पानी की वैश्विक राजनीति

Published at :26 May 2015 5:07 AM (IST)
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पानी की वैश्विक राजनीति

डॉ भरत झुनझुनवाला अर्थशास्त्री पानी की अधिक खपत करनेवाली फसलों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. गुलबर्गा में रागी, जोधपुर में बाजरा और उत्तर प्रदेश में चावल और गेहूं की खेती करने से हमारे जल संसाधन सुरक्षित रहेंगे और देश की खाद्य सुरक्षा स्थापित होगी. असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था […]

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डॉ भरत झुनझुनवाला
अर्थशास्त्री
पानी की अधिक खपत करनेवाली फसलों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. गुलबर्गा में रागी, जोधपुर में बाजरा और उत्तर प्रदेश में चावल और गेहूं की खेती करने से हमारे जल संसाधन सुरक्षित रहेंगे और देश की खाद्य सुरक्षा स्थापित होगी.
असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई ने प्रधानमंत्री से आग्रह किया था कि चीन यात्र के दौरान ब्रह्म पुत्र नदी के पानी के बंटवारे के मुद्दे को हल करें. मीडिया रपटों की मानें, तो इस गंभीर मुद्दे पर कोई प्रगति नहीं हुई है. यह हमारे लिए खतरे की घंटी है, चूंकि संपूर्ण विश्व में पानी के मुद्दे पर टकराव बढ़ रहे हैं.
इसलामिक स्टेट द्वारा टिगरिस तथा यूफरेटिस नदियों पर कब्जा करने का प्रयास हो रहा है. ये नदियां इराक की जीवनधारा हैं. साठ के दशक में इजराइल ने छह दिन का युद्ध छेड़ा था, जिसका उद्देश्य जार्डन नदी के पानी पर अधिकार जमाना था.
हम भी पीछे नही हैं. इन विषयों के जानकार ब्रह्म चेलानी के अनुसार, पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के मुद्दे को लगातार उठाने का उद्देश्य उस राज्य से बहनेवाली नदियों पर वर्चस्व स्थापित करना है. बांग्लादेश के साथ तीस्ता के पानी के बंटवारे का विवाद सुलझ नहीं सका है. चीन द्वारा ब्रह्म पुत्र पर बांध बनाने से भारत चिंतित है. अरुणाचल पर चीन की पैनी नजर रहने का एक कारण उस राज्य के प्रचुर जल संसाधन है. नेपाल द्वारा बांधों से पानी छोड़े जाने को बिहार की बाढ़ का कारण माना जाता है. इन विवादों को शीघ्र निबटाने में ही हमारी जीत है.
पानी के बंटवारे में एक देश को लाभ और दूसरे का नुकसान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. गंगा के पानी का अधिक हिस्सा भारत द्वारा हूगली में मोड़ने पर बांग्लादेश को पानी कम मिलेगा. फरक्का बराज को ही लें. फरक्का के तालाब में तलछट जम जाती है. ऊपरी सतह से पानी निकाल कर हूगली को दिया जाता है. नीचे बैठी तलछट को फ्लश करके पदमा में बहा दिया जाता है, जो कि बांग्लादेश को चली जाती है.
परिणाम कि पानी का बंटवारा तो आधा-आधा होता है, परंतु अनुमानित 90 प्रतिशत तलछट बांग्लादेश को जाती है. बांग्लादेश में अधिक मात्र में तलछट पहुंचने से पदमा का पाट ऊंचा होता जा रहा है और बाढ़ का प्रकोप बढ़ रहा है. गंगासागर द्वीप छोटा होता जा रहा है. लोहाचारा और गोडामारा द्वीपों से लगभग एक लाख लोगों को विस्थापित होना पड़ा है. इस दोहरी समस्या का हल है कि फरक्का के आकार में बदलाव किया जाये, जिससे पानी के साथ-साथ तलछट का भी बराबर बंटवारा हो.
नेपाल द्वारा नदियों पर बड़े बांध बना कर पानी को रोकने का प्रयास किया जा रहा है. लेकिन कभी कभी इनसे ज्यादा मात्र में पानी छोड़ दिया जाता है, जिससे बिहार में बाढ़ का प्रकोप बढ़ जाता है.
इस समस्या का समाधान भूमि के गर्भ में उपलब्ध एक्वीफरों के माध्यम से निकल सकता है. सेंट्रल ग्राउंड वाटर बोर्ड के अनुसार, उत्तर प्रदेश के एक्वीफरों की भंडारण क्षमता 76 बिलियन क्यूबिक मीटर है, जो टिहरी बांध से 25 गुना ज्यादा है. इसी प्रकार के एक्वीफर नेपाल में भी हैं.
हमें साझा नीति बना कर नेपाल को प्रेरित करना चाहिए कि पानी का भंडारण एक्वीफरों में करे. तालाबों से वाष्पीकरण से 10-20 फीसदी पानी का नुकसान हो जाता है. यह पानी बच जायेगा. बड़े बांधों में निहित विस्थापन तथा भूकंप से भी छुटकारा मिल जायेगा. एक्कीफरों से अधिक मात्र में पानी नही छोड़ा जा सकेगा और हमें बाढ़ से राहत मिलेगी.
सिंधु, ब्रह्म पुत्र, तीस्ता तथा गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर चीन, पाकिस्तान, नेपाल तथा बांग्लादेश के साथ हमारा तनाव बना रहता है. यहां एक देश की हानि दूसरे देश का लाभ है, जैसे तीस्ता में अधिक पानी छोड़ने से भारत को हानि और बांग्लादेश को लाभ है. इसका हल है कि लाभ पानेवाला देश हानि ङोलने वाले देश को मुआवजा दे. दुर्भाग्य है कि इस कार्य में सरकार की तनिक भी रुचि नहीं है.
तीन वर्ष पूर्व नेशनल ग्रीन ट्रीब्यूनल ने पर्यावरण मंत्रलय को परियोजनाओं के लाभ-हानि का आकलन करने के नियमों को स्पष्ट करने को कहा था. पर्यावरण मंत्रलय ने इंडियन इंस्टीट्यूट आफ फॉरेस्ट मैनेजमेंट को यह जिम्मेवारी सौंपी थी. इंस्टीट्यूट द्वारा रपट सौंपे डेढ़ वर्ष हो गये, परंतु मंत्रलय ने इस गंभीर मुद्दे को ठंडे बस्ते में डाल दिया है.
जनसंख्या के साथ-साथ पानी की मांग भी बढ़ेगी. इसे पूरा करने के लिए पानी की बचत करनी होगी.भारत में लगभग 88 प्रतिशत पानी का उपयोग खेती के लिए किया जाता है. कर्नाटक के गुलबर्गा में अंगूर, राजस्थान के जोधपुर में लाल मिर्च तथा उत्तर प्रदेश में गन्ने की फसल के लिए भारी मात्र में पानी का उपयोग किया जा रहा है, जिससे भूमिगत पानी का जलस्तर कम हो रहा है. विलासिता की इन फसलों को उगाने के लिए हम अपने भूमिगत पानी के भंडार को समाप्त कर रहे हैं.
सरकार को चाहिए कि हर जिले की ‘फसल ऑडिट’ कराये. पानी की अधिक खपत करनेवाली फसलों पर प्रतिबंध लगा देना चाहिए. गुलबर्गा में रागी, जोधपुर में बाजरा और उत्तर प्रदेश में चावल और गेहूं की खेती करने से हमारे जल संसाधन सुरक्षित रहेंगे और देश की खाद्य सुरक्षा स्थापित होगी. रागी और बाजरा खाने से जनता का स्वास्थ भी अच्छा होगा.
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