‘विकास-सत्ता’ के आगे बलहीन मतदाता

Updated at : 02 Jun 2014 5:53 AM (IST)
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‘विकास-सत्ता’ के आगे बलहीन मतदाता

।। चंदन श्रीवास्तव।। (एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस) कौन कहता है कि भाजपा की चुनावी ‘सुनामी’ के बीच विपक्ष बचा ही नहीं? बचा है न! सबसे ज्यादा तमिलनाडु में बचा है, बहुत कुछ केरल और आंध्र प्रदेश में भी बचा है. ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में तो बचा ही है. तो क्या मान लिया जाये कि सोलहवीं […]

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।। चंदन श्रीवास्तव।।

(एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस)

कौन कहता है कि भाजपा की चुनावी ‘सुनामी’ के बीच विपक्ष बचा ही नहीं? बचा है न! सबसे ज्यादा तमिलनाडु में बचा है, बहुत कुछ केरल और आंध्र प्रदेश में भी बचा है. ओड़िशा और पश्चिम बंगाल में तो बचा ही है. तो क्या मान लिया जाये कि सोलहवीं लोकसभा में विपक्ष संख्या-बल के मामले में भले कम हो, लेकिन देश का लोकतंत्र विपक्ष-विहीन नहीं हुआ है? नहीं, अगर आप लोकतंत्र की सेहत के लिए विपक्ष की जीवंत मौजूदगी को अनिवार्य मानते हैं, तो विपक्ष की ताकत को संख्या-बल से मत मापिये. संख्या कम-बेश होते रहती है. सबसे जरूरी है यह देखना कि विपक्ष के पास अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने के लिए सत्ता-पक्ष के बरक्स कोई वैकल्पिक विचार है या नहीं और अगर है, तो वह नागरिकों को स्वीकार है या नहीं. सोलहवीं लोकसभा का संकट यह नहीं है कि प्रचंड बहुमत की आंधी में विपक्ष की बगिया एक तरह से उजाड़ नजर आ रही है. उसका असल संकट यह है कि विपक्ष के पास अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने के लिए कोई वैकल्पिक विचार नहीं बचा है.

यह एक उलटबांसी है कि सोलहवीं लोकसभा के पास विपक्ष तो है, लेकिन इस विपक्ष के पास अपनी मौजूदगी को दर्ज कराने के लिए कोई विचार नहीं है. इस बात को समझने के लिए जरा पीछे लौटते हैं, चुनाव-प्रचार के सरगर्म दिनों की तरफ. तब राजनेताओं का मुंह बाढ़ में उफनाती नदी की तरह खुला था और वे अपने शब्द-प्रवाह के जोर से लोगों को लुभाने में नहीं, बल्कि डराने में लगे थे. चुनाव-प्रचार का रंगमंच सजा था, राजनेताओं के रूप में पात्रों का आना-जाना हो रहा था. दृश्य बदल जाता था, लेकिन संवाद एक ही रहता था- वह संवाद जिसे ‘विकास’ कहा जाता है. और, इस संवाद की अदायगी भी एक ही तरीके से हो रही थी, तरीका था आवेश का, क्रोध की भाव-भंगिमा का कि ‘तुम मुङो वोट दो, मैं तुम्हें विकास दूंगा और नहीं दोगे तो सबक सिखाऊंगा.’

अगर बात अटपटी लग रही हो, तो बांग्ला फिल्मों की अभिनेत्री शताब्दी रॉय के चुनाव-प्रचार को याद कीजिए. शताब्दी राय तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर वीरभूम सीट से उम्मीदवार थीं. चुनाव-प्रचार के दौरान मोहम्मद बाजार में एक चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मतदाताओं से कहा था, ‘आप लोग अगर चाहते हैं कि आपका काम पहले हो, तो मुङो वोट दीजिए. जिन-जिन इलाकों से मुङो अधिक वोट मिलेगा, वहां का काम पहले होगा. जहां से वोट नहीं मिलेगा या कम मिलेगा, वहां का काम बाद में. जो हमारे साथ खड़ा रहेगा, उसका उपकार पहले होगा, जो नहीं रहेगा, उसका उपकार बाद में.’ जाहिर है, एक उम्मीदवार विकास करने की अपनी क्षमता और सदेच्छा का इजहार तनिक अटपटे शब्दों में कर रहा था. शताब्दी रॉय का बयान मीडिया में आते ही विवाद का सबब बना. विरोधी दलों ने इसे मतदाताओं को धमकाने का मामला मान कर तृणमूल पर हमला शुरू कर दिया. अंतत: चुनाव-आयोग ने शताब्दी रॉय को कारण बताओ नोटिस जारी किया. अब जबकि शताब्दी रॉय तकरीबन साढ़े चार लाख वोट हासिल कर संसद पहुंच चुकी हैं, तो उनके बारे में यह आशंका बची रहेगी कि उनके विपक्ष में खड़े उम्मीदवारों को करीब पौने आठ लाख वोट डालनेवाले मतदाताओं के साथ उनका व्यवहार आनेवाले दिनों में क्या वैसा ही रहनेवाला है, जिसका उन्होंने चुनावी सभा में संकेत किया था?

बात सिर्फ तृणमूल कांग्रेस या शताब्दी रॉय भर तक सीमित नहीं है. 2014 के जनादेश के बाद यूपी की राजनीति में परिवार-जन तक सिमट कर रह जानेवाले सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव भी मतदाताओं के बीच ‘विकास’ नामक संवाद की अदायगी क्रोध की भंगिमा में कर रहे थे. यूपी की सरकार ने चुनाव की आचार-संहिता लागू होने से पहले प्राथमिक विद्यालयों में अस्थायी रूप से शिक्षण कार्य करनेवाले शिक्षा मित्रों को नियमित करने की घोषणा की थी. इसे केंद्र में रख कर मुलायम सिंह ने चुनाव-प्रचार के दौरान कहा कि यदि शिक्षा मित्र उनकी पार्टी को वोट नहीं करते, तो नियमित होने की बात को भूल जायें. चुनाव आयोग ने इस बयान को संज्ञान में लिया और शिक्षा मित्रों को धमकाने के आरोप में मुलायम सिंह को नोटिस जारी कर दिया.

विकास नामक संवाद की अदायगी में शताब्दी रॉय और मुलायम सिंह यादव द्वारा अपनायी गयी क्रोध की भंगिमा भारतीय लोकतंत्र में व्याप्त एक बड़े रोग का लक्षण भर है. रोग है पक्ष-विपक्ष की राजनीति में व्याप्त यह सर्वसम्मति, कि विकास अपरिहार्य है. रोग है, विकास की अपरिहार्यता के बीच इस शब्द की अर्थवत्ता पर होनेवाली बहस का अभाव, इस बहस से निकलनेवाले किसी वैकल्पिक विचार का अभाव. विकास एकबारगी अविवादित राजधर्म बन गया है. नेता चाहे सत्तापक्ष के हों या विपक्ष के, इस राजधर्म को दंड और पुरस्कार के उसी तेवर के साथ निभाते नजर आ रहे हैं, जिस तेवर से कभी पंडे-पुरोहित जाति-व्यवस्था संबंधी शास्त्रोक्त नियमों को लागू करवाना चाहते थे. कोई डराता है कि मेरे पाले में नहीं आये तो, विकास-वंचित हो जाओगे. कोई विकास पर एकाधिकार जताते हुए कहता है कि अपने विकास से हम शेष सभी दलों के विकास विषयक दावों को पाखंड साबित कर देंगे.

राज्यसत्ता अचानक विकास की एकमात्र एजेंसी या कह लें विकास-सत्ता में बदल गयी है. नागरिक इस विकास-सत्ता के आगे एकदम ही बलहीन दिख रहा है. पार्टियां नियामक देव की मुद्रा में हैं और ‘विकास’ एक दैवीय विधान की तरह उपस्थित किया जा रहा है. नागरिक का काम मात्र इतना रह गया है कि वह या तो विकास के दैवीय विधान को इस या उस देव के हाथों स्वीकार करे या फिर दंड पाने के लिए तैयार रहे. इसी का एक प्रमाण है कि कांग्रेस के ‘तारनहार’ राहुल गांधी ने मतदाताओं का यह कह कर भयादोहन किया कि भाजपा शासन में आयी तो ‘यह पार्टी भोजन की गारंटी तथा रोजगार गारंटी जैसे व्यापक जनहितकारी कानूनों को खत्म कर देगी’, तो दूसरा प्रमाण है प्रचंड बहुमत हासिल करनेवाली भाजपा के महानायक नरेंद्र मोदी का यूपी (आंबेडकरनगर) में चुनाव-प्रचार के दौरान यह कहना कि ‘हम गुस्से की राजनीति करते हैं, लेकिन हमारा गुस्सा विकास को और आगे बढ़ाने का है.’

धमकी, भयादोहन और गुस्से की यह राजनीति विकास की अपरिहार्यता साबित करने के साथ विकास के नीति-बोध, योजना, अमल और निगरानी में जनता के विभिन्न समूहों की हिस्सेदारी और सहभागिता के सवाल को गौण कर रही है, जबकि लोकतंत्र में यही बात जनता की मजबूती का प्रमाण है और विपक्ष के होने का औचित्य भी.

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