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सुरक्षा परिषद की नाकामी

Updated at : 01 Feb 2023 8:26 AM (IST)
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सुरक्षा परिषद की नाकामी

अब यह एक स्थापित तथ्य है कि युद्ध, आतंक और आर्थिक अपराध की रोकथाम में भी सुरक्षा परिषद प्रभावी सिद्ध नहीं हो सका है.

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संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष साबा कोरोसी ने कहा है कि सुरक्षा परिषद यूक्रेन संकट का समाधान कर पाने में विफल रहा है. यह इस संस्था की नाकामी को इंगित करता है. भारत यात्रा पर आये कोरोसी ने सुरक्षा परिषद में सुधार की जरूरत को भी रेखांकित किया है, जो वैश्विक स्तर पर शक्ति संतुलन में हो रहे परिवर्तन के अनुरूप हो तथा वित्तीय संकटों के समाधान में सक्षम हो.

बीते अनेक दशकों से भारत संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख घटक सुरक्षा परिषद में सुधार करने तथा स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की मांग करता रहा है. स्थायी सदस्यता का दावा भी भारत का रहा है. कई देशों ने भारत की इस मांग का समर्थन किया है. जब सुरक्षा परिषद की संरचना तैयार हुई थी तथा पांच स्थायी सदस्यों का निर्धारण हुआ था, तब वैश्विक स्थितियां अलग थीं.

सात दशकों से अधिक के समय में दुनिया का कायाकल्प हो चुका है. वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में भारत जैसे कुछ देशों की भागीदारी में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. अब यह स्वीकार नहीं किया जा सकता है कि पांच देश दो सौ देशों के लिए निर्णय करने के अधिकारी बने रहें. जैसा कि कोरोसी ने कहा है, यूक्रेन पर हमलावर राष्ट्र रूस सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य है.

यूक्रेन संकट पर अनेक बैठकें भी हुईं, पर कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका. यूक्रेन को सक्रिय सैन्य और वित्तीय सहायता दे रहे अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस भी स्थायी सदस्य हैं. अमेरिका भी हाल के दशकों में सुरक्षा परिषद की अवहेलना करते हुए अनेक एकतरफा युद्धों की घोषणा कर चुका है. सुरक्षा परिषद में चीन ने पाकिस्तान द्वारा संरक्षित आतंकवादियों और आतंकी गिरोहों को बचाने के लिए अपने वीटो अधिकार का प्रयोग कई बार किया है.

कुछ ऐसे भी अवसर आये हैं, जब अमेरिका ने पाकिस्तान का पक्ष लिया है. वास्तव में स्थायी सदस्य अपने भू-राजनीतिक हितों को साधने के लिए वीटो का इस्तेमाल करते हैं. कुछ समय पहले विदेश मंत्री एस जयशंकर ने उचित ही कहा था कि सुरक्षा परिषद की संरचना में सुधार अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तो आवश्यक है ही, ऐसा इसलिए भी किया जाना चाहिए ताकि इस संस्था की प्रासंगिकता भी बनी रहे.

इसके लिए आवश्यक है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का समुचित प्रतिनिधित्व सुरक्षा परिषद में हो. अब यह एक स्थापित तथ्य है कि युद्ध, आतंक और आर्थिक अपराध की रोकथाम में भी सुरक्षा परिषद प्रभावी सिद्ध नहीं हो सका है. खाद्य व ऊर्जा का संकट भी हमारे सामने है. जलवायु संकट गंभीर होता जा रहा है. ऐसे में सुरक्षा परिषद में तुरंत ठोस सुधार करने की दरकार है.

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