया है. 1674 के डच नक्शे और 1804 के ब्रिटिश नक्शे में रामसेतु को एडम्स ब्रिज के रूप में चिह्नित किया गया है, जिसके बारे में यह कहा जाता था कि यह वह इलाका है जहां से पैदल समुद्र को पार किया जा सकता है.

पंबन ब्रिज और रामसेतु में मुख्य अंतर क्या है?


पंबन ब्रिज भारत की मुख्य जमीन से रामेश्वरम द्वीप को जोड़ता है, जबकि रामसेतु रामेश्वरम और श्रीलंका को जोड़ता है.जो लोग यह समझ रहे हैं कि पंबन ब्रिज और रामसेतु एक ही जगह पर स्थित है उनके लिए यह बात समझना बहुत जरूरी है. पंबन ब्रिज का निर्माण आधुनिक तकनीक से हुआ है, जबकि रामेसुत का निर्माण पत्थरों से किया गया था और वह पुल बहुत गहरा नहीं था. जिसकी वजह से यह समुद्री बांध की तरह है और यहां से होकर समुद्री जहाज गुजर नहीं सकते हैं, जिसकी वजह से इसे काटकर हटाने की योजना थी.

रामसेतु को लेकर क्या है विवाद?

सेतु समुद्रम शिपिंग नहर परियोजना को लेकर विवाद हुआ था जिसकी वजह से यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था. 2005 में सेतु समुद्रम प्रोजेक्ट शुरू हुआ था, इस प्रोजेक्ट के तहत रामसेतु को काटकर जहाजों के लिए सीधा रास्ता बनाने की योजना थी. जिसका धार्मिक और पर्यावरणीय दृष्टिकोण से विरोध हुआ और देश में नई बहस छिड़ गई. 2007 में केंद्र सरकार ने सुप्रीमकोर्ट में हलफनामा दायर किया, जिसमें यह कहा गया कि रामसेतु को ऐतिहासिक या धार्मिक स्थल नहीं माना जा सकता. इस हलफनामे का भारी विरोध हुआ था,तब सरकार ने हलफनामा वापस ले लिया था. यह मामला कोर्ट में चला था और 2018 में कोर्ट ने कहा कि जबतक मामला कोर्ट में है सरकार पुल को ध्वस्त नहीं कर सकती है. बाद में सरकार ने इसे संरक्षित करने की बात कही.

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By Rajneesh anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत हैं और पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों से अधिक का अनुभव रखती हैं.फिलहाल वे प्रभात खबर के ओरिजिनल, नेशनल, इंटरनेशनल और खेल कैटेगरी के लिए राइटिंग का काम करती हैं. उनकी पहचान फैक्ट बेस्ट रिपोर्टिंग, रिसर्च बेस्ड स्टोरी और एक्सप्लेनर लेखन के लिए है.

राजनीति, सामाजिक सरोकार, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों पर उनकी विशेष रुचि रही है. वैसे मुद्दे जो समाज के हाशिये पर मौजूद समुदायों और आम लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की बहस में अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं, ऐसे विषयों पर भी लेखन में रुचि रखती हैं.

रजनीश आनंद कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर अध्ययन एवं रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर काम किया. इसके अलावा सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की है.

आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है.हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों से जुड़ी चुनौतियों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं.

रजनीश आनंद झारखंड की राजधानी रांची में रहती हैं और इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक हैं. उन्होंने वर्ष 2000 में पत्रकारिता की शुरुआत झारखंड जागरण दैनिक से की. इसके बाद प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस और दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और स्वतंत्र लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य प्रकाशनों में काम करने के साथ-साथ वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं.

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