हाथ उठाएं और दुआ करें

Updated at : 01 Jan 2016 6:09 AM (IST)
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हाथ उठाएं और दुआ करें

नासिरुद्दीन वरिष्ठ पत्रकार नये साल का पहला दिन. गुनगुनी धूप. मोबाइल पर बधाइयों के संदेश. कुछ कसमें, कुछ वादे. कुछ खुद से, कुछ दूसरों से. कुछ नया करने का वादा. पर नया क्या है? कुछ अलग क्या है? अलग और नया तब ही होगा, जब आसपास भी चीजें बदलेंगी. इसलिए बेहतर होगा कि नया साल […]

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नासिरुद्दीन

वरिष्ठ पत्रकार

नये साल का पहला दिन. गुनगुनी धूप. मोबाइल पर बधाइयों के संदेश. कुछ कसमें, कुछ वादे. कुछ खुद से, कुछ दूसरों से. कुछ नया करने का वादा. पर नया क्या है? कुछ अलग क्या है? अलग और नया तब ही होगा, जब आसपास भी चीजें बदलेंगी. इसलिए बेहतर होगा कि नया साल नयी उम्मीदों के नाम हो. आइए दुआ करें…

इस साल मौसम की मार खेती पर न पड़े. किसानों को फसल का वाजिब दाम मिले. किसानों को कर्ज की वजह से जान न देनी पड़े.

आदिवासियों को जमीन से बेदखल न किया जाये. आदिवासी लड़कियों को बहला कर शहरों में न भेजा जाये. आदिवासियों के लिए बने सूबों में उनकी तरक्की दिखे. झारखंड के जामताड़ा, जादूगोड़ा इलाकों में भी रांची जैसी सभी सहूलियत मिले.

खान-पान के नाम पर किसी अखलाक की हत्या न हो. किसी को उसके विचार के लिए पाकिस्तान भेजने की धमकी न दी जाये. अपने दिल और दिमाग की बात कहने में किसी को डर न लगे. अलग राय का इजहार करने या असहमत होने में कोई दस बार नहीं सोचे. किसी को अलग राय रखने की वजह से राष्ट्रद्रोही न माना जाये. असहमति की वजह से कोई किसी की जान न ले.

किसी डाभोलकर, पानसारे और कलबुर्गी को जान न गंवानी पड़े. अब ऐसे हालात न पैदा हों, ताकि किसी साहित्यकार-कलाकार-फिल्मकार को विरोध जताने के लिए अपने पुरस्कार-सम्मान लौटाने पड़े.

धर्म के नाम पर लड़ाई न हो. मंदिर-मसजिद लड़ाई की वजह न बनें. कोई मुजफ्फरनगर या अटाली न हो. मजहब के नाम पर लड़ानेवाले छुट्टा न घूम पाएं. किसी का विरोध या समर्थन मजहब या जाति देख कर न हो. किसी के निजी विचार को उसके धर्म से जोड़ कर न देखा जाये.

मुल्क के अल्पसंख्यकों पर डर का साया न रहे. बिना किसी डर के त्योहार मनाये जायें. बिना किसी खौफ के नौजवान लड़के-लड़की अपनी मर्जी से अपना पार्टनर चुनें. मोहब्बत करना जुर्म न हो. मोहब्बत करने की वजह से किसी लड़के-लड़की की हत्या न हो.

कोई भ्रूण की लिंग जांच नहीं कराये.

भ्रूण का गर्भपात न हो. बेटियों के साथ भेदभाव खत्म हो. दहेज के नाम पर कोई लड़की तंग न की जाये. किसी लड़की की जान न ली जाये. लड़कियों को बेखौफ जिंदगी मिले. देश में कहीं भी निर्भया जैसी घटना न हो. लड़कियों-महिलाओं को घर व बाहर, सम्मान व बराबरी मिले. बराबरी की मुहिम में मर्द भी भागीदार बनें.

कोई टोला इसलिए न जला दिया जाये कि वहां रहनेवाले दलित हैं. किसी के हाथ का खाना इसलिए खाने से न मना कर दिया जाये, क्योंकि बनानेवाली दलित है.

ऊंच-नीच, अमीर-गरीब की खाई पाटी जाये. सबको बेहतर इलाज मिले. हर लड़के-लड़‍की के हाथ में किताब हो.हर हाथ में रोजगार हो. हर बुजुर्ग के पास छत हो. मुल्क में ही जंग-जंग का शोर न हो. विकास मॉडल में आम जनता की फिक्र हो. संविधान के वादों को हम कभी न भूलें. लिंग, जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा आदि की बुनियाद पर भेदभाव न हो. हमें हमेशा याद रहे, ‘भारत विभिन्नताओं में एकता वाला देश है’. गांधीजी का यह प्रिय भजन कभी हमारे जेहन से न निकले, ‘वैष्णव जन तो तेने कहिये/ जे पीड़ पराई जाणे रे…’

आमीन! आमीन!

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