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  • Nov 8 2019 7:42AM
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करतारपुर कॉरीडोर के पेच

सुशांत सरीन
रक्षा-सुरक्षा मामलों के विशेषज्ञ
delhi@prabhatkhabar.in
 
करतारपुर कॉरीडोर को लेकर पिछले महीने 23 अक्तूबर को जो एमओयू साइन हुआ था, उस वक्त कुछ चीजें तय पायी गयी थीं कि भारत से वहां जानेवाले सिख श्रद्धालुओं को अपने जरूरी कागजात तो साथ रखना ही होगा, लेकिन वीजा की जरूरत नहीं होगी. उसकी एक प्रणाली बनायी गयी थी कि दस दिन पहले यह बताना होगा कि किस दिन कौन-कौन लोग जायेंगे, ताकि क्लियरेंस मिलने के बाद उनके जाने की इजाजत होगी. 
 
यह प्रणाली ठीक भी है, क्योंकि अधिकारियों को जांच-पड़ताल और बाकी कानूनी कार्रवाई के लिए यह सब जरूरी होता है. लेकिन, फिर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने यह कह दिया कि शुरुआत में जिस दिन गुरु पर्व है, उस दिन के लिए न तो वीजा-पासपोर्ट लगेगा और न ही बीस डॉलर की निर्धारत फीस ही लगेगी. बस यहीं पर पाकिस्तानी सेना ने अपनी भौंहें टेढ़ी की और फरमान जारी कर दिया कि भारतीय श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट अनिवार्य है. 
 
करतारपुर कॉरीडोर प्रोजेक्ट भारत का प्रोजेक्ट नहीं था, बल्कि यह पाकिस्तानी फौज का प्रोजेक्ट था. इसका उद्देश्य भारत से रिश्ते बेहतर करना नहीं था, बल्कि उद्देश्य यह था कि भारतीय सिख समुदाय को किस तरह से बरगलाया जाये, वह भी भारत के खिलाफ. 
 
इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य यह था कि सिख समुदाय में किस तरह वर्चस्व बनाया जाये, ताकि उसका इस्तेमाल करके भारत के हितों को नुकसान नहुंचाया जाये. यह बात पाकिस्तानी सेना ने पहले से ही सोचा हुआ था, जिसमें उसने इमरान खान का इस्तेमाल किया और इस जाल में इमरान खान फंसते चले गये. इससे भी ज्यादा दुखद यह रहा कि इस संबंध में इमरान खाने से बड़ी गलती भारत सरकार ने की कि वह खुली आंखों के साथ उसी जाल में कूद पड़ी. 
 
इमरान खान को यह गुमान हो सकता है कि वह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं, उनके हुक्म से पाकिस्तान चलता है और उनकी तामील सभी पाकिस्तानी करते हैं. 
 
लेकिन, एक जो विरोधाभास नजर आया, वह यह कि खुद उनकी सेना उनकी बात नहीं मानती. इससे बात साफ है कि पाकिस्तान में किसकी तूती बोलती है और किसके हुक्म की तामील होती है, प्रधानमंत्री इमरान खान की या फिर पाकिस्तानी सेना की. अब चूंकि करतारपुर कॉरीडोर प्रोजेक्ट के पीछे का सारा मंसूबा पाकिस्तानी सेना का है, इसलिए वह जो कहेगी वही होगा. 
 
यह बात सामने आ भी गयी है कि एक तरफ इमरान ने कहा था कि करतारपुर आनेवाले भारतीय श्रद्धालुओं को पासपोर्ट की जरूरत नहीं है और वे किसी भी एक पहचान पत्र के साथ आ सकते हैं, जबकि इसके उलट पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता ने साफ कर दिया है कि भारतीय श्रद्धालुओं के लिए पासपोर्ट लेकर जाना अनिवार्य है. 
 
जहां से मैं देख रहा हूं, भारत सरकार को इस जाल में फंसने की कोई जरूरत नहीं थी. लेकिन भारत सरकार के ऐसा करने के पीछे क्या कारण हैं, यह कहना भी मुश्किल है. 
 
हो सकता है उसके पास कोई मजबूरी रही हो या हो सकता है कि भारत सरकार में बैठा कोई व्यक्ति ने यह सोचा हो कि इस प्रोजेक्ट से भारत-पाक रिश्तों में कुछ सुधार आयेगा. यह भी हो सकता है कि इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक कारण हो कि नवजोत सिंह सिद्धू को नीचा दिखाया जाये और पंजाब के अंदर अपनी पकड़ बनायी जाये. अन्य भी इसके कारण हो सकते हैं, लेकिन कह नहीं सकता कि सही कारण क्या है. भारत सरकार के गले में यह प्रोजेक्ट ऐसा फंस गया लगता है, जिसे अब न तो वह निगल पायेगी और न ही उगल पायेगी. भारत सरकार न ही करतारपुर कॉरीडोर को बंद कर सकती है और न ही इसे आसानी से आगे बढ़ा सकती है.
 
क्योंकि यह प्रोजेक्ट बंद होगा, तो इसके खिलाफ सिख समुदाय खड़ा हो जायेगा और आगे बढ़ेगा तो सरकार के लिए पाक सेना नयी-नयी मुसीबतें लेकर आयेगी, जैसा अभी वीजा-पासपोर्ट मामले में हुआ. पाकिस्तानी सेना अपनी मनमानी से बाज नहीं आयेगी और हमेशा कोई न कोई परेशानी खड़ी करती ही रहेगी. 
 
एक दूसरी गलती यह भी हुई कि पिछले दिनों पंजाब में इमरान खान को लीडर बना दिया गया, जिसमें सिद्धू की बड़ी भूमिका थी. भारत सरकार को ऐसा नहीं होने देना चाहिए था, इसका नुकसान हमें होना तय है. 
 
फिलहाल तो इसका उपाय भी नजर नहीं आ रहा है. इसकी बड़ी संभावना है कि जब सिख श्रद्धालु वहां करतारपुर के गुरुद्वारा में जायेंगे, तो पाकिस्तानी सेना के लोग उन्हें बरगलाने की कोशिश करेंगे. क्योंकि पाकिस्तान की तरफ वाले क्षेत्र का कोई नियंत्रण भारत को नहीं होगा. 
 
वहां पर क्या पोस्टर लगाये जाते हैं, कौन कब किससे मिलता है, क्या षड्यंत्र रचे जाते हैं, क्या बातचीत होती है, इन सब बातों पर भारत का कोई नियंत्रण नहीं होगा. यह हमारे लिए बहुत खतरनाक है. अगर अपने पंजाब क्षेत्र में इसे बंद करने की कोशिश भारत सरकार करती है, तो सिख लोग आसमान सिर पर उठा लेंगे. अगर यह चलता रहता है, तो इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा. कुल मिलाकर लगता है कि जान-बूझकर इसे बहुत पेचीदा मसला बना दिया गया है. 
 
अस्सी के दशक में जो आग लगी हुई थी, जिसे उसके बाद के पच्चीस-तीस साल में बुझाने की कोशिश हुई और भारत में शांति आ गयी थी, लेकिन फिर हमारी राजनीति ने एक-एक कर गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किये और आज वही आग जलने लगी है. अयोध्या मामले का शुरू होना, कश्मीर को छेड़ना, और अब पंजाब में आग फैलाने की कोशिश, इनकी हमें जरूरत नहीं थी, क्योंकि इस वक्त हमारी अर्थव्यवस्था का बुरा हाल है. हमें इन सब मसलों को शांत कर अर्थव्यवस्था सुधारने की कवायद करनी चाहिए. कुछ साल पहले तक देश बहुत आगे निकल गया था, पर फिर उसे पीछे धकेला जा रहा है. 
 
करतारपुर कॉरीडोर प्रोजेक्ट को चलते रहने देना ही भारत की मजबूरी है, लेकिन साथ ही अब उसे बहुत सावधानी से काम करना होगा. 
सरकार को अपनी नजरें तीखी करनी होंगी, कानून-प्रणाली दुरुस्त और चौकस रखनी होगी, खूफिया तंत्र को पुख्ता करना होगा, पुलिस-प्रशासन को मजबूत रखना होगा, ताकि उस क्षेत्र से कोई भी संदिग्ध गतिविधि मिले, उस पर फौरन कार्रवाई हो सके. साथ ही, राजनीति को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, ताकि कोई तीसरा इसका फायदा न उठा ले जाये. पाकिस्तान सेना की तरफ से तो यलगार होता ही रहेगा, इसलिए भारतीय सेना और सरकार को मजबूत इच्छाशक्ति के साथ वहां डटे रहना होगा. 
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
 
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