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  • Jan 10 2019 7:45AM

सही है सवर्णों को आरक्षण देना

आरके सिन्हा

राज्यसभा सदस्य

rkishore.sinha@sansad.nic.in

नरेंद्र मोदी सरकार ने अंततः सवर्ण जातियों को 10 फीसदी आरक्षण देकर एक पुरानी और जायज मांग को मान लिया है. इस फैसले से उन करोड़ों सवर्ण हिंदुओं को भी कुछ राहत मिल सकेगी, जो पीढ़ियों से निर्धनता का जीवन जीने को अभिशप्त हैं. 

यह दस प्रतिशत का आरक्षण सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को दिया जायेगा. मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूं कि इनमें बड़ी संख्या में अगड़ी जातियों के लोग बेहद विषम हालातों में जीवनयापन कर रहे हैं. इनकी जमीन की जोत निरंतर घटती ही जा रही है. इनके हितों का कोई देखनेवाला भी नहीं है. ये तो दूसरों की खेतों में भी जाकर मजदूरी कर सकते हैं, कर भी रहे हैं, लेकिन घर की महिलाएं लोकलाज की वजह से घर के बाहर निकलकर मजदूरी भी नहीं कर सकतीं. 

आखिरकार ये गरीब कैसे करें अपने परिवार की परवरिश. बच्चों की उत्तम पढ़ाई, बूढ़ों की दवाई और बेटियों का विवाह कैसे हो? अब इन्हें भी जरूर कुछ हद तक राहत मिलेगी. जब यह देश सबका है, तो फिर यहां पर सबको बराबर के अवसर क्यों ना मिले, यह तो वाजिब सवाल है. 

हिंदू समाज जाति के कोढ़ से घिरा है. पर भारतीय संविधान जाति पर आधारित तो नहीं है. वह तो सभी नागरिकों के साथ हर स्तर पर समान व्यवहार की बात करता है. 

इस आलोक में सवर्ण हिंदुओं को आरक्षण देना एक सार्थक और सही कदम है, ताकि उनके गरीब तबके की भी सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हो. मुझे लगातार आरक्षण के लाभ के चलते बुलंदियों को छूनेवाले दलित-पिछड़े भी मिलते ही रहते हैं. वे बताते हैं कि नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण मिलने से ही उनकी जिंदगी सुधर गयी है. वे सामाजिक-आर्थिक रूप से अब खुशहाल हो गये हैं. यह सुखद स्थिति है कि सदियों से वंचित जातियां अब आगे आ रही हैं. इन्हें भी अवसर मिल रहे हैं और ये सभी क्षेत्रों में आगे बढ़ रहे हैं. ऐसे में किसी को क्या दिक्कत होगी कि किसी जरूरतमंद गरीब सवर्ण को भी आरक्षण का लाभ मिल जाये? 

बाबा साहब अंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा को संबोधित करते हुए बहुत साफ शब्दों में कहा था, 'जातियां राष्ट्र-विरोधी हैं. 

इनसे समाज बिखरता है. क्योंकि इनके (जातियों) के चलते विभिन्न जातियों में एक-दूसरे को लेकर कटुता का भाव पैदा होता है.' जवाहरलाल नेहरू ने भी 13 जून, 1951 को लोकसभा में कहा था, 'भारत का संविधान तो एक जातिविहीन और वर्गविहीन समाज की तरफ बढ़ने का वादा करता है. 

दरअसल सरकार का दायित्व है कि वह समाज के सबसे पिछड़े पायेदान पर खड़े लोगों को ताकत दे.' सवर्णों की आरक्षण का मांग करनेवाले भी अपनी जगह सही थे कि आरक्षण का लाभ उन्हें ही मिले, जो आर्थिक रूप से पिछड़े हैं. जाति को मत देखो. हमारे दलित-पिछड़े समाज को आरक्षण की आवश्यकता से कहीं अधिक समाज में सम्मान की जरूरत ज्यादा थी. गौरतलब है कि हमारी वर्तमान राजनीतिक एवं कानून व्यवस्था आरक्षण तो देती है, मगर सम्मान की गारंटी नहीं देती.

कई राजनीतिक दल जातिवाद को दूर करने के बजाय उसे और भी ज्यादा सुदृढ़ करने के जुगाड़ में लगे रहते हैं. इन्हें हिंदू कहने के बजाय दलित कहने के लिए उकसाया जा रहा है. ये वास्तव में हिंदू समाज का वह आस्थावान वर्ग है, जिसने मुगलों की चमचागिरी नहीं की. संघर्ष किया और यातनाएं सहीं, पर धर्म परिवर्तन नहीं किया. समाज को बांटने का जो काम पहले अंग्रेज करते थे, वही जघन्य काम आज दुष्ट राजनेता कर रहे हैं. 

इसी जहरीली नीति का परिणाम है कि बीते दशकों से उपेक्षित सवर्ण जातियां भी अब मुखर होने लगी थीं. पिछले साल एससी-एसटी संशोधन अधिनियम के खिलाफ सवर्ण संगठनों ने विगत सितंबर में भारत बंद भी रखा था. इनके बंद का मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार में तगड़ा असर देखा गया था. बिहार के अलग-अलग जिलों में प्रदर्शन भी हुए थे. उत्तर प्रदेश में भी एसएसी-एसटी एक्ट में बदलाव को लेकर प्रदर्शन भी हुए थे. सवर्णों के उस विरोध के बाद यह बात तो सबके समझ आ रही थी कि अब इन जातियों के हकों और मांगों को भी जानना होगा. 

मेरी निजी राय यह है कि नौजवानों को नौकरी के बजाय अपना कोई काम-काज करने के संबंध में सोचना होगा. आपको किसी नये आइडिया पर काम करना होगा. अगर आपके पास कोई नया आइडिया है, तो आप भी दर्जनों-सैकड़ों को नौकरी दे सकते हैं. अब तो आपके प्रोजेक्ट में मदद करनेवालों की भी कोई कमी नहीं है. आप लाइए तो सही, कोई नया आइडिया. 

हां, अगर आपको हर साल एक मामूली इंक्रीमेंट वाली नौकरी ही करनी है तो फिर तो कोई बात नहीं है. शिव नाडार का उदाहरण आपके सामने है. नाडार पिछड़ी जाति से हैं और एचसीएल टेक्नोलॉजीज के अध्यक्ष हैं. वे इसलिए ही आगे बढ़ते जा रहे हैं, क्योंकि उनके पास नये-नये आइडियाज हैं. इसलिए अब नौजवानों को नौकरी करने की बजाय अपना कोई धंधा चालू करने पर फोकस होना चाहिए. 

बहरहाल, अभी तो सरकार के सवर्ण जातियों को रोजगार और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने के मसले पर कुछ विरोध के स्वर भी सुनायी दे सकते हैं. लेकिन, यह फैसला तो अंततः हिंदू समाज में अगड़ी-पिछड़ी जातियों को करीब ही लायेगा.

 

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