ब्रिक्स सम्मेलन और भारत

Updated at : 14 Oct 2016 12:15 AM (IST)
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ब्रिक्स सम्मेलन और भारत

गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन तेजी से बदलते क्षेत्रीय और वैश्विक समीकरणों की पृष्ठभूमि में आयोजित होने जा रहा है. पाकिस्तान के साथ संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं और चीन का झुकाव पाकिस्तान की ओर है. चीन न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत के प्रवेश और सुरक्षा परिषद् में आतंकी सरगना अजहर मसूद पर पाबंदी लगाने में अवरोध […]

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गोवा में ब्रिक्स सम्मेलन तेजी से बदलते क्षेत्रीय और वैश्विक समीकरणों की पृष्ठभूमि में आयोजित होने जा रहा है. पाकिस्तान के साथ संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं और चीन का झुकाव पाकिस्तान की ओर है.
चीन न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप में भारत के प्रवेश और सुरक्षा परिषद् में आतंकी सरगना अजहर मसूद पर पाबंदी लगाने में अवरोध खड़ा करने के अलावा पाकिस्तान के साथ आर्थिक परियोजनाओं को भी आगे बढ़ा रहा है. आतंक-विरोधी संकल्पों और चीन के व्यवहार के बीच विरोधाभास स्पष्ट हैं. उधर, रूस ने भारत से बेहतर द्विपक्षीय संबंधों के बावजूद हाल में पाकिस्तान के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास में हिस्सा लिया है और अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से तनाव बढ़ने के कारण उसकी चीन से निकटता भी बढ़ी है. भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार का संतुलन भी असाधारण रूप से चीन के पक्ष में झुकता जा रहा है, जबकि भारत में चीनी निवेश में खास वृद्धि नहीं हुई है. ऐसे में एशिया के इस हिस्से में स्थिरता और विकास के लिए समुचित माहौल बनाने की दिशा में ठोस कूटनीतिक प्रयासों की जरूरत है.
चीन पर सकारात्मक दबाव बनाने और रूस के साथ संबंधों को मजबूती देने की चुनौती भारत के सामने है. पाकिस्तान द्वारा चीन, ईरान तथा पड़ोसी मध्य एशियाई देशों के साथ नया मंच बनाने के इरादे पर भी सवाल लाजिमी है, भले ही ऐसा समूह बनाने की सोच बेमतलब है. उम्मीद है कि ब्रिक्स की बहुपक्षीय बैठकों तथा चीन और रूस के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत अपनी चिंताएं सामने रखेगा. पिछले कुछ सालों से भारत और अमेरिका के व्यापारिक और राजनीतिक संबंधों का दायरा रक्षा क्षेत्र में सहयोग के स्तर तक बढ़ा है. अर्थव्यवस्था की मजबूती तथा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़ते प्रभाव जैसे कारकों से भी भारत का आत्मविश्वास सघन हुआ है.
प्रधानमंत्री मोदी ने चीनी और रूसी राष्ट्रपतियों से अपनी मुलाकातों में आर्थिक विकास के साथ आतंकवाद जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर पूरा सहयोग का भरोसा दिया है. इसके बावजूद दोनों देशों, खासकर चीन, के रवैये से भारत को निश्चित रूप से निराशा हुई है.
ऐसी स्थिति में एक प्रभावशाली अंतरराष्ट्रीय समूह के रूप में स्थापित होने की ब्रिक्स की संभावनाओं को भी नुकसान पहुंच सकता है. आशा की जानी चाहिए कि चीन और रूस विभिन्न भू-राजनीतिक आयामों और आतंक की भयावहता पर गंभीरता से सोच-विचार कर भारतीय चिंताओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनायेंगे, ताकि ब्रिक्स सामूहिक समृद्धि की आकांक्षाओं को पूरा करने की ओर अग्रसर हो.
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