Advertisement

saraikela kharsawan

  • Jul 4 2019 10:33PM
Advertisement

खरसावां : हजारों भक्तों ने खींची आस्था की डोर, रथ पर सवार हो गुंड़िचा मंदिर पहुंचे भगवान जगन्‍नाथ

खरसावां : हजारों भक्तों ने खींची आस्था की डोर, रथ पर सवार हो गुंड़िचा मंदिर पहुंचे भगवान जगन्‍नाथ

शचीन्द्र कुमार दाश, खरसावां

मंगलम् भगवान विष्णु, मंगलम् मधुसुदनम, मंगलम् पुंडरीकाक्ष, मंगलम् गरुड़ ध्वज, माधव माधव बाजे, माधव माधव हरि, स्मरंती साधव नित्यम, शकल कार्य शुमाधवम्... जैसे वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ गुरुवार को हरिभंजा में प्रभु जगन्नाथ की पहली रथयात्रा संपन्न हुई. खरसावां के हरिभंजा में भक्तों के समागम के बीच आस्था, मान्यता व परंपराओं का त्योहार श्री जगन्नाथ की पहली रथ यात्रा (गंड़िचा यात्रा) गुरुवार को आयोजित की गयी.

 

रथ को जगन्नाथ मंदिर से गुंड़िचा मंदिर तक खींचकर पहुंचाने के लिए हजारों की संख्या में लोग जुटे थे. पहले गांव के जमीनदार विद्या विनोद सिंहदेव ने छेरा पोहरा के रश्म निभाया. छेरा पोहंरा में मंदिर से रथ तक सड़क पर चंदन छिड़क कर झाड़ू लगाया गया. इसके पश्चात पुरोहितों ने चतुर्था मूर्ति को पोहंडी कर (झुमते हुए) रथ तक पहुंचाया. 

 

इसके बाद प्रभु जगन्नाथ के जयकारों के बीच रथ यात्रा शुरू हुई. रथयात्रा में शामिल होने पहुंचे सैकड़ों भक्तों ने जय जगन्नाथ का जयघोष, शंखध्वनी, पारंपरिक जय जगन्नाथ के जयघोष व उलुध्वनी के साथ रथ को खींचा. रथ को खींचने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ी. इस दौरान हर कोई प्रभु जगन्नाथ को छुकर आशिर्वाद लेने के प्रति आतुर दिखा. रथ के उपर से भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में पका हुआ कटहल व लड्डु फेंके गये, जिसे पाने के लिए भक्त उमड़ पड़े. 

 

देर शाम प्रभु जगन्नाथ अपने बड़े भाई बलभद्र, बहन सुभद्रा व सुदर्शन के साथ मौसीबाड़ी पहुंचे. रथयात्रा ही एक मात्र ऐसा समय होता है, जब जगत के नाथ प्रभु जगन्नाथ अपने भक्तों को दर्शन देने के लिए मंदिर के रत्न जडि़त सिंहासन छोड़ बाहर निकलते है. यहां वे आठ दिनों तक रहने के बाद पुन 12 जुलाई को अपने मंदिर वापस लौटेंगे. मौसीबाड़ी में प्रभु जगन्नाथ के रहने के दौरान प्रतिदिन भंडारा का आयोजन किया जायेगा. 

 

...और जीवंत हो उठी ढाई सौ साल पुरानी परंपरा 

खरसावां व सरायकेला में रथयात्रा के दौरान इस बार भी तीन सौ साल पुरानी परंपरा को जीवंत रूप में देखा गया. देश के आजादी के बाद भले ही तमाम रियासतों का विलय भारत गणराज्य में कर दिया गया हो. परंतु सरायकेला, खरसावां व हरिभंजा में सभी रश्म राजा-राजवाडों के समय जैसा ही निभाया गया. प्रभु जगन्नाथ के रथ निकलने से पूर्व छेरा पोहरा नामक धार्मिक अनुष्ठान का आयोजन किया गया. 

 

रश्म के पूरा होने के बाद ही रथ चलाने की परंपरा है. पूर्व की तरह इस भी इस रश्म को राजघराने के प्रतिनिधियों ने ही निभाया. छेरा पोहरा में रथ चलने के रास्ते पर राज घराने के राजाओं द्वारा चंदन छिड़का गया, तब जाकर रथ मौसी बाड़ी के लिए कूच किया. खरसावां राजघराने के राजकुमार गोपाल नारायण सिंहदेव ने छेरा पोहरा किया. 


पुरी की तर्ज पर हरिभंजा में निकली प्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा 

हरिभंजा में ओड़िशा के पुरी के तर्ज पर रथ यात्रा निकाली गयी. आज भी यहां ढाई सौ वर्ष पुरानी जगन्नाथ ओड़िया संस्कृति की झलक दिखायी देती है. रथ यात्रा के समय पुरी के तरह यहां भी भजन-किर्तन का आयोजन किया गया. प्रभु जगन्नाथ के रथ के आगे ओड़िशा के बोलांगिर से आये 50 कलाकारों ने ओड़िया में भजन किर्तन भजन करते रहे.

Advertisement

Comments

Advertisement
Advertisement