कई जरूरी मुद्दों का जिक्र तक नहीं हुआ!

By Prabhat Khabar Digital Desk
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अगर विकास के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों-संपदाओं को देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने का प्रयास चलेगा, तो डर है कि प्रधानमंत्री का नया नारा ‘कम एंड मेक इन इंडिया’ कहीं ‘कम एंड लूट इंडिया’ न बन जाये!

भाजपा के समर्थक ही नहीं, अनेक गैर-भाजपाई लोग भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के भाषण की तारीफ करते मिल रहे हैं. उनमें ज्यादातर इस बात की तारीफ कर रहे हैं कि उनका भाषण लिखा हुआ नहीं था, उसमें अद्भुत जोश था, जमीनी-अनुभवों की रोशनी थी, बड़े वायदे नहीं किये पर जो बातें कहीं, वे बहुत सारगर्भित थीं. बुलेट-प्रूफ कांच की दीवार के बगैर भाषण देने के उनके बेखौफ अंदाज के प्रशंसक भी कुछ कम नहीं हैं. सिर पर रंगीन साफा बांध कर लाल किले की प्राचीर पर पहुंचे प्रधानमंत्री के बोलने का अंदाज इसलिए भी ज्यादा आकर्षक लगा, क्योंकि बीते दस वर्षो के दौरान लोग इस मौके पर प्रधानमंत्री का उबाऊ भाषण सुनने के अभ्यस्त हो गये थे. एक ऐसे भलेमानुष प्रधानमंत्री का, जो लोगों के अभिवादन के दौरान मंच से अपने हाथों को भी ‘नेता वाले अंदाज’ में नहीं हिला पाता था. लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण की गुणवत्ता के लिए क्या ये चीजें ही पर्याप्त हैं, खास तौर पर जब कोई प्रधानमंत्री पहली बार लाल किले की प्राचीर से भाषण दे रहा हो?

आजादी के ऐलान के तुरंत बाद देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के पहले ऐतिहासिक संबोधन में राष्ट्र-निर्माण का जो ‘विजन’ दिखा था, जो व्यापकता और गहराई थी, उसकी तुलना किसी अन्य प्रधानमंत्री के संबोधन से करने का कोई औचित्य नहीं है. लेकिन, हर नये प्रधानमंत्री से इस मौके पर देश की जनता को समाज, विकास और देश-दुनिया के बारे में नये दृष्टिकोण या ‘विजन’ से साक्षात्कार का मौका मिलता है. मुङो लगता है, प्रधानमंत्री मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन को इस नजरिये से देखा जाना चाहिए. उन्होंने राष्ट्रीय विकास की दिशा संबंधी अपने ‘विजन’ का संकेत देते हुए जो सबसे बड़ी घोषणा की, वह थी योजना आयोग के खात्मे की. उन्होंने योजना, निर्माण या विकास के लिए किसी नयी संस्था या संरचना का ऐलान नहीं किया, सिर्फ योजना आयोग को भंग किया, जिसकी स्थापना नेहरू के राष्ट्र-निर्माण और योजनागत विकास के ‘विजन’ की रोशनी में की गयी थी. क्या यह बेहतर नहीं होता कि स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री एक नकारात्मक ऐलान के बजाय एक सकारात्मक ऐलान करते हुए देश को बताते कि अब विकास की रणनीति और योजना-निर्धारण की क्या संरचनात्मक प्रक्रिया क्या होगी, उसके लिए कैसा ढांचा होगा? लेकिन, उन्होंने सिर्फ यह संकेत दिया कि योजना आयोग के बदले अब योजना और विकास के मामले में सलाह देने के लिए नयी प्रक्रिया अपनायी जायेगी. बदलते वैश्विक परिवेश, आंतरिक जरूरतें और विकास के पीपीपी-मॉडल का हवाला देते हुए उन्होंने इसके संकेत दिये.

यहां एक सवाल उठना लाजिमी है, जिसे देश के गणमान्य आर्थिक विशेषज्ञ इन दिनों उठाने में बड़ा संकोच दिखा रहे हैं, वह यह कि क्या नयी सरकार योजना आयोग के ध्वंसावशेषों पर अब कॉरपोरेट-घरानों के नुमाइंदों और कुछ पसंदीदा अर्थशास्त्रियों की सदस्यता वाले किसी नये थिंक टैंक को स्थापित करने जा रही है? यह सवाल इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि पिछले पौने तीन महीनों के दौरान नयी सरकार ने आर्थिक मामलों और सामाजिक-सांस्कृतिक विकास से संबद्ध मंत्रलयों में कामकाज की दिशा पर ठोस सलाह देने के लिए प्रबंधन का नया रास्ता अपनाया है. ऐसे कई मंत्रलयों या संस्थानों में कॉरपोरेट घरानों से संबद्ध या उनके प्रभाव वाले कुछ नामीगिरामी विशेषज्ञों को सलाहकार या ओएसडी नियुक्त किया गया है. इनमें कुछेक ‘विशेषज्ञ’ संघ-परिवार से भी संबद्ध रहे हैं. भाजपा-नीत सरकार अगर संघ से संबद्ध किसी व्यक्ति को किसी सरकारी महकमे में सलाहकार या विशेषज्ञ के तौर पर रखती है, तो इसमें किसी को न तो आश्चर्य होना चाहिए न ऐतराज ही. पर योजना आयोग जैसी संस्था के बदले गठित की जानेवाली संस्था में अगर कॉरपोरेट घरानों और संघ-समर्थित विशेषज्ञों की असरदार मौजूदगी रहेगी, तो सवाल उठना स्वाभाविक होगा. केंद्र-राज्य रिश्तों के वित्तीय और योजनागत पहलू आज सबसे अहम बन कर उभरे हैं. ऐसे में नयी संस्था क्या केंद्र की सोच से असहमत राज्यों के साथ न्याय कर पायेगी? क्या कॉरपोरेट राज्यों को सीधे निर्देशित करेगा?

प्रधानमंत्री ने हाल के कुछ महीनों के दौरान देश में तेजी से बढ़ी सांप्रदायिकता, खासतौर पर पश्चिमी यूपी के दंगों सहित कई राज्यों में हुई हिंसक झड़पों, उसके कारणों और जिम्मेवार लोगों पर कोई ठोस टिप्पणी नहीं की है. पर यह बात जोर देकर कही है कि अगले दस वर्षो के लिए जातिवाद-संप्रदायवाद जैसे जहर का स्थगन जरूरी है. सवाल है कि सिर्फ दस साल के लिए स्थगन ही क्यों? इनका समूल नाश क्यों नहीं?

‘सांसद आदर्श ग्राम योजना’ किसी भी पहलू से विकास का नया विजन नहीं पेश करती. यह सांसद या विधायक निधि जैसी व्यवस्था का नुमाइशी विस्तार मात्र है. विकास का फोकस सिर्फ एक गांव पर क्यों? संविधान ने सांसदों को देश के लिए उपयोगी नीति व नियम-कानून बनाने की जिम्मेवारी दी है, गली-कूचे, सड़क, स्कूल, शौचालय या तालाब-पोखरे बनाने के लिए शासन के पास पर्याप्त और कारगर प्रशासनिक ढांचा पहले से मौजूद है. अगर यह ढांचा ठीक से काम नहीं कर रहा है, तो यह सरकार और सत्ता के संचालकों की विफलता है. इस तरह की विफलताओं का जवाब जिम्मेवारी का स्थानांतरण नहीं हो सकता.

प्रधानमंत्री के संबोधन में उन मुद्दों को उतनी तवज्जो नहीं मिली, जिनका चुनावों के दौरान उन्होंने उल्लेख किया. कालाधन की वापसी के लिए ठोस कदम, बड़े स्तर पर रोजगार-सृजन, महंगाई और भ्रष्टाचार पर निर्णायक अंकुश जैसे वायदों पर सरकार ने अब तक क्या किया और आगे क्या रणनीति है, संबोधन से लगभग गायब थे. शिक्षा और सबके लिए चिकित्सा-सेवा सहित ऐसे तमाम वायदों को पूरा करने के लिए सरकार ने अब तक क्या कुछ किया? क्या विदेशी बीमा कंपिनयां देश के आम लोगों को चिकित्सा-सुविधा का कवच देंगी? बीमा क्षेत्र को देशी-विदेशी कंपनियों के लिए पूरी तरह खुला छोड़ने, सार्वजनिक क्षेत्र के बड़े उपक्रमों, राष्ट्रीयकृत बैंकों, खदानों और रेलवे तक में भी बड़े पैमाने पर निजीकरण-विनिवेशीकरण की गति तेज करने के लिए सरकार जिस तरह सचेष्ट है, वैसा जोर आम जनता के जरूरी कार्यक्रमों पर नहीं है. अगर विकास के नाम पर देश के प्राकृतिक संसाधनों-संपदाओं को देशी-विदेशी कंपनियों के हवाले करने का प्रयास चलेगा, तो डर है कि प्रधानमंत्री का नया नारा ‘कम एंड मेक इन इंडिया’ कहीं ‘कम एंड लूट इंडिया’ न बन जाये! लातिन अमेरिका व अफ्रीका के कई देशों से सबक लिया जाना चाहिए. विदेशी पूंजी जरूरी है, पर सतर्कता के साथ.

उर्मिलेश

वरिष्ठ पत्रकार

urmilesh218@gmail.com

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