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महिला सशक्तीकरण है उज्ज्वला योजना

Updated at : 12 Aug 2021 7:51 AM (IST)
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महिला सशक्तीकरण है उज्ज्वला योजना

राज्य ने अपना ध्यान उन परिवारों पर केंद्रित किया है, जिन्हें वास्तव में राहत व मदद की दरकार है. इस योजना में लगातार नये-नये वर्गों को शामिल करना भी उल्लेखनीय प्रयास है.

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केंद्र सरकार की कल्याणकारी कार्यक्रमों में उज्ज्वला योजना एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई है. पर, इस योजना पर चर्चा करने से पहले हमें एक अन्य पहल का उल्लेख करना चाहिए. सरकार ने रसोई गैस पर मिलनेवाले अनुदान के संबंध में जो काम किया है, वह भी महत्वपूर्ण है. पहले यह अनुदान हर उपभोक्ता को दिया जाता था, भले ही उसकी आर्थिक स्थिति और आमदनी कुछ भी हो. सरकार ने सबसे पहले तो सक्षम लोगों को स्वैच्छिक रूप से अनुदान छोड़ने का आग्रह किया था.

इस आग्रह को बहुत बड़ी संख्या में लोगों ने स्वीकार भी किया. उसके बाद रसोई गैस अनुदान को उन्हीं लोगों को दिया गया, जिन्हें इसकी आवश्यकता थी. जो रसोई गैस की कीमत चुका सकते थे, उन्होंने राज्य का आसरा छोड़ा. इस पहल से सरकार की बचत हुई और उस बचत को उन लोगों को रसोई गैस देने में खर्च किया गया है, जो समाज के निर्धन और वंचित वर्गों से आते हैं. उज्ज्वला योजना के तहत गैस का कनेक्शन तो दिया ही गया है, साथ में एक भरा हुआ सिलेंडर और चूल्हा भी मुहैया कराया गया है. इस योजना में रसोई गैस का वितरण बड़े पैमाने पर किया गया.

वर्ष 2016 में जब इस योजना का शुभारंभ किया गया था, तब गरीबी रेखा से नीचे बसर करनेवाले पांच करोड़ परिवारों को रसोई गैस कनेक्शन देने का लक्ष्य रखा गया था. दो वर्ष बाद इस योजना का विस्तार हुआ और इसमें सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समुदायों को भी शामिल किया गया. इसके अलावा लाभार्थियों की लक्षित संख्या को भी पांच करोड़ से बढ़ाकर आठ करोड़ कर दिया गया था. सरकार की जानकारी के अनुसार, अगस्त, 2019 में ही इस लक्ष्य को पूरा कर लिया गया है.

यह एक बड़ी संख्या है. गरीब और वंचित परिवारों की स्थिति में इससे निश्चित रूप से सकारात्मक अंतर आया है. अब दूसरे चरण में ऐसे परिवारों को कनेक्शन देने का लक्ष्य निर्धारित किया है, जो अभी तक लाभार्थियों की श्रेणी में शामिल नहीं थे. इस प्रकार, दो हिस्सों में सरकार ने पहल की है. एक तो यह हुआ कि जिन्हें अनुदान की आवश्यकता नहीं थी, उन्हें अनुदान के लाभार्थियों की श्रेणी से हटाया गया और दूसरा यह हुआ है कि राज्य ने अपना ध्यान उन परिवारों पर केंद्रित किया है, जिन्हें वास्तव में राहत व मदद की दरकार है. इस योजना में लगातार नये-नये वर्गों को शामिल करना भी उल्लेखनीय प्रयास है.

इस योजना के प्रभाव को राजनीतिक रूप से भी देखा जाना चाहिए. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए समर्थन इस योजना की वजह से बढ़ा था. यह समर्थन विशेष रूप से गरीब तबके की महिलाओं में स्पष्ट रूप से देखा गया था. इसका मतलब यह है कि इस योजना का लाभ लोगों तक पहुंचा है. ग्रामीण परिवार की स्त्रियों को खाना बनाने के लिए न केवल लकड़ी आदि पर निर्भर रहना पड़ता है, बल्कि उन्हें ईंधन जुटाना भी पड़ता है.

खाना बनाने समय धुआं वगैरह से उनके स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव होता है. इतना ही नहीं, इससे बच्चे भी प्रभावित होते हैं. निश्चित रूप से ऐसी महिलाओं को रसोई गैस की उपलब्धता से बड़ी राहत मिली है. इसी कारण उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार का अनुमोदन भी किया. पर, हमें संबंधित समस्याओं का भी संज्ञान लेना चाहिए. कोरोना महामारी के लंबे दौर में स्थितियों में बहुत तरह के बदलाव हुए हैं. लॉकडाउन में लाभार्थियों को सिलेंडर मिल सका या नहीं, इस बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है. इस योजना में मिले सिलेंडर को फिर से भरवाने में कितने परिवार सक्षम हो पा रहे हैं, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.

जिन कामगारों को महामारी से जुड़ी पाबंदियों के कारण पलायन करना पड़ा था, उन्हें सिलेंडर नहीं मिल सका था, ये तो स्पष्ट है. कालाबाजारी से मिलनेवाले छोटे-छोटे सिलेंडरों को भराकर ऐसे बहुत से परिवारों ने अपना काम निकाला था. यह सिलसिला अब भी जारी है. इस योजना के दायरे में उनके न होने से या समुचित व्यवस्था नहीं होने से उन्हें मुश्किल हुई.

उम्मीद है कि दूसरे चरण में उनका ध्यान रखा जायेगा. पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें भी लगातार बढ़ी हैं. जिन्हें अब तक रसोई गैस का कनेक्शन दिया गया है और जिन्हें अब शामिल किया जा रहा है, वे निश्चित ही संतुष्ट होंगे कि उनकी ओर सरकार ध्यान दे रही है. परिवारों की महिलाओं और बच्चों को भी राहत मिल रही है, लेकिन अगर उपलब्धता की सहूलियत नहीं होगी, तो सामाजिक सशक्तीकरण की कोशिशों का वांछित लाभ नहीं मिल पायेगा और योजना का उद्देश्य ठीक से पूरा नहीं होगा.

ऐसे में यह सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण है कि सिलेंडर की आपूर्ति होती रहे और उसकी कीमत परिवारों की क्षमता के भीतर हो. यह भी देखा जाना चाहिए कि पलायन करनेवाले कामगार परिवारों को भी उज्ज्वला योजना का लाभ मिले. शहरों और कस्बों में लकड़ी और अन्य ईंधन जुटा पाना बहुत मुश्किल है.

यह ठीक है कि नाम-पता से जुड़े प्रमाणपत्रों के बारे में दूसरे चरण में छूट दी गयी है और इसका फायदा भी होगा, लेकिन फिर भी परिचय पत्र आदि का मसला आसान नहीं होता. इसलिए यह जरूरी है कि लाभार्थी को लाभ मिले और आसानी से मिले. अधिक से अधिक परिवारों को आगे इस योजना में शामिल किया जाए, इस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए.

(बातचीत पर आधारित)

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मनीषा प्रियम

लेखक के बारे में

By मनीषा प्रियम

मनीषा प्रियम is a contributor at Prabhat Khabar.

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